मोबाइल नंबर वैलिडेशन नहीं करवाया तो फंस जाओगे! बैंक में अचानक रुक सकती है आपकी सर्विस, जानें क्या है नया नियम

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मोबाइल नंबर वैलिडेशन नहीं करवाया तो फंस जाओगे! बैंक में अचानक रुक सकती है आपकी सर्विस, जानें क्या है नया नियम

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TECH EXPLAINED: क्या होता है Dark Web? जानिए क्यों होता है ये खतरनाक और इसे चलाने पर कितने साल

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Dark Web: इंटरनेट आपने कई बार इस्तेमाल किया होगा गूगल पर सर्च करना, सोशल मीडिया चलाना, यूट्यूब देखना या ऑनलाइन शॉपिंग करना. लेकिन यह सब इंटरनेट का वही हिस्सा है जिसे Surface Web कहा जाता है. इसके नीचे एक ऐसी दुनिया मौजूद है जहां आम यूजर्स की पहुंच नहीं होती. यह दुनिया है Dark Web एक ऐसा इंटरनेट जो रहस्यों, अपराधों और खतरों से भरा होता है. कई लोग गलतफहमी में यह सोच लेते हैं कि Dark Web सिर्फ एक निजी इंटरनेट है जबकि सच इससे कहीं ज्यादा गंभीर है. आइए इस बड़ी और बेहद खतरनाक डिजिटल दुनिया को विस्तार से समझें.

Dark Web क्या होता है?

Dark Web इंटरनेट का वह हिस्सा है जिसे आम ब्राउज़र जैसे Chrome, Firefox या Safari से खोला नहीं जा सकता. इसे एक्सेस करने के लिए खास तरह के ब्राउजर जैसे Tor Browser, I2P या Freenet का इस्तेमाल होता है. इस हिस्से पर मौजूद वेबसाइट्स “.onion” जैसे अनोखे डोमेन का इस्तेमाल करती हैं जो साधारण इंटरनेट से पूरी तरह अलग होता है.

Dark Web की सबसे बड़ी खासियत और खतरा यह है कि यहां पहचान (identity) छुपी रहती है. जो लोग Dark Web पर काम करते हैं चाहे अच्छे हों या बुरे, वे गुमनाम रह सकते हैं. इसी वजह से यहां अवैध गतिविधियों का जन्म हुआ.

Surface Web, Deep Web और Dark Web में क्या अंतर है?

इंटरनेट को आमतौर पर तीन हिस्सों में बांटा जाता है:

Surface Web

यह इंटरनेट का वह हिस्सा है जिसे हम रोज देखते और इस्तेमाल करते हैं. इसमें Google, YouTube, Facebook, Instagram, न्यूज वेबसाइट्स, ई-कॉमर्स साइट्स, ये सभी सर्च इंजनों पर दिखाई देते हैं.

Deep Web

यह इंटरनेट का वह भाग है जिसे सर्च इंजन नहीं दिखा सकते क्योंकि यह पासवर्ड या लॉगिन के पीछे छिपा होता है. जैसे बैंक अकाउंट, ईमेल, मेडिकल रिकॉर्ड, प्राइवेट डेटाबेस. Deep Web पूरी तरह सुरक्षित और कानूनी है.

Dark Web

यह Deep Web का एक छोटा हिस्सा है, लेकिन सबसे खतरनाक. यहां ऐसा कंटेंट और गतिविधियां होती हैं जिनकी कानूनी अनुमति नहीं है. यह Tor जैसे ब्राउज़र से ही खुलता है. इसका इस्तेमाल अपराधी गुमनाम रहने के लिए करते हैं.

Dark Web इतना खतरनाक क्यों होता है?

Dark Web को जोखिम भरा मानने के कई कारण हैं. यह वह जगह है जहां कानून के खिलाफ चलने वाली कई गतिविधियां होती हैं. इनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

अवैध ड्रग्स और हथियारों की खरीद–फरोख्त

Dark Web पर कई “ब्लैक मार्केट” स्टोर मौजूद होते हैं, जहां ड्रग्स, हथियार, नकली करेंसी और खतरनाक केमिकल्स तक बेचे जाते हैं.

चोरी का डेटा बिकता है

यहां क्रेडिट कार्ड जानकारी, बैंक अकाउंट डिटेल्स, आधार–पैन जैसी पहचान, हैक किया हुआ डेटा और लॉगिन क्रेडेंशियल्स तक बेचे जाते हैं.

हैकर्स का अड्डा

Dark Web हायर करने वाले हैकर्स की जगह बन चुका है जहां वे वेबसाइट हैक करने, सर्वर क्रैश करने, डेटा चोरी करने, रैंसमवेयर फैलाने जैसे कामों के लिए ऑर्डर लेते हैं.

साइबर क्राइम नेटवर्क

Dark Web पर कई ऐसे ग्रुप होते हैं जहां साइबर अपराधी एक दूसरे से संपर्क बनाते हैं और योजनाएं बनाते हैं.

अवैध पोर्नोग्राफी और मानव तस्करी

यह Dark Web की सबसे खतरनाक और घिनौनी गतिविधियों में से एक है. यहाँ बच्चों से संबंधित अवैध सामग्री और मानव तस्करी से जुड़े रैकेट भी पाए जाते हैं.

हिटमैन सर्विसेज

कुछ साइट्स पर अपराधी पैसे लेकर किसी को नुकसान पहुंचाने या हत्या तक करने की पेशकश करते हैं. इन सभी कारणों की वजह से Dark Web को दुनिया का सबसे खतरनाक इंटरनेट ज़ोन माना जाता है.

Dark Web चलाना क्या गैरकानूनी है?

केवल Dark Web पर जाने भर से अपराध नहीं होता. कई देशों में इसे एक्सेस करना पूरी तरह अपराध नहीं माना जाता क्योंकि यह कुछ हद तक प्राइवेसी के लिए भी उपयोगी हो सकता है. लेकिन भारत में मामला अलग है. भारत में साइबर कानून बहुत स्पष्ट हैं यदि कोई व्यक्ति ऐसे कंटेंट को एक्सेस करता है जो अवैध है या किसी प्रतिबंधित वेबसाइट पर जाता है तो यह IT Act के तहत अपराध माना जाएगा. इसका मतलब है कि Dark Web पर जाना उतना समस्या नहीं है लेकिन वहां मौजूद अवैध वेबसाइट खोलना बड़ा अपराध है और वहां से कुछ खरीदना–बेचना सबसे बड़ा अपराध.

Dark Web इस्तेमाल करने पर कितनी सजा हो सकती है?

भारत की IT Act 2000 और कई IPC सेक्शनों के तहत Dark Web पर अवैध गतिविधि में शामिल पाए जाने पर बहुत कड़ी सजा हो सकती है.

अवैध कंटेंट देखने–डाउनलोड करने पर 3 साल तक की जेल और 5 लाख रुपये तक का जुर्माना.

चोरी का डेटा खरीदने–बेचने पर 7 साल तक की जेल और भारी जुर्माना.

साइबर क्राइम में शामिल होने पर अपराध के प्रकार के अनुसार 10 साल या उससे ज्यादा जेल हो सकती है.

मादक पदार्थ या हथियार खरीदने पर Narcotics Act और Arms Act के तहत आजीवन कारावास तक की सजा संभव है.

बाल पोर्नोग्राफी से जुड़े अपराधों पर POCSO एक्ट के तहत 5–20 साल तक की जेल. Dark Web पर सिर्फ गलत लिंक खोलने पर भी कार्रवाई हो सकती है अगर वह लिंक अवैध सामग्री से जुड़ा हो.

Dark Web कैसे फँसा सकता है आपको?

बहुत से लोग जिज्ञासा में Dark Web पर जाते हैं लेकिन यह छोटी सी गलती बड़ा खतरा बन सकती है. ब्राउज़र में गलती से गलत साइट खुल सकती है. आपके सिस्टम में मालवेयर घुस सकता है. हैकर्स आपके फोन/लैपटॉप का कंट्रोल ले सकते हैं. आपका IP ट्रैक कर कानून आपके दरवाजे तक पहुंच सकता है. Dark Web पर आपको लगता है आप गुमनाम हैं लेकिन जैसे ही आप अवैध साइट खोलते हैं, लॉग्स और ब्राउज़िंग ट्रैक होने लगती है.

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Google पर कभी मत सर्च करना ये 4 चीजें! एक गलती में घर पहुंच जाएगी पुलिस, दूसरे सर्च पर तो बेल म

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Google Search: इंटरनेट ने हमारी जिंदगी जितनी आसान बनाई है, उतना ही बड़ा जोखिम भी खड़ा कर दिया है. खासकर Google जैसे सर्च इंजन, जहां हम बिना सोचे-समझे कुछ भी सर्च कर देते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ शब्द, कुछ सवाल या कुछ टॉपिक्स ऐसे हैं जिन्हें सर्च करना आपके लिए बड़ा मुसीबत का कारण बन सकता है? कई मामलों में पुलिस आपके लोकेशन ट्रैक कर सकती है और कुछ मामलों में तो बेल मिलना भी बेहद मुश्किल हो जाता है. आइए जानें कौन-सी हैं वे खतरनाक सर्चेज जिन्हें करने से पहले सौ बार सोचना चाहिए.

क्यों खतरनाक है Google पर कुछ चीजें सर्च करना?

Google पर आपके हर सर्च की एक डिजिटल ट्रेल बनती है. ये डेटा सिर्फ तकनीकी रूप से ही नहीं, बल्कि कानूनी रूप से भी ट्रैक किया जा सकता है. जब कोई व्यक्ति ऐसे विषय सर्च करता है जो कानून के खिलाफ हैं तो गूगल उन गतिविधियों को संदिग्ध मानकर लॉ-एन्फोर्समेंट एजेंसियों से साझा कर सकता है. कई देशों में यह प्रक्रिया बेहद सख्त है और भारत भी अब साइबर क्राइम को लेकर काफी सख्त हो चुका है.

अवैध हथियार या विस्फोटक बनाने के तरीके

यदि आप गन, बम या किसी भी तरह का विस्फोटक बनाने की जानकारी सर्च करते हैं तो इसे संभावित आतंकी गतिविधि माना जाता है. ऐसे सर्चेज़ तुरंत रेड अलर्ट में आते हैं और पुलिस आपकी डिजिटल लोकेशन ट्रैक कर सकती है. यह IPC और UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत आता है.

डार्क वेब, ड्रग्स और अवैध चीज़ों की खरीद

डार्क वेब एक्सेस कैसे करें, “ड्रग्स कहां मिलती हैं” जैसी सर्चेज बेहद गंभीर अपराध की श्रेणी में आती हैं. ऐसी क्वेरीज़ मिलते ही साइबर सेल सक्रिय हो जाता है. कई मामलों में आरोपी को बेल तक नहीं मिलती.

चाइल्ड पोर्नोग्राफी या किसी भी नाबालिग से जुड़ा अवैध कंटेंट

यह न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया भर में सख्त अपराध है. ऐसे कंटेंट सर्च करना, डाउनलोड करना या शेयर करना सब गैर-कानूनी है. यह POSCO जैसे कड़े कानूनों के तहत आता है और इसमें गिरफ्तारी लगभग तय होती है.

किसी की प्राइवेट जानकारी हैक करने या ट्रैक करने के तरीके

किसी का WhatsApp हैक कैसे करें”, “गर्लफ्रेंड की लोकेशन कैसे ट्रैक करें” जैसे सर्च अपराध की श्रेणी में आते हैं. यह IT Act 66C/66D के अंतर्गत आता है और इसमें भी पुलिस एक्शन तुरंत हो सकता है.

कैसे बचें ऐसी मुसीबतों से?

इंटरनेट का इस्तेमाल हमेशा जिम्मेदारी से करें. कोई भी ऐसा टॉपिक सर्च न करें जो अवैध, हिंसक, संवेदनशील या किसी की प्राइवेसी को तोड़ता हो. याद रखें एक गलत सर्च आपकी पूरी डिजिटल जिंदगी बरबाद कर सकता है. Google आपकी सुविधा के लिए है लेकिन गलत सर्च आपको सीधे कानून की गिरफ्त तक ले जा सकता है.

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सरकार का WhatsApp पर कड़ा आदेश! अब बिना एक्टिव सिम के नहीं चला सकेंगे ऐप, जानिए क्या है नियम

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Whatsapp: भारत सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए लोकप्रिय मैसेजिंग ऐप्स जैसे WhatsApp, Telegram, Signal, Snapchat, ShareChat, JioChat, Arattai और Josh के संचालन के नियम पूरी तरह बदल दिए हैं. दूरसंचार विभाग (DoT) ने इन सभी प्लेटफॉर्म्स को निर्देश दिया है कि अब कोई भी यूज़र सक्रिय SIM कार्ड के बिना इन सेवाओं का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा. यह आदेश Telecommunication Cybersecurity Amendment Rules 2025 का हिस्सा है जिसके तहत पहली बार ऐप-आधारित मैसेजिंग सेवाओं को टेलीकॉम सर्विस की तरह नियंत्रित किया जाएगा.

सरकार ने इन ऐप्स को अब Telecommunication Identifier User Entities (TIUEs) की श्रेणी में रखा है और 90 दिन के भीतर इन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि यूजर की SIM हमेशा उनके ऐप से जुड़ी रहे. ब्राउजर से लॉगिन करने वालों के लिए नियम और कड़े हैं सरकार ने आदेश दिया है कि वेब ऐप पर हर छह घंटे में यूजर्स को ऑटो लॉगआउट किया जाए और उन्हें फिर से QR कोड स्कैन करके दोबारा लॉगिन करना पड़े. सरकार का दावा है कि इससे ऐसे अपराधियों पर लगाम लगेगी जो दूर बैठे फर्जी नंबरों और निष्क्रिय SIM का इस्तेमाल करके धोखाधड़ी करते हैं.

क्यों उठाया गया यह कदम?

सरकार का कहना है कि मौजूदा सिस्टम में एक बड़ी खामी थी. ज्यादातर मैसेजिंग ऐप्स एक बार नंबर वेरिफाई करने के बाद SIM चाहे फोन में हो या न हो ऐप लगातार चलता रहता है. सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (COAI) के मुताबिक इंस्टॉल करते समय एक बार सिम-बाइंडिंग होती है लेकिन उसके बाद ऐप बिना SIM के भी चलता रहता है.

इससे साइबर अपराधियों को फायदा मिलता है वे SIM बदलकर या उसे निष्क्रिय कराकर भी इन ऐप्स का इस्तेमाल चोरी-छिपे जारी रख सकते हैं. ऐसे मामलों में कॉल रिकॉर्ड, लोकेशन लॉग या कैरियर डेटा से उन्हें ट्रेस करना बेहद मुश्किल हो जाता है.

सरकार का कहना है कि लगातार SIM-बाइंडिंग से यूज़र, नंबर और डिवाइस के बीच ट्रेसिंग मजबूत होगी और स्पैम, फ्रॉड और मैसेजिंग के जरिए होने वाले वित्तीय अपराध कम होंगे. डिजिटल पेमेंट्स में भी ऐसे कड़े सुरक्षा नियम पहले से लागू हैं जैसे UPI और बैंकिंग ऐप्स SIM वेरिफिकेशन अनिवार्य करते हैं. SEBI तक ने ट्रेडिंग अकाउंट्स को SIM से जोड़कर फेस रिकग्निशन जोड़ने का प्रस्ताव दिया था.

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

इस कदम पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है. कुछ साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि SIM बाइंडिंग से फर्जीवाड़े पर लगाम लग सकती है क्योंकि इससे हर यूज़र की पहचान और डिवाइस की ट्रेसिंग आसान हो जाएगी.

लेकिन कई विशेषज्ञ इसे सीमित लाभ वाला कदम बता रहे हैं. उनका कहना है कि अपराधी नकली या उधार लिए डॉक्यूमेंट्स से नई SIM निकाल लेते हैं, इसलिए यह पूरी तरह कारगर नहीं होगा.

टेलीकॉम क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधि इससे सहमत नहीं हैं. उनका दावा है कि भारत में मोबाइल नंबर ही सबसे मजबूत डिजिटल पहचान है और इस नए नियम से सुरक्षा और जवाबदेही दोनों बढ़ेंगी.

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Cyber Monday क्या है? जानिए कैसे पड़ा इसका नाम और ऑनलाइन खरीदारी से क्या है इसका लिंक

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What is Cyber Monday: थैंक्सगिविंग वीकेंड के बाद आने वाला पहला सोमवार Cyber Monday कहलाता है. इसे खास तौर पर ऑनलाइन शॉपिंग को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था ताकि लोग ब्लैक फ्राइडे की दुकानों वाली भीड़ के बजाय इंटरनेट पर भी शानदार डील्स का फायदा उठा सकें. शुरुआत में यह दिन सिर्फ टेक्नोलॉजी और गैजेट्स की भारी छूट के लिए मशहूर था लेकिन समय के साथ इसमें फैशन, फर्नीचर, होम अप्लायंसेज़ और अन्य कैटेगरीज भी शामिल हो गईं.

इस साल कितना बड़ा होगा Cyber Monday?

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल का Cyber Monday (27 नवंबर) अमेरिका में अब तक का सबसे बड़ा ऑनलाइन शॉपिंग डे साबित हुआ है. ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म इलेक्ट्रॉनिक्स पर करीब 30% तक और फर्नीचर पर लगभग 19% तक डिस्काउंट देखने को मिला है. Adobe Analytics के मुताबिक, ग्राहक इस Cyber Monday पर करीब 12 अरब डॉलर तक खर्च चुके हैं जो पिछले साल की तुलना में लगभग 5.4% ज्यादा है.

Cyber Monday नाम कैसे पड़ा?

Brittanica के मुताबिक, Cyber Monday शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले 2005 में नेशनल रिटेल फेडरेशन (NRF) ने किया था. उस समय ऑफिस की इंटरनेट स्पीड घर के मुकाबले कहीं तेज होती थी, इसलिए लोग छुट्टियों के बाद काम पर लौटते ही ऑनलाइन शॉपिंग करने लगते थे. इस ट्रेंड को ध्यान में रखते हुए इसे एक खास शॉपिंग डे के रूप में प्रमोट किया गया.

दुनियाभर में फैल चुका है Cyber Monday का क्रेज

हालांकि इसकी शुरुआत अमेरिका में हुई लेकिन अब यह ऑनलाइन शॉपिंग फेस्ट दुनिया के कई देशों में लोकप्रिय हो चुका है. कनाडा, ब्रिटेन, जापान और कई अन्य देशों में ई-कॉमर्स कंपनियां इस दिन सेल आयोजित करती हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा ग्राहक आकर्षित हो सकें.

Black Friday और Cyber Monday में क्या फर्क है?

Black Friday, थैंक्सगिविंग के तुरंत अगले दिन होने वाली मेगा सेल है, जिसमें दुकानें और मॉल भारी छूट देकर ग्राहकों को आकर्षित करते हैं. इसे अमेरिका के सबसे व्यस्त शॉपिंग दिनों में से एक माना जाता है. दूसरी ओर, Cyber Monday को पूरी तरह ऑनलाइन खरीदारी के लिए समर्पित किया गया है.

NRF की वाइस प्रेसिडेंट कैथरीन कलन के अनुसार, जैसे-जैसे ऑनलाइन शॉपिंग बढ़ी, Amazon जैसी कंपनियां थैंक्सगिविंग वीकेंड की सेल को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक भी ले जाना चाहती थीं. इसी वजह से सोमवार को ऑनलाइन-विशेष डील्स का दिन बनाया गया ताकि यह Black Friday से अलग पहचान बना सके.

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भारत के लिए बड़ा सरप्राइज! Meta ने Instagram Reels और Edits App में जोड़े नए फीचर्स, जानिए क्रि

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Meta Update: Meta ने भारतीय क्रिएटर्स को ध्यान में रखते हुए Instagram Reels और Edits ऐप में दो नए फीचर्स पेश किए हैं. कंपनी ने Reels की AI Translation क्षमता को पांच और भारतीय भाषाओं तक बढ़ा दिया है बंगाली, तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मराठी. इसके साथ ही Edits ऐप में भारतीय भाषाओं के नए फ़ॉन्ट विकल्प भी जोड़े जा रहे हैं. ये अपडेट तब आए हैं जब कुछ समय पहले Meta ने Reels के लिए Hindi और Portuguese में AI डबिंग फीचर लॉन्च किया था जो पहले सिर्फ English और Spanish में उपलब्ध था.

Instagram Reels के नए भारत-विशेष फीचर्स

AI Translation का विस्तार

Meta का कहना है कि आने वाले महीनों में यूज़र्स Reels को पांच नई भारतीय भाषाओं बंगाली, तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मराठी में ट्रांसलेट कर पाएंगे. Hindi पहले से शामिल है यानी अब क्रिएटर्स अपने कंटेंट को भारत की कई प्रमुख भाषाओं में सहजता से बदल सकेंगे.

AI की मदद से आवाज़ का अनुवाद उसी टोन और भाव के साथ किया जाएगा, क्रिएटर की मूल वॉइस फील बनी रहेगी. एक वैकल्पिक AI Lip-Sync फीचर भी मिलेगा जो मुंह की हरकत को नई भाषा के ऑडियो से मैच कर देगा. यह फीचर उन क्रिएटर्स के लिए खास उपयोगी होगा जो अपने कंटेंट को पूरे भारत में व्यापक दर्शकों तक पहुंचाना चाहते हैं.

Edits ऐप में भारतीय फ़ॉन्ट्स की एंट्री

Meta Edits ऐप में भारतीय भाषाओं के नए फ़ॉन्ट स्टाइल जोड़ रहा है जिनमें देवनागरी, बंगाली-असमिया स्क्रिप्ट शामिल हैं. इन फ़ॉन्ट्स की मदद से क्रिएटर्स अब Hindi, Marathi, Bengali और Assamese जैसी भाषाओं में कैप्शन और टेक्स्ट को स्टाइलिश तरीके से लिख सकेंगे. इन नए फ़ॉन्ट्स का अपडेट जल्द ही Android पर उपलब्ध कराया जाएगा. एंड्रॉयड में ये फीचर आने के बाद यूजर्स का अनुभव और भी बेहतरीन हो जाएगा. इंस्टाग्राम में ये फीचर कंटेंट क्रिएटर्स के लिए काफी लाभदायक साबित हो सकता है.

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धूप है आपके फोन की दुश्मन, