UN ने लताड़ा तो सहम गया पाकिस्तान, मुनीर की ‘तानाशाही’ पर देता फिर रहा सफाई, जानें पूरा मामला

[ad_1]


पाकिस्तान में इन दिनों राजनीतिक हलचल तेज है. पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान लंबे वक्त से जेल में बंद हैं और उनसे इन दिनों किसी मुलाकात भी नहीं हो पाई है. यही वजह है कि इमरान के मौत की अफवाह भी उड़ गई. इस बीच संयुक्त राष्ट्र की ओर से पाकिस्तान को बुरी तरह से लताड़ा गया है. पाक आर्मी चीफ आसिम मुनीर का रवैया तानाशाही वाला होता जा रहा है. हालांकि यूएन की प्रतिक्रिया का अहम कारण पाक का 27वां संवैधानिक संशोधन है. इस पर पाकिस्तान ने सफाई भी पेश की है.

दरअसल 27वें संवैधानिक संशोधन के जरिए पाकिस्तान की संसद ने आसिम मुनीर को एक ऐसी कानूनी ताकत दे दी है, जिससे कोई भी अदालत उस पर सवाल नहीं उठा सकती. इस फैसले की वजह से पाकिस्तान में बगावत जैसे हालात हैं. इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र ने भी आपत्ति जताई है. यूएन मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टर्क ने चेतावनी दी है कि यह न्याय व्यवस्था को कार्यपालिका के नियंत्रण में कर सकता है. यूएन ने इसे लोकतंत्र को कमजोर करने वाला बताया.

सफाई में क्या बोला पाकिस्तान

‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय टर्क के बयान के बाद बौखला गया है. हालांकि उसने सफाई भी पेश की है. विदेश मंत्रालय ने कहा, ”यह बिना वजह की चिंता है. यह मामला पूरी तरह से पाकिस्तान की संसद के अधिकार क्षेत्र में है. लोकतंत्र की तरह कानून और संविधान में बदलाव निर्वाचित प्रतिनिधियों का अधिकार है.”

27वें संशोधन को लेकर क्यों हो रहा विवाद

पाकिस्तान ने इस संशोधन के जरिए नए फेडरल कॉन्सटीट्यूशन कोर्ट का गठन किया है, जो संविधान से जुड़े मामलों पर आखिरी फैसला देगा. अहम बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट को अब सिर्फ सिविल और क्राइम से जुड़े मामलों तक ही सीमित कर दिया गया है. इसके साथ ही सबसे बड़ा विवाद चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज के नए पद को लेकर है. इसका पहला कार्यभार मुनीर को मिला है.

[ad_2]

‘तुरंत देश से बाहर निकालो, बाइडेन प्रशासन ने…’, ट्रंप ने अमेरिका की सुरक्षा लेकर कही ये बात

[ad_1]


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर पूर्व के जो बाइडेन प्रशासन पर तीखा हमला बोला है. एक्स (ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए ट्रंप ने कहा कि देश को बर्बाद करने वाली नीतियों और कथित धांधली वाले चुनाव को अमेरिकियों को कभी नहीं भूलना चाहिए. ट्रंप ने एक्स पर लिखा, “हमें अपने देश से बुरे लोगों को जल्दी से जल्दी बाहर निकालना होगा. बाइडेन एडमिनिस्ट्रेशन और धांधली वाले चुनाव ने अमेरिका के साथ जो किया, उसे कभी नहीं भूलना चाहिए. MAKE AMERICA GREAT AGAIN!”

ट्रंप लंबे समय से 2020 के चुनाव को रिग्ड बताते रहे हैं और बाइडेन प्रशासन को अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा और सीमा नीति को लेकर लगातार कटघरे में खड़ा करते रहते हैं. उनके ताजा बयान को एक बड़े राजनीतिक हमले के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें उन्होंने फिर स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे आव्रजन और ‘लॉ एंड ऑर्डर’ को अपनी प्रमुख राजनीतिक थीम बनाए रखेंगे.

डोनाल्ड ट्रंप ने किया ये बड़ा दावा

डोनाल्ड ट्रंप ने बीते शुक्रवार को अपने नए बयान में बड़ा दावा करते हुए कहा कि जो भी सरकारी दस्तावेज जो बाइडेन ने ऑटोपेन मशीन से साइन किए थे, वे सभी अब अमान्य कर दिए गए हैं. ट्रंप ने आरोप लगाया कि बाइडेन के लगभग 92% आदेश इसी मशीन के जरिए साइन कराए गए थे.  ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखते हुए ट्रंप ने कहा, “स्लीपी जो बाइडेन ने ऑटोपेन से जो भी कागजात साइन किए, वे सभी तत्काल प्रभाव से टर्मिनेट किए जाते हैं. इनका कोई कानूनी प्रभाव नहीं बचेगा. ऑटोपेन तभी मान्य है जब राष्ट्रपति खुद इसकी अनुमति दें.”

ट्रंप की इमिग्रेशन पर एक और सख्त घोषणा

इसी दिन ट्रंप ने इमिग्रेशन पर एक और सख्त घोषणा की. उन्होंने कहा कि ‘थर्ड वर्ल्ड’ के देशों से आने वाली इमिग्रेशन को स्थायी रूप से रोक दिया जाएगा, ताकि बाइडेन प्रशासन के दौरान आए लाखों गैर-कानूनी प्रवासियों को वापस भेजा जा सके.

“थर्ड वर्ल्ड देशों से इमिग्रेशन अब स्थायी रूप से बंद”

ट्रंप ने लिखा, “मैं सभी थर्ड वर्ल्ड देशों से आने वाली इमिग्रेशन को स्थायी रूप से रोक रहा हूं. इससे अमेरिकी सिस्टम को रीसेट करने, बाइडेन काल में ऑटोपेन के नाम पर हुई गैर-कानूनी एंट्री को खत्म करने और उन लोगों को हटाने में मदद मिलेगी जो अमेरिका का सम्मान नहीं करते.”

ये भी पढ़ें-

F-15 से भी घातक! आसमान में छिपकर रडार गाइडेड मिसाइल से हमला, तुर्किए का ये खतरनाक ‘घोस्ट जेट’ बना दुश्मनों के लिए काल

[ad_2]

आत्मघाती हमले से दहल उठा पाक, BLF ने सैन्य ठिकाने को बनाया निशाना, खरबों के प्रोजेक्ट को झटका!

[ad_1]


पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के नोकुंदी इलाके में फ्रंटियर कॉर्प्स (FC) के मुख्यालय के पास फिदायीन हमले हुए हैं. यह अटैक रिको डिक (Reko Diq) और सैंडक खनन प्रोजेक्ट से जुड़े विदेशी विशेषज्ञों, इंजीनियरों और स्टाफ के काम करने और रुकने के लिए बनाए गए कंपाउंड में हुआ है. इसे बलूच विद्रोही गुट ने रविवार (30 नवंबर) रात करीब 9 बजे अंजाम दिया. जानकारी के मुताबिक FC मुख्यालय के पास बने इस संवेदनशील कंपाउंड पर पहले बलूच विद्रोही गुट ने 5 बड़े धमाके किए और फिर सुरक्षाबलों पर फायरिंग शुरू कर दी.

फिदायीन हमले की जिम्मेदारी बलूच लिबरेशन फ्रंट (BLF) ने ले ली है और BLF के प्रवक्ता मेजर ग्वाहरम बलूच ने बयान जारी कर बताया कि यह हमला BLF की सादो ऑपरेशनल बटालियन (SOB) यूनिट ने अंजाम दिया था. अटैक में उस संवेदनशील कंपाउंड को निशाना बनाया गया है, जहां खनन प्रोजेक्ट से जुड़े विदेशी विशेषज्ञों, इंजीनियरों और स्टाफ के काम करने और रुकने-ठहरने की व्यवस्था पाकिस्तानी सरकार ने की है.

बलूच विद्रोही गुट और पाकिस्तानी सेना के बीच झड़प में अब तक मौत का आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है, लेकिन पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक हमला बलूचिस्तान के जिस नोकुंदी इलाके में हुआ है, व चगाई जिले में आता है और चगाई जिले के सभी अस्पतालों में इमरजेंसी घोषित कर दी गई है. हमले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह वही इलाका है जिसे पाकिस्तान सरकार दुनिया भर में अपनी “सबसे सुरक्षित” विदेशी निवेश परियोजना के रूप में पेश कर रही थी.

रिको डिक और सैंडक खनन प्रोजेक्ट का पाक ने पूरी दुनिया में पीटा ढिंढोरा

असल में पाकिस्तान की सरकार पूरी दुनिया को रिको डिक (Reko Diq) और सैंडक (Saindak) खनन प्रोजेक्ट में निवेश करने का निमंत्रण दे रही थी और जून में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकत के दौरान पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने अमेरिका को रिको डिक खान में निवेश के लिए औपचारिक निमंत्रण दिया था. साथ ही पाकिस्तान पूरी दुनिया से दावा कर रहा था कि पश्चिमी देश रिको डिक खदान में निवेश करें, क्योंकि ये दुनिया की सबसे बड़ी सोनातांबा खदानों में से एक है, जिसे अब तक इसे ठीक से नहीं खोदा गया और इसके भीतर खरबों डॉलर मूल्य का सोना और तांबा दबा है.

साथ ही कुछ दिनों पहले ही पाकिस्तान ने रिको डिक खनन प्रोजेक्ट के लिए अमेरिका की आयात-निर्यात बैंक (EXIM) ने करीब 35 हजर करोड़ पाकिस्तानी रुपये का कर्ज भी दिया था, लेकिन इसी अब इसी परियोजना से जुड़े विदेशी इंजीनियरों और अन्य स्टाफ के लिए बने कंपाउंड पर फिदायीन हमला परियोजना की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.

अपने ही जाल में फंसा पाकिस्तान

बता दें कि पूरी दुनिया में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने वाला पाकिस्तान इस वक्त अपने पाले हुए आतंकियों की वजह से बड़े संकट से जूझ रहा है. इससे पहले 24 नवंबर को पेशावर स्थित FC हेडक्वार्टर पर ठीक इसी तरह का फिदायीन हमला हुआ था, जिसकी जिम्मेदारी तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान (TTP) के प्रॉक्सी ग्रुप जमात-उल-अहरार ने ली थी. साथ ही पिछले 10 दिनों में पाकिस्तान की सेना ने जिन 30 आतंकियों को मारा है, उसमें से 2 आतंकी बहावलपुर का अबू दुजाना उर्फ अली हमदान और पीओके का मोहम्मद हारिस दोनों को पाकिस्तानी सेना और ISI के समर्थित आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद ने भारत में आतंकवाद के लिए ट्रेन किया था, लेकिन दोनों ने 2 साल पहले TTP जॉइन कर ली थी और उल्टा पाकिस्तान की फौज जिसने उन्हें ट्रेन किया था, उस पर ही हमला करने लगे थे. ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा की पाकिस्तान जिस आतंकवाद को दुनिया में एक्सपोर्ट करने के लिए 30 साल से तैयार कर रहा है और उसके लिए आज एक बड़ा संकट बन कर सामने आ चुके है.

[ad_2]

चीन की मिसाइलों को पलक झपकते ही तबाह कर देगा ‘T-Dome’, ताइवान का नया डिफेंस सिस्टम उड़ाएगा ड्रै

[ad_1]


ताइवान ने अपनी सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बड़ा फैसला लिया है. चीन के संभावित हमले के खतरे को देखते हुए सरकार ने अतिरिक्त 40 अरब अमेरिकी डॉलर के रक्षा बजट का प्रस्ताव रखा है. यह पैसा आने वाले वर्षों में नई और आधुनिक मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस प्रणाली T-Dome बनाने में खर्च किया जाएगा. यह पहली बार है जब ताइवान इतनी बड़ी सुरक्षा निवेश योजना को सामने ला रहा है.

अमेरिकी दबाव और बढ़ता रक्षा खर्च
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अमेरिका लगातार ताइवान से उसका रक्षा बजट बढ़ाने की मांग कर रहा है. ताइवान सरकार ने कहा है कि यह खास बजट 2026 से 2033 के बीच चरणों में खर्च किया जाएगा. राष्ट्रपति लाई चिंग-ते पहले ही रक्षा खर्च को जीडीपी के 5% तक ले जाने की बात कर चुके हैं. फिलहाल ताइवान ने 2026 के लिए रक्षा बजट बढ़ाकर 31.18 अरब डॉलर कर दिया है, जिससे कुल रक्षा खर्च जीडीपी का 3.3% हो जाएगा. राष्ट्रपति लाई ने वॉशिंगटन पोस्ट में लिखा कि नया बजट मुख्य रूप से अमेरिका से हथियार खरीदने के लिए इस्तेमाल होगा. ताइवान के रक्षा मंत्री वेलिंगटन कू के मुताबिक, 40 अरब डॉलर बजट की ऊपरी सीमा है और इसका उपयोग सटीक मारक मिसाइलों, संयुक्त हथियार विकास और सैन्य तकनीक खरीद में किया जाएगा.

T-Dome क्या है और कैसे काम करेगा?
इस रक्षा प्रणाली की घोषणा राष्ट्रपति लाई ने 10 अक्टूबर को की थी. उन्होंने इसकी तुलना इजरायल के मशहूर Iron Dome से की, लेकिन कहा कि इसकी क्षमता उससे काफी ज्यादा होगी. रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, T-Dome सिर्फ छोटे रॉकेट नहीं बल्कि कई तरह के खतरों से निपटेगा. यह सिस्टम चीन के लड़ाकू विमान, बैलिस्टिक मिसाइलें, क्रूज मिसाइलें, ड्रोन जैसे हमलों को रोकने के लिए डिजाइन किया जा रहा है.

मौजूदा रक्षा सिस्टम से जुड़कर बनेगा सुपर-नेटवर्क
ताइवान के पास पहले से कई अहम एयर डिफेंस सिस्टम हैं-

  • अमेरिकी पैट्रियट PAC-3 मिसाइल सिस्टम
  • स्वदेशी Sky Bow और Tien Kung सिस्टम

जल्द ही मिलेंगे NASAMS सिस्टम
T-Dome इन सभी को आधुनिक रडार, सेंसर और एक कमांड सेंटर से जोड़कर एक सिंगल रक्षा नेटवर्क बनाएगा, जो तेजी से खतरे का पता लगा सकेगा और उसे तुरंत नष्ट कर सकेगा.

T-Dome के दो मुख्य हिस्से होंगे

राष्ट्रीय रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस सिस्टम में-

  • कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम- जो सभी रडार और सेंसर से डेटा लेकर तय करेगा कि किस खतरे पर कौन-सी मिसाइल दागनी है.
  •  इंटरसेप्टर लेयर्स- जहां अलग-अलग ऊंचाई और दूरी के लिए मिसाइलें तैनात रहेंगी, ताकि आने वाली हर मिसाइल या ड्रोन को रोका जा सके.

ताइवान को यह सिस्टम क्यों जरूरी लगा?
यूक्रेन-रूस युद्ध से ताइवान ने सीखा है कि आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली ही नागरिकों, सेना और अहम जगहों को बचा सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ताइवान चीन के शुरुआती मिसाइल हमलों को रोक पाए, तो बीजिंग हमला करने से पहले कई बार सोचेगा. रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के पास ताइवान के आसपास तैनात जहाजों और जमीन-आधारित लॉन्चर से सिर्फ तीन मिनट में सैकड़ों मिसाइलें दागने की क्षमता है.

[ad_2]

‘भारतीयों से US को बहुत फायदा हुआ’, ट्रंप के खिलाफ फिर खुलकर आए मस्क, H-1B वीजा पर क्या कहा?

[ad_1]


अमेरिका में जारी एच-1बी वीजा को लेकर जारी चर्चा के बीच टेस्ला के सीईओ एलन मस्क ने बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि प्रतिभाशाली भारतीयों से अमेरिका को बहुत फायदा हुआ है. उन्होंने अमेरिका में टेक्नोलॉजी और इनोवेशन को आकार देने में अप्रवासी प्रतिभाशाली की भूमिका को स्वीकार किया है. 

भारतीयों से US को बहुत फायदा हुआ: मस्क

एलन मस्क ने वैश्विक कंपनियों में शीर्ष पद पर भारतीय मूल के लोगों के होने का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा, “वेस्टर्न कंपनियों में  हमारे सभी भारतीय मूल के सीईओ हैं.” ब्रोकिंग फर्म जीरोधा के को-फाउंडर निखिल कामथ के पॉडकास्ट में मस्क ने कहा, “अमेरिका लंबे समय से दुनिया भर से इंटेलिजेंट लोगों को आकर्षित करता रहा है, जिस वजह से भारत में पलायन की स्थिति भी पैदा हुई. मुझे लगता है कि अमेरिका आए प्रतिभाशाली भारतीयों से अमेरिका का बहुत फायदा हुआ है.”

एच-1बी वीजा और इमिग्रेशन पर ट्रंप की राय

व्हाइट हाउस ने मंगलवार (25 नवंबर 2025) को एच-1बी वीजा पर डोनाल्ड ट्रंप की सोच का बचाव करते हुए कहा कि इस मामले पर राष्ट्रपति का नजरिया संतुलित और सामान्य समझ पर आधारित है. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि ट्रंप विदेशी कामगारों को केवल शुरुआती समय में आने देंगे, ताकि बड़ी कंपनियां जब अमेरिका में नए कारखाने लगाएं तो काम शुरू हो सके, लेकिन आगे चलकर उन जगहों पर अमेरिकी कामगार ही रखे जाएंगे.

उन्होंने कहा कि कई लोग राष्ट्रपति की सोच को ठीक से समझ नहीं पाए हैं. ट्रंप ने विदेशी कंपनियों से साफ कहा है कि अगर वे अमेरिका में निवेश कर रही हैं तो उन्हें अमेरिकी लोगों को ही नौकरी देनी होगी. यह बयान ऐसे समय पर आया है जब कुछ दिन पहले ही ट्रंप ने लीगल इमिग्रेशन का समर्थन किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह टेक से जुड़ी इंडस्ट्रीज में अमेरिकी वर्कर्स को ट्रेनिंग देने के लिए विदेश से हजारों लोगों का स्वागत करेंगे. 

‘विदेशी वर्कफोर्स अमेरिकी को कंप्यूटर चिप्स बनाना सिखाएगी’

ट्रंप ने उदाहरण देते हुए कहा था कि अरबों डॉलर खर्च करके एरिजोना में बड़ा कंप्यूटर चिप कारखाना खोलने वाली कंपनियां बेरोजगारों की लाइन से लोगों को उठाकर ऐसे कारखाने नहीं चला सकतीं. उन्हें शुरुआत में हजारों विशेषज्ञ लाने पड़ेंगे और वे इसका स्वागत करते हैं. उन्होंने आगे कहा कि विदेशी वर्कफोर्स हमारे लोगों को कंप्यूटर चिप्स और दूसरी चीजें बनाना सिखाएगी. ट्रंप ने माना कि इस सोच के कारण उन्हें अपने समर्थकों की कुछ आलोचना झेलनी पड़ सकती है.

ट्रंप-मस्क के रिश्तों में पड़ी दरार

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में एलन मस्क ने ट्रंप ने अपनी पूर्ण समर्थन दिया था और कई जगहों पर उनके लिए कैंपेन भी की थी. वो ट्रंप के साथ चुनाव प्रचार अभियान में शामिल हुए और Make America Great Again का नारा देने लगे. ट्रंप प्रशासन के शुरुआती दिनों में मस्क डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी (DOGE) का सबसे सार्वजनिक चेहरा बन गए. इसके कुछ दिनों बाद दोनों की दोस्ती में दरार पड़ गई और दोनों सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे के खिलाफ हमला बोल रहे हैं.

[ad_2]

चीन युद्ध से लेकर कारगिल वॉर तक… कितने गहरे हैं भारत-इजरायल रिलेशन, 2014 के बाद कितने बदले?

[ad_1]


इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू दिसंबर में भारत का दौरा करने वाले थे. हालांकि, किसी कारण से इस यात्रा को फिलहाल के लिए टाल दिया गया है. इजरायली पीएम ऑफिस की ओर से जानकारी दी गई कि नेतन्याहू के भारत दौरे के लिए नई तारीखों पर बातचीत चल रही है.

इस साल तीसरी बार पीएम नेतन्याहू का दौरा टाला गया है. इस बीच इजरायली मीडिया समेत अन्य ने दावा किया कि यह फैसला सुरक्षा की वजह से लिया गया. हालांकि, इजरायली अधिकारियों ने इन सभी अटकलों पर विराम लगा दिया. अधिकारियों की तरफ से कहा गया है कि पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की सुरक्षा पर इजरायली प्रधानमंत्री को पूरा भरोसा है. उनकी टीम भारत दौरे को लेकर नई तारीख पर पहले से ही बातचीत कर रही है.

नेतन्याहू ने 2018 में किया था भारत का दौरा

बता दें कि इससे पहले इजरायली पीएम ने 2018 में भारत का दौरा किया था. हालांकि, भारत और इजरायल के बीच के रिश्ते हमेशा से इतने करीब नहीं रहे हैं, जितना मोदी सरकार के नेतृत्व में हुए. ऐसा नहीं है कि दोनों देशों के बीच कोई साझेदारी नहीं थी. दोनों देशों के बीच डिफेंस क्षेत्र में लंबे समय से पार्टनरशिप जारी है.

कितने पुराने हैं दोनों देशों के संबंध?

संयुक्त राष्ट्र संघ में 14 मई 1948 को इजरायल को स्वतंत्र देश बनाने का प्रस्ताव आया था. शुरुआत में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू इसके पक्ष में नहीं थे, लेकिन दो साल में ही 1950 में इजरायल को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी. फिर भी दोनों देशों के बीच 1992 में कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए.

भारत फिलिस्तीन का समर्थन करता था. यही कारण है कि उसे इजरायल को मान्यता देने में इतना वक्त लगा. हालांकि, रक्षा के क्षेत्र में भारत और इजरायल के बीच की दोस्ती काफी पुरानी है. इजरायल ने ना केवल 1962 के भारत-चीन युद्ध में मोर्टार और मोर्टार रोधी डिवाइस दिए, बल्कि कारगिल युद्ध में भी इजरायल ने भारत को सैन्य मदद पहुंचाई.

मोरारजी देसाई सरकार ने निभाया था अहम रोल

फिर भी दोनों देशों के बीच काफी गहरी खाई थी, जिसे भरने के लिए 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार ने कदम उठाए. नतीजा यह निकला कि इजरायल के तत्कालीन रक्षामंत्री गोपनीय तरीके से भारत दौरे पर पहुंचे. इसके बाद 1985 में तत्कालीन पीएम राजीव गांधी और सिमोन पेरेस की यूएनजीए में मुलाकात हुई.

1992 में फिर तत्कालीन पीएम नरसिम्हा राव के नेतृत्व में दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंध स्थापित हुए. 2000 में तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने भारत की तरफ से पहली उच्च स्तरीय आधिकारिक इजरायल यात्रा की. इसके बाद 2003 में पहली बार भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह इजरायल पहुंचे थे. 2003 में ही इजरायल के तत्कालीन पीएम एरियल शेरोन ने भारत का दौरा किया था.

बतौर PM नरेंद्र मोदी पहली बार इजरायल गए, संबंध मजबूत हुए

भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी 2015 में इजरायल गए. इस समय तक भारत के किसी भी प्रधानमंत्री ने इजरायल का दौरा नहीं किया था. पहली बार भारत के पीएम के तौर पर नरेंद्र मोदी ने इजरायल का दौरा किया. 1950 में इसे स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने के बाद पहली बार 2017 में भारत के प्रधानमंत्री ने इजरायल का दौरा किया. पीएम मोदी के नेतृत्व में दोनों देशों के बीच संबंध में काफी मजबूती आई है.

भारत का इन क्षेत्रों में इजरायल अहम साझेदार

भारत और इजरायल रक्षा, कृषि, तकनीक और ऊर्जा के क्षेत्र में अहम साझेदार हैं. 2020 से लेकर 2024 तक दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में कई बड़ी साझेदारियां हुई हैं. दोनों देश सांस्कृतिक तरीके से भी आपस में जुड़े हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत में यहूदियों का आगमन लगभग दो हजार साल पहले हुआ था. भारत और इजरायल के बीच वर्तमान समय में विश्वास और गहरा हुआ है. भारत आज भी फिलिस्तीन का समर्थन करता है, लेकिन दूसरी तरफ आतंकवाद के खिलाफ इजरायल की लड़ाई में डटकर खड़ा है. इजरायल भी आतंकवाद के खिलाफ भारत का समर्थन करता रहा है.

[ad_2]

नेतन्याहू ने इजरायली राष्ट्रपति से मांगी माफी, भ्रष्टाचार समेत इन सीरियस केस में चल रह ट्रायल

[ad_1]


बेंजामिन नेतन्याहू ने इजरायली राष्ट्रपति से अपने खिलाफ चल रहे मामले को खत्म कराने और बेगुनाह करार दिए जाने को लेकर क्षमादान अपील की है. उन्होंने पांच साल से चल रहे भ्रष्टाचार मामले को खत्म करने का अनुरोध करते हुए कहा कि यह माफी लोक हित में होगी.

नेतन्याहू के वकील ने 111 पन्नों का आवेदन जमा कराया

द टाइम्स ऑफ इजरायल के अनुसार आइजैक हर्जोग के कार्यालय ने प्रधानमंत्री के वकील से 111 पन्नों के विस्तृत दस्तावेज मिलने की बात मानी और कहा कि इसे न्याय मंत्रालय के माफी विभाग को भेज दिया गया है. इसमें आगे कहा गया कि हर्जोग के फैसला लेने से पहले राष्ट्रपति के कानूनी सलाहकार भी एक राय बनाएंगे.

उनके कार्यालय के एक बयान में कहा गया, “राष्ट्रपति के दफ्तर को पता है कि यह एक बहुत बड़ा अनुरोध है जिसके बड़े मतलब हैं. सभी जरूरी राय मिलने के बाद, राष्ट्रपति जिम्मेदारी से और ईमानदारी से इस अनुरोध पर विचार करेंगे.”

ट्रंप भी कर चुके हैं नेतन्याहू का बचाव

इजरायल में सजा से पहले राष्ट्रपति की ओर से क्षमादान दिए जाने का मामला न के बराबर है. एक उदाहरण 1986 का मिलता है, जब शिन बेट सिक्योरिटी सर्विस से जुड़े एक खास मामले के भ्रष्टाचार मामले में बिना गुनाह कबूल किए ही आरोपी को माफी दे दी गई थी. डोनाल्ड ट्रंप के हर्जोग को लिखी चिट्ठी के कुछ हफ्ते बाद ये निवेदन किया गया है. ट्रंप ने भी राष्ट्रपति से नेतन्याहू को माफ करने के लिए कहा था.

 भ्रष्टाचार समेत इन सीरियस केस में चल रह ट्रायल

नेतन्याहू पर पिछले पांच साल यानी 2020 से रिश्वत, धोखाधड़ी और देश का भरोसा तोड़ने के आरोप में ट्रायल चल रहा है. इन आरोपों में अमीर समर्थकों को तोहफे या पॉजिटिव मीडिया कवरेज के बदले में कथित तौर पर राजनीतिक फायदे का दावा किया जाता रहा है.

नेतन्याहू इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं. वो इसे मीडिया, पुलिस और न्यायपालिका की ओर से किया गया विच-हंट बताते रहे हैं. दूसरी ओर इस माफीनामे की खबर का पता चलते ही विपक्ष मुखर हो गया है. आलोचकों ने उन पर आरोप लगाया है कि वह अपने गठबंधन को एक साथ रखने के लिए गाजा में युद्ध को लंबा खींच रहे हैं ताकि वह पद पर बने रह सकें और अपने कानूनी खतरे से बच सकें.

इस सबके बीच अपनी कानूनी फाइलिंग में शामिल एक छोटे से पत्र और रविवार को जारी एक टेलीविजन बयान में, नेतन्याहू ने तर्क दिया कि नेतन्याहू ने कहा, हालांकि उन्हें अदालत में अपनी बेगुनाही साबित करने में व्यक्तिगत रुचि है, लेकिन ‘देश हित’ में मुकदमे को तुरंत समाप्त करना जरूरी है.”

[ad_2]

मुनीर के पास PM-राष्ट्रपति से भी ज्यादा पॉवर, UN ने दिखाया आईना तो तिलमिला उठा PAK

[ad_1]


पाकिस्तान की सरकार ने हाल ही में 27वें संशोधन के तहत आर्मी चीफ आसिम मुनीर की ताकत को बढ़ाया, जिस पर संयुक्त राष्ट्र हाई कमिश्नर (मानवाधिकार) वोल्कर टर्क ने सवाल उठाए. वोल्कर टर्क ने कहा कि पाकिस्तान का ये संविधान संशोधन न्यायपालिका की आजादी को गंभीर रूप से कमजोर करता है, जिसके बाद पाकिस्तान तिलमिला उठा. PAK विदेश मंत्रालय ने कहा है कि उनकी संसद ने बहस के बाद ये बदलाव किए हैं, इस पर सवाल उठाना समझ से परे है.

बौखलाए पाकिस्तान ने सफाई पेश की

यूनाइटेड नेशन के ह्यूमन राइट्स चीफ वोल्कर ने जेनेवा में जारी एक बयान में कहा कि पाकिस्तान का संवैधानिक संशोधन पिछले साल के 26वें संशोधन की तरह, कानूनविदों और बड़े सिविल सोसाइटी के साथ बिना किसी सलाह और बहस के अपनाया गया. उन्होंने आगे कहा कि जल्दबाजी में अपनाए गए संशोधन ने न्यायपालिका को कमजोर किया है और सेना की जवाबदेही को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं. उनके इसी बयान पर बौखलाए पाकिस्तान ने सफाई पेश की. उसके विदेश मंत्रालय ने कहा, “पाकिस्तान, यूएन हाई कमिश्नर फॉर ह्यूमन राइट्स की तरफ से पाकिस्तान की संसद के दो-तिहाई बहुमत से पास हुए 27वें संशोधन के बारे में जताई गई आशंकाओं पर ऐतराज जताता है.”

वोल्कर के बयान में जमीनी हकीकत नहीं: पाकिस्तान

PAK विदेश मंत्रालय ने कहा, “दुनिया के दूसरे संसदीय लोकतंत्रों की तरह कानून बनाना और संविधान में बदलाव पाकिस्तान के लोगों के चुने हुए प्रतिनिधियों का खास अधिकार क्षेत्र है. पाकिस्तान मानवाधिकार उच्चायुक्त के काम को पूरी अहमियत देता है, लेकिन यह अफसोस की बात है कि जारी किए गए बयान में जमीनी हकीकत नहीं दिखाई गई है. पाकिस्तान की संसद में अपनाए गए संवैधानिक बदलावों में संविधान में बताए गए सही तरीकों का पालन किया गया है.

पाकिस्तान ने कहा कि लोकतंत्र और लोकतांत्रिक तरीके नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की नींव हैं और इसलिए उनका सम्मान किया जाना चाहिए.” शहबाज सरकार ने दावा किया कि वो पाकिस्तानी संविधान के मुताबिक मानवाधिकार, मानव सम्मान, आजादी और कानून राज की रक्षा करने वाले सिद्धांतों के प्रति समर्पित है. विदेश मंत्री इशाक डार के कार्यालय ने अपील की है कि उनके फैसले का सम्मान किया जाए.

पाकिस्तान में विरोध के बीच हुआ 27वां संविधान संशोधन

पाकिस्तान ने हाल ही में 27वें अमेंडमेंट को बड़े विरोध के बीच संसद ने जल्दबाजी में पारित कराया. सबसे बड़ी चिंताओं में संघीय कॉन्स्टिट्यूशनल कोर्ट बनाकर न्यायपालिका तंत्र में बड़ा बदलाव करना और आर्टिकल 243 में बदलाव करना शामिल रहा, जिसमें आर्मी की अहमियत बढ़ी है और आर्मी चीफ को पाकिस्तान की आर्म्ड सर्विसेज में सबसे ऊपर नए चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज के तौर पर जगह मिली है.

[ad_2]

पाई-पाई को मोहताज हुआ पाकिस्तान! IMF ने लगाई जमकर फटकार, जानें वजह

[ad_1]


पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिशों को बड़ा झटका लगा है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पाकिस्तान के स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल (SIFC) की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और संरचना पर गंभीर सवाल उठाए हैं. यह काउंसिल सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की अगुवाई में बनाई गई थी, ताकि देश में विदेशी निवेश लाया जा सके, लेकिन IMF के मुताबिक यह अब तक अपने लक्ष्य पूरे नहीं कर पाई है.

IMF की नाराजगी
IMF ने पाकिस्तान सरकार से मांग की है कि SIFC की सालाना रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, जिसमें साफ तौर पर बताया जाए कि उसने कितने निवेश लाए और किन प्रोजेक्ट्स पर काम हुआ. IMF का कहना है कि यह संस्था बिना किसी संवैधानिक दर्जे के काम कर रही है और अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेने में सक्षम नहीं है.

विदेशी निवेश पर फेल SIFC
तीन साल बीत जाने के बाद भी SIFC कोई बड़ा विदेशी निवेश लाने में नाकाम रही है. कई विदेशी कंपनियां पाकिस्तान से अपना कारोबार समेट चुकी हैं, जिनमें फाइजर,  प्रोक्टर एंड गैंबल, शेल, टेलेनर, करीम, सनोफी-एवेनटिस, और एली लिली जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं.

 सेना की बढ़ती दखलंदाजी पर चिंता
SIFC में सेना की भूमिका काफी प्रमुख है. इसे लेकर IMF और आर्थिक विश्लेषकों ने चिंता जताई है. उनका कहना है कि अगर गलत आर्थिक फैसले हुए तो कोई भी संस्था उसकी जिम्मेदारी नहीं लेगी.

पाकिस्तान की आर्थिक हालत
इमरान खान सरकार के जाने के बाद से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगातार कमजोर होती जा रही है. देश में महंगाई बढ़ रही है, विदेशी मुद्रा भंडार घट रहा है और रुपया लगातार कमजोर हो रहा है.

खुद SIFC के अधिकारी ने मानी कमियां
काउंसिल के नेशनल कोऑर्डिनेटर लेफ्टिनेंट जनरल सरफराज अहमद ने भी माना है कि भारी टैक्स और सुपर टैक्स जैसी नीतियां आर्थिक विकास को रोक रही हैं. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अपने आर्थिक मॉडल और निवेश नीतियों में सुधार करना होगा.

अब आगे क्या?
SIFC विदेशी निवेश लाने के लिए बनाई गई थी ताकि फैसलों में तेजी और पारदर्शिता आए, लेकिन अब IMF की नाराजगी के बाद पाकिस्तान सरकार पर दबाव है कि वह इस संस्था में बड़े सुधार करे या इसे पूरी तरह से बदल दे.

[ad_2]

हमास को दुश्मन न समझने वाला पाकिस्तान गाजा में क्यों उतार रहा अपनी सेना, मुनीर का क्या है प्लान

[ad_1]

Show Quick Read

Key points generated by AI, verified by newsroom

अंतरराष्ट्रीय शांति मिशन के तहत पाकिस्तान गाजा में सेना भेजने को तैयार हो गया है. पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने शनिवार (29 नवंबर) को कहा कि उनका देश गाजा में सुरक्षा बलों को तैनात करने के लिए तैयार है, लेकिन हमारे सैनिक फिलिस्तीनी आतंकवादी समूह हमास को निरस्त्र करने में भाग नहीं लेंगे.

पाकिस्तानी विदेश मंत्री का ये बयान अमेरिका के गाजा शांति समझौते पर चर्चा तेज होने के बीच आया है, जिसमें मुस्लिम बहुल देशों के सैनिकों से बने अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (ISF) की स्थापना का प्रावधान है. इशाक डार ने बताया कि गाजा में सेना भेजने का फैसला प्रधानमंत्री ने फील्ड मार्शल से परामर्श के बाद लिया है.

इशाक डार ने क्या कहा
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में इशाक डार ने कहा कि पाकिस्तान केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्पष्ट रूप से परिभाषित आदेश के तहत ही सेना भेजेगा और पाकिस्तानी सेना हमास को निरस्त्र करने में कोई भूमिका नहीं निभाएगी.’ डार ने जोर देकर कहा कि हमास को निरस्त्र करने का मुद्दा पहले रियाद में दो-राज्य समाधान पर हुई बातचीत के दौरान उठा था. पाकिस्तान इस तरह के किसी भी प्रयास में भाग नहीं लेगा. हम इसके लिए तैयार नहीं हैं. ये हमारा काम नहीं है. हमारा रोल शांति स्थापना का है. 

इंडोनेशिया ने 20,000 सैनिकों की पेशकश की 
डार ने कहा कि पाकिस्तान का काम शांति सुनिश्चित करना है. हम अपनी सेनाएं भेजने को तैयार हैं, लेकिन गाजा के लिए अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल का आदेश स्पष्ट रूप से निर्धारित होना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने पाकिस्तान की भागीदारी पर सहमति दे दी है, लेकिन ये ISF के जनादेश और कार्य क्षेत्र के स्पष्ट होने पर निर्भर करेगा. इंडोनेशिया ने इस मिशन के लिए 20,000 सैनिकों की पेशकश की है. 

UNSC ने ISF की तैनाती को दी मंजूरी
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने पिछले हफ्ते गाजा संघर्ष को खत्म करने के लिए ट्रंप के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए एक अमेरिकी प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. इसमें ISF की तैनाती को भी अधिकार दिया गया था. पाकिस्तान समेत 13 सदस्यों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया, जबकि रूस और चीन ने मतदान से दूरी बनाए रखी. वहीं, दूसरी ओर हमास ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया और प्रस्तावित ISF की कड़ी निंदा की. 

ये भी पढ़ें

National Herald Case: EOW ने नेशनल हेराल्ड मामले में नई FIR की दर्ज, जानें क्यों बढ़ सकती है सोनिया-राहुल की मुश्किलें

[ad_2]