बशर अल असद पतन सीरिया दमिश्क पर कब्ज़ा ईरान इज़राइल अमेरिका संयुक्त अरब अमीरात विश्व नेताओं की प्रतिक्रिया सीरिया गृहयुद्ध क्या है

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बशर अल असद पतन: 13 साल तक चले भीषण युद्ध में न जाने कितनी बातें। बड़ी-बड़ी संपत्तियां बर्बाद हो गईं और अब सीरिया में विद्रोही समूह ने राजधानी दमिश्क पर अपना कब्जा जमा लिया है। विद्रोही समूह नू अलसारा फ्रंट ने देश को आजाद घोषित करते हुए कहा कि राष्ट्रपति बशर अल-असद भाग गए हैं। सीरिया में चल रहे इस महासागर को लेकर देश के लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

सीरिया की स्थिति को लेकर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने कहा कि सीरिया के लिए अब यह सुनिश्चित करना सबसे जरूरी है कि वहां एक समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया शुरू हो। देश को अब अपनी स्थिरता बहाल करनी होगी। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बिडेन सीरिया की स्थिति पर चर्चा करने के लिए रविवार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों से मुलाकात कर रहे हैं।

इजराइल क्या बोला?

इजराइल की बात करें तो उसकी स्थिति को अलग नजरिए से देखा जाता है। इजराइल का कहना है कि सीरिया में ज्यादातर इलाके अल कायदा और आईएसआईएस से जुड़े मरीजों के नियंत्रण में हैं। इजरायली सेना ने गोलन हाइट्स में अपनी किताब और टाइट कर दी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि बशर की सरकार गिरना एक ऐतिहासिक दिन है।

चीन में बदसूरत से नजर रख रही है

वहीं चीन का कहना है कि वह सीरिया की स्थिति को करीब से देख रहा है और उम्मीद कर रहा है कि वहां जल्द स्थिरता आएगी।

‘चरमपंथी शक्तियों के हाथ न लगे देश’

जर्मनी के विदेश मंत्री बियर्सबॉक का कहना है कि राष्ट्रपति बशर अल असद का पतन सीरिया की जनता के लिए बड़ी राहत है। उनका कहना है कि देश को चरमपंथी ताकतों के हाथ में जाने से रोकने की जरूरत है।

‘सीरिया की जनता का फैसला’

सीरिया में अल-असद सरकार का करीबी माने जाने वाले ईरान ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सीरिया के भविष्य का फैसला सीरिया की जनता को ही लेना चाहिए। इसमें किसी भी बाहरी व्यक्ति के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

फ़ायदा ना उठाओ पाया कोई साथी संगठन

वहीं तुर्किये के विदेश मंत्री ने भी सीरिया की स्थिति पर कहा कि सत्ता का स्थानांतरण हो रहा है, लेकिन देश में यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि कोई भी अपराधी संगठन अपराध का लाभ न उठाए।

‘ये राजनीतिक विफलता का परिणाम’

संयुक्त अरब अमीरात के सलाहकार बयालिया गर्गश ने कहा कि गैर-राज्य संसाधनों को राजनीतिक शून्यता का लाभ नहीं उठाना चाहिए। यूएई ने सीरिया की स्थिति को लेकर राजनीतिक विफलता के बारे में बताया।

पुनर्निर्माण में सहायता यूरोपियन कमीशन

यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष उर्सुला वोन डेर लेयेन ने रविवार को घोषणा की कि यूरोपीय संघ सीरिया के पुनर्निर्माण में सहायता के लिए तैयार है। वह बशर अल असद के पतन के बाद अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

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बशर अल असद के सत्ता से बाहर होने और विद्रोही एचटीएस समूह के सीरिया पर कमान संभालने के बाद सीरिया में गृहयुद्ध समाप्त हो गया

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एचटीएस ने सीरिया पर कमान संभाली: राष्ट्रपति बशर अल-असद के शासन के बाद सीरिया के भविष्य को मंजूरी नहीं दी गई है। कभी अजेय माने जाने वाले असद शासन को हयात शॉपी अल-शाम (एचटीएस) के नेतृत्व में सीरियाई विद्रोहियों ने बमबारी करके विध्वंस कर दिया है। हयार साजिद अल-शाम को पहले अल-नुसा के नाम से जाना जाता था, जिसका अल-कायदा से सीधा संबंध था।

उनके पिता हजरत अल-असद ने लगभग तीन दशकों के बाद साल 2000 में सीरिया का शासन अपने हाथों में ले लिया था। बशर अल-असद के शासन की शुरुआत में लोगों में ये अनोखी जगह थी कि बशर सीरिया में सुधार, बदलाव और खुलापन लाएंगे। हालाँकि बशर ने अपने पिता के दमनकारी शासन ढाँचे और अपनी मजबूत इकाइयाँ और ढाँचे बनाए रखे। जिन लोगों की ये डिटेल जल्दी ही टूट जाती है।

बशर की विरासत 2011 के विरोध प्रदर्शनों का काला धब्बा

सीरिया के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद की प्रतिक्रिया के कारण उनकी विरासत में 2011 में विरोध प्रदर्शनों का काला धब्बा रहेगा। जो आगे की ओर एक खूनी गृहयुद्ध में बदल दिया गया था। इन विरोध प्रदर्शनों में 5 लाख से ज्यादा लोग मारे गए, करीब 60 लाख लोग हिट हो गए और अनगिनत लोग मारे गए।

युद्ध में शामिल थे रूस-ईरान, नहीं मिली असद की मदद

वर्तमान में रूस और ईरान अपने-अपने संघर्षों में उलझे हुए हैं। जहां रूस जापानी के साथ युद्ध में संघर्ष कर रहा है। वहीं, ईरान अपने क्षेत्रीय उद्घाटन का सामना कर रहा है। यही कारण है कि दोनों देशों को इस बेहद कठिन समय में असद को महत्वपूर्ण समर्थन नहीं मिला। इसी स्थिति का लाभ उठाते हुए विद्रोहियों ने कुछ ही दिनों में सीरिया के अलेप्पो, हमा और होम्स जैसे प्रमुख शहरों पर कब्जा कर लिया और फिर दमिश्क की ओर बढ़ गए।

मोहम्मद अल-जलाली को सीरिया की विचारधारा से अलग किया गया

विद्रोही गुट के नेता अबू मोहम्मद अल-गलानी ने असद शासन का तख्तापलट करके एक संक्रमणकालीन सरकार के गठन की घोषणा की है। सीरिया के प्रधानमंत्री मोहम्मद अल-जलाली को राज्य स्टॉक एक्सचेंज के लिए कैरेटकर नियुक्त किया गया है। वहीं, एक बयान में अल-जलाली ने सीरिया के लोगों को किसी भी नेतृत्व के साथ सहयोग करने की बात कही है।

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सीरिया गृहयुद्ध लाइव समाचार अपडेट हयात तहरीर अल शाम ने राजधानी दमिश्क में कर्फ्यू लगा दिया

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सीरिया गृह युद्ध: सीरियाई विद्रोहियों ने राजधानी दमिश्क में रविवार (8 दिसंबर) को स्थानीय समय के मुताबिक शाम 4 बजे से सोमवार (9 दिसंबर) सुबह 5 बजे तक काबुल का ऐलान कर दिया है. हयात साजिद अल-शाम (एचटीएस) के कमांडर अबू मोहम्मद अल-जोलानी के नेतृत्व में विद्रोहियों ने सीरिया की राजधानी दमिश्क पर कब्जा कर लिया और सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद की सत्ता का तख्तापलट कर दिया।

इससे पहले बशर अल-असद विमान से किसी अज्ञात स्थान के लिए उड़ान हो चुकी है। असद शासन के बाद सीरिया में अब क्या स्थिति है। आइए आपको नियुक्त करते हैं.

फ्रांस ने सीरिया में असद शासन के पतन का स्वागत किया

फ्रांस ने रविवार (8 दिसंबर) को सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद के शासन के पतन का स्वागत किया और लोगों के खिलाफ एक दशक से अधिक समय से चल रही हिंसा का अंत बताया।

एक बयान में फ्रांस के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता क्रिस्टोफ़ लेम्बिन ने सीरिया के लोगों की एकता और मेल-मिलाप को बढ़ाने और सभी प्रकार के कट्टरवाद और उग्रवाद को स्वीकार करने की अपील की है।

तुर्की के विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?

तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने रविवार (8 दिसंबर) को कहा, ‘सीरिया में असद शासन के पतन के बाद अब वहां के लाखों अमीर लोग अपने देश लौट सकते हैं।’

विदेश मंत्री ने कतर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान असद की सुरक्षा और सुरक्षा के संबंध में पूछे गए सवाल में कहा, ‘सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद शायद अब देश में नहीं हैं।’ क्योंकि इस्लामिक विद्रोहियों ने भी यह दावा किया है कि उन्होंने देश छोड़ दिया है।’

दमिश्क में ईरानी दूतावास पर हमला हुआ

रविवार (8 दिसंबर) को एक ईरानी राज्य टेलीविजन ने रिपोर्ट दी कि सीरिया की राजधानी दमिश्क में बशर अल-असद के पतन की घोषणा के बाद ईरान के दूतावास पर भी हमले हुए हैं। राज्य टेलीविजन प्रसारक ने घोषणा की कि, ‘अज्ञात हमलावरों ने ईरानी दूतावास में घुसपैठ कर हमला किया है।’

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ब्रिटेन के राजा चार्ल्स ने दो ब्रिटिश भारतीय समुदाय के नेताओं से सम्मान वापस ले लिया

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ब्रिटिश राजा चार्ल्स तृतीय का आदेश: ब्रिटेन के राजा चार्ल्स तृतीय ने ब्रिटिश भारतीय समुदाय के दो नेताओं का सम्मान वापस ले लिया है। इन दोनों ब्रिटिश भारतीय समुदाय के प्रमुख ग्रेड के नाम रामी रेंजर और हिंदू काउंसिल यूके के ट्रस्टी अनिल भनोट हैं। इनमें से एक से बांग्लादेशी बांग्लादेशी के लिए और दूसरे से भारत के प्रधानमंत्री की बात नरेंद्र मोदी समर्थन करने के लिए सम्मान छीना गया है।

मीडिया सिद्धांत के अनुसार, शुक्रवार (6 दिसंबर) को ‘लैंडन गजट’ में इस बात की घोषणा की गई थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों ब्रिटिश इंडियन से अपना प्रतीक चिन्ह बकिंघम पैलेस को वापस लौटने को कहा जाएगा। वहीं, रामी रेंजर और अनिल भनोट ने इसके ऑर्डर की घोषणा की निंदा करते हुए इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया है।

दोनों ब्रिटिश भारतीय किस सम्मान से प्रतिष्ठित हैं?

उल्लेखनीय है कि करोड़पति रामी रेंजर को सीबीआई (ब्रिटिश एम्पायर के कमांडर ऑफ द ऑर्डर) और लीसेस्टर में एसीएल कला केंद्र द्वारा संचालित करने वाले खातेदार अनिल भनोट को ओबीई (ब्रिटिश एम्पायर के ऑर्डर ऑफ द ऑर्डर के अधिकारी) की डिग्री दी गई थी। अब किंग चार्ल्स तृतीय ने यह सम्मान वापस मांगा है।

बता दें कि एक जेबी कमेटी उन मामलों पर विचार करती है, जिनमें प्रमुख सचिव को सम्मान प्रणाली बनाने पर विचार किया जा सकता है। ज़ेज़ी समिति के सलाहकार ब्रिटेन के प्रधान मंत्री कीर स्टारमर के माध्यम से राजा को छोड़ दिया गया है।

मेरे दिल पर ध्यान नहीं दिया-अनिल भनोट

ओबीई सम्मान पाने वाले अनिल भनोट ने कहा, ‘जनवरी में जेल कमेटी ने संपर्क किया था और उन्होंने अपना पक्ष रखा था।’ रिपोर्ट के अनुसार भनोट ने जानकारी दी कि इस्लामोफोबिया के आरोप वाली याचिका 2021 में बांग्लादेश में हुई हिंसा के बारे में जानकारी दी गई थी। उन्होंने कहा कि उस समय हमारी मूर्तियों को नष्ट किया जा रहा था और संस्थाओं पर हमला किया जा रहा था लेकिन मीडिया ने इसकी खबर नहीं दी। मुझे लगा कि कुछ कहना चाहिए. मुझसे कुछ भी ग़लत नहीं हुआ और न ही मेरे सम्मान सम्मान को बदनाम किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि इंग्लैंड में अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अतीत की बात हो गई है। मैं इससे काफी हूं. क्योंकि यह एक सम्मान की बात है, मुझे नहीं लगता कि उन्होंने मेरी बातों पर भी पूरा ध्यान दिया।

यह निर्णय अन्यायपूर्ण हैं, इसे चुनौती दी गई है– रामी रेंजर

कंजर्वेटिव पार्टी के समर्थकों और ब्रिटेन में एफएमसीजी फर्म सन मार्क लिमिटेड के संस्थापक लॉर्ड रामी रेंजर के प्रवक्ता ने इस फैसले को अन्यायपूर्ण बताया और कहा कि उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी है। रामी रेंजर को दिवंगत महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने दिसंबर 2015 में ब्रिटिश व्यापार और एशियाई समुदाय की सेवाओं के लिए सीबीआई सम्मान से सम्मानित किया था।

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सीरिया गृहयुद्ध सीरियाई विद्रोहियों का नेता अबू मोहम्मद अल-जोलानी कौन है हयात तहरीर अल-शाम एचटीएस

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कौन हैं अबू मोहम्मद अल-जोलानी: सीरियाई विद्रोहियों ने अपना कब्ज़ा जमा लिया है। विद्रोहियों ने रविवार (8 दिसंबर 2024) को राजधानी दमिश्क और सरकारी टीवी नेटवर्क पर कब्जा कर लिया। रॉयटर्स न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद विमान में किसी अज्ञात स्थान के लिए सवार हो गए हैं। सेना से भी समर्पण करने के लिए कहा गया है।

कुल मिलाकर सीरिया के विद्रोही गुट हयात शमीम अल शाम (एचटीएस) ने पूरे सीरिया पर कब्जे की घोषणा की है। इन सबके बीच अब लोगों के मन में यही सवाल उठ रहा है कि आखिर एचटीएस क्या है और आईएस के मुखिया अबू मोहम्मद अल जोलानी कौन हैं जिन्होंने सभी बंदूकधारी विद्रोहियों को एक साथ कर दिया और राष्ट्रपति बशर अल-असद को देश खाली करने के लिए मजबूर कर दिया। .

पहले हयात शालिअम अल शाम को मंजूरी

सीरिया में जिस विद्रोही गुट ने पूरे देश पर कब्ज़ा कर लिया है और राष्ट्रपति बशर अल-असद को जबरदस्ती उसका नाम हयात गमिया अल शाम बताया है। यह गुट लंबे समय से बशर सरकार के खिलाफ लड़ रहा था। यह कभी आंतकी संगठन अल कायदा की शाखा रही है। हालाँकि, 2016 में इस संगठन ने खुद को अल क़ायदा से अलग कर लिया था। एचटीएस का नेतृत्व अब अबु मोहम्मद अल जोलानी के पास है, जिसे बेहद कट्टर माना जाता है। पश्चिमी देश एचटीएस को आतंकवादी संगठन माना जाता है।

अबू मोहम्मद अल-जोलानी कौन है?

हयात साजिद अल शाम के प्रमुख अबु मोहम्मद अल जोलानी एक इस्लामिक नेता हैं, लेकिन वह खुद के आधुनिक होने का दावा करते हैं। जब जोलानी ने एचटीएस को अल कायदा से अलग किया था, तब उनका मकसद सीरिया की सत्ता से बशर अल असद सरकार को अलग करना था। अबु जोलानी का जन्म 1982 में हुआ था। उसकी स्थापना सीरिया की राजधानी दमिश्क के मजेह इलाके में हुई। जोलानी के परिवार का गोलान हाईट क्षेत्र से है। कई साक्षात्कारों में उन्होंने दावा किया है कि उनके दादा को वर्ष 1967 में गोलान हाइट्स से भागना पड़ा था, तब यहां इज़राइल का कब्ज़ा हो गया था।

बशर अल-असद के शासन को उखाड़ फेंकना था लक्ष्य

जोलानी ने शुक्रवार (6 दिसंबर 2024) को सीएनएन को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा, “जब हम अपने अनुयायियों के बारे में बात करते हैं, तो हमारी क्रांति का लक्ष्य इस शासन को उखाड़ फेंकना है। उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सभी उपलब्ध संगीतकार का उपयोग करना हमारा अधिकार है।”

इस तरह एचटीएस आया वजूद में

2016 में अल-क़ायदा से नाता तोड़ने के बाद जोलानी ने खुद को अधिक उदारवादी नेता के रूप में पेश किया, अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों को अब भी एच.एस. आतंकवादियों को एक हत्यारा संगठन ही माना जाता है।

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सीरिया विद्रोहियों ने दमिश्क में प्रवेश किया, सैनिकों को आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया गया, बशर अल-असद भागे, जानिए 10 नवीनतम अपडेट

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सीरिया गृह युद्ध अद्यतन: सीरिया में विध्वंसक अभिलेख हो रहे हैं। विद्रोहियों ने कई शहरों पर कब्ज़ा कर लिया। वो अब दमिश्क की तरफ बढ़ रहे हैं। दमिश्क अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सुपरमार्केट मची हुई है।

एक सप्ताह से भी कम समय में विद्रोही समूह ने लगभग हर बड़े शहर पर कब्ज़ा कर लिया। बता दें कि बशर-अल असद पिछले 24 वर्षों से सत्ता में है। वो इस्लामिक स्टेट के खिलाफ कई कट्टरपंथी गुटों के 14 साल के गृहयुद्ध के दौरान भी सत्ता में रहे हैं। आइए जानते हैं 10 बड़े लेटेस्ट अपडेट.

सीरिया को लेकर 10 नवीनतम अपडेट

  1. दमिश्क अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से सभी कर्मचारी रवाना हुए, सभी उड़ानें रोक दी गईं। राजधानी में फिर हुआ विस्फोट.
  2. रॉयटर्स की खबर के अनुसार, सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद एक विमान में सवार होकर दमिश्क से किसी अज्ञात स्थान के लिए रवाना हो गए हैं।
  3. एचटीएस नेता अहमद अल-शरा ने विद्रोही लड़ाकों पर एक संदेश दिया है। अपना असली नाम अबू मोहम्मद अल-जोलानी का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने कहा कि दमिश्क आपका इंतजार कर रहा है।
  4. राष्ट्रपति बशर-अल असद के सैन्य नेतृत्व ने दमिश्क में शेष सैनिकों को आत्मसमर्पण का आदेश दे दिया है।
  5. सीरियाई विद्रोहियों ने दमिश्क के नजदीकी जेल में बंदियों की स्थापना की है। सीरियाई लड़ाकों का कहना है कि उसके लड़ाकों ने दमिश्क के पास सेडोनाया जेल की सभी जेलों को रिहा कर दिया है।
  6. विद्रोहियों ने अलेप्पो और हम्स पर कब्जे के बाद तीसरे सबसे बड़े सिटी होम्स पर अपना पूरा नियंत्रण ले लिया। वो तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.
  7. देश के लंबे समय से चल रहे गृहयुद्ध में पहली बार सरकार के पास अब 14 प्रांतीय राजधानियों में से केवल तीन (दमिश्क, लाबाकिया और टार्टस) पर नियंत्रण है।
  8. सीरिया को लेकर अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड डोनाल्ड ने कहा कि यह हमारी लड़ाई नहीं है। हमें सीरिया में बढ़ते संघर्ष से दूर रहना चाहिए। असद ने रूस और ईरान का सबसे अधिक समर्थन किया है।
  9. तेहरान ने शनिवार को सीरिया में इस्लामिक गणराज्य के दूतावास को खाली करने की खबरों को खारिज कर दिया। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने दावा किया कि दूतावास पहले किस तरह का काम कर रहा है।
  10. शुक्रवार को आई कुछ मीडिया में दावा किया गया कि ईरान ने सीरिया में अपने कर्मचारियों और उनके परिवार के बीच लड़ाई शुरू कर दी है।

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एस जयशंकर ने दोहा फोरम में डॉलरीकरण और वैश्विक कूटनीति पर विचार साझा किए और ब्रिक्स मुद्रा पर स्पष्टीकरण दिया

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डॉलरीकरण पर एस जयशंकर: भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शनिवार (7 दिसंबर 2024) को दोहा फ़ोर्ट्स में ‘डी-डॉलर स्माइक’ और ग्लोबल डेमोक्रेसी पर अपने विचार साझा किये। उन्होंने कहा कि भारत कभी भी अमेरिकी डॉलर का लाभ लेने के पक्ष में नहीं है। यह टिप्पणी ब्रिक्स देश की ओर से एक साझा मुद्रा पर विचार करने और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड वालक की सलाह के संदर्भ में दी गई है। जयशंकर ने साफ किया कि अवलोकन ब्रिक्स मुद्रा पर कोई प्रस्ताव नहीं है और इस मुद्दे पर ब्रिक्स देश का रुख समान नहीं है।

जयशंकर ने कहा कि उन्होंने वामपंथ की टिप्पणी के पीछे के संकेतों को स्पष्ट नहीं किया है, लेकिन भारत ने हमेशा यही रुख अपनाया है कि वह ‘डी डॉलर स्टार्टअप’ का समर्थन नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देश के बीच इस मुद्दे पर बहस चल रही है और यह कोई नया प्रस्ताव नहीं है। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि हर देश को अपना हित हो सकता है और वे कई सिद्धांतों पर सहमत हो सकते हैं और असहमत हो सकते हैं।

जयशंकर ने आगे कहा कि भारत का दृष्टिकोण अधिक नवोन्मेषी और भागीदारी पूर्ण नामांकन की दिशा में है। उन्होंने यह भी कहा कि अब एशिया को पश्चिमी शक्तियों को विकसित करने का साहस दिखाना चाहिए। उनके अनुसार, दुनिया में चल रहे संघर्षों को देखते हुए वैज्ञानिकों के लिए एक नई रणनीति की जरूरत है और भारत इस दिशा में अपना नेतृत्व दिखा रहा है।

दुनिया की असलियत काफी जटिल- एस जयशंकर

दोहा पर्यटन में अपने विचार साझा करते हुए जयशंकर ने कहा कि यह दुनिया की वास्तविकता बहुत जटिल और औद्योगिक है। उन्होंने कहा कि हर देश अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी रणनीति अपनाता है और कभी-कभी एक ही देश कई सिद्धांतों पर कई घटकों में काम करता है।

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राष्ट्रपति अल असद के खिलाफ तख्तापलट की तैयारी पर डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि अमेरिका को सीरिया में युद्ध में शामिल नहीं होना चाहिए

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सीरिया संघर्ष पर डोनाल्ड ट्रम्प: सीरिया में तेजी से आगे बढ़ती विद्रोही सेनाओं का कहना है कि उन्होंने राजधानी दमिश्क को घेरना शुरू कर दिया है। मामले में अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड डोनाल्ड ने शनिवार (07, दिसंबर 2024) को कहा था कि अमेरिका को सीरिया की स्थिति में “शामिल नहीं होना चाहिए”।

उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “सीरिया में फ़ोर्सिट लड़ाकू विमानों ने एक अभूतपूर्व कदम उठाया है, एक भयानक समन्वित हमलों में कई शहरों पर पूरी तरह से कब्ज़ा कर लिया है और अब वे दमिश्क के बाहरी इलाकों में हैं, जाहिर तौर पर असद को।” बाहर की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रहे हैं।”

बराक ओबामा का ज़िक्र कर क्या डोनाल्ड बोले

उन्होंने कहा, “रूस यूक्रेन में बहुत उथल-पुथल मची हुई है और वहां 600,000 से अधिक सैनिकों की क्षति के साथ सीरिया के माध्यम से इस मार्च को प्रतिबंध में दिखाई देता है, एक ऐसा देश जिसे उसने सार्जेंट से संरक्षित किया है।” यही वह जगह है जहां पूर्व राष्ट्रपति ओबामा ने रेत में लाल रेखा की रक्षा के लिए अपने विद्रोह का सम्मान करने से इंकार कर दिया था और रूस के हस्तक्षेप के साथ सब कुछ किया था। लेकिन अब वे संभावित रूप से असद की तरह बाहर जा रहे हैं और यह वास्तव में उनके लिए सबसे अच्छी बात हो सकती है।

‘सीरिया हमारा दोस्त नहीं’

“रूस के लिए सीरिया में कभी भी कोई बहुत बड़ा फ़ायदा नहीं था, राष्ट्रपति ओबामा वास्तव में मूर्ख थे। किसी भी स्थिति में सीरिया एक विशेषता है, लेकिन हमारा मित्र नहीं है और संयुक्त राज्य अमेरिका को इससे कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। ये हमारी लड़ाई नहीं है. यह काम करता है. इसमें शामिल न हों!”

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एस जयशंकर ने रूस-यूक्रेन संघर्ष का शांतिपूर्ण समाधान निकालने में भारत की भूमिका को रेखांकित किया | रूस-यूक्रेन जंग में रुकने पर सफल होगा भारत? जयशंकर बोले

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रूस-यूक्रेन युद्ध पर एस जयशंकर: भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दोहा फोरम में रूस-यूक्रेन युद्ध पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि भारत की भूमिका इस जंग को बातचीत के माध्यम से बताती है कि न कि युद्ध को बढ़ावा दिया जाए। उन्होंने कहा, “सुई वॉर रिलीज़ की तुलना में बातचीत की वास्तविकता की ओर अधिक वृद्धि हो रही है।” उन्होंने साफ किया कि भारत हमेशा से ही प्लास्टिक सॉल्यूशन का पक्षधर रहा है और यह नीति उसे वैश्विक मंच पर अंतिम रूप देती है।

जयशंकर ने बताया कि भारत ने इस जंग में समुद्र तट पर स्थित दोनों सितारों से बातचीत की है। उन्होंने कहा, “और रूस और यूक्रेन दोनों के बीच संवाद जारी है। भारत ने मास्को में राष्ट्रपति समझौते से कीव में राष्ट्रपति जेलेंस्की से मिलकर समझौते से एक-दूसरे के साथ संदेश साझा किया है।” उनके अनुसार, भारत का उद्देश्य एक साझी सूत्र की खोज है, जिसका उपयोग भविष्य में किया जा सके, जिससे युद्ध की नींव रखी जा सके और शांति की प्रक्रिया में कोई भेदभाव न हो।

वैश्विक हितों की सुरक्षा

जयशंकर ने आगे कहा कि भारत इस संघर्ष से वैश्विक दक्षिण हितों को भी प्रभावित कर रहा है। उन्होंने बताया, “125 अन्य देशों की भावनाओं और उनकी मांगों पर ध्यान दिया गया, भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि उनका ध्यान इस द्वारा उत्पन्न होने वाली समस्याएं युद्ध पर हो, जैसे कि जंगल, खाद्य पदार्थों के संप्रदाय में वृद्धि, प्रारूप और मानक की जनसंख्या लागत.

भारत की अभिलेखीय भूमिका में नई दिशा

भारत का यह दृष्टिकोण वैश्विक पत्रिका में उनके नेतृत्व और साझीदार समाधान की दिशा में ठोस कदमों को दर्शाता है। जयशंकर के अनुसार, भारत ने संघर्ष के सभी लक्ष्यों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की है, जिससे विश्व में शांति और स्थिरता की दिशा में एक नया रास्ता खुल सके।

इस दृष्टिकोण से भारत ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है और यह संकेत दिया है कि वह सदैव संघर्षों के समाधान में साझेदारी और संवाद की ओर से जारी रहेगा, न कि किसी सैन्य विकल्प की ओर। भारत के इस दृष्टिकोण से यह भी सिद्ध होता है कि वह वैश्विक दक्षिण हितों को प्राथमिकता देते हुए, संघर्षों के समाधान में एक सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।

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बांग्लादेश में इस्कॉन मंदिर पर फिर से हमला, कट्टर पंथियों ने स्तुति के बाद आग लगा दी

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बांग्लादेश में हिंदू मंदिर पर हमला: बांग्लादेश में कट्टर पंथियों का गद्दारों और हिंदू पोस्टरों पर हमला जारी है। शुक्रवार की रात (6 दिसंबर 2024) ढाका में एक और हिंदू मंदिर के निर्माण की खबर है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कट्टरपंथी पंथियों ने इस्कॉन नामहट्टा मंदिर ढाका पर शुक्रवार रात हमला किया।

बताया जा रहा है कि सबसे पहले देवताओं की मूर्तियों में आग लगी थी। बांग्लादेश में स्थित इस मंदिर का प्रबंधन इस्कॉन कर रहा था। इसके अलावा इस हमले के बाद एक बार फिर हिंदू धर्मगुरुओं ने आरोप लगाया है कि कट्टर कट्टरपंथी किशोर विचारधारा वाले लोग बने हुए हैं और मोहम्मद यूनुस मूकदर्शक बने हुए हैं।

कोलकाता इस्कॉन के उपाध्यक्ष ने की पुष्टि

कोलकाता इस्कॉन के उपाध्यक्ष राधारमण दास ने भी इस घटना की पुष्टि की है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “मंदिर की टिन की छत को हटा दिया गया और अवशेषों को नष्ट कर दिया गया, जिस पर पहले पेट्रोल डाला गया था। एक सप्ताह पहले, इस्कॉन नमहट्टा केंद्र को मुस्लिम भीड़ ने बंद करा दिया था। चिन्मय कृष्ण दास प्रभु और उनके सहयोगियों की हाल ही में हुई है गद्दार, हिंदू संगठन इस्कॉन पर प्रतिबंध के प्रयास और हिंदू विरोध के माध्यम से देशद्रोह का आरोप जारी है।

चिन्मय कृष्ण दास की अपराधियों के बाद से और भद्दे हमले

बता दें कि शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से ही हिंदुत्व पर हमलों के मामले भड़के हुए थे, लेकिन 25 नवंबर को ढ़ाका में गद्दारों के हमले के बाद से ही एकता सनातनी भगत जोत से जुड़े चिन्मय कृष्ण दास पर लगे आरोपों में तेजी आई है। कट्टर हिंदू पेंटिंग को कॉन्स्टेंटिनोपल बनाए जा रहे हैं। 31 अक्टूबर को चिन्मय दास की गिरफ़्तारी के बाद एक स्थानीय राजनेता की याचिका दायर की गई थी, जिसमें चिन्मय दास और अन्य हिंदू समुदाय की एक रैली के दौरान बांग्लादेश के राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने का आरोप लगाया गया था।

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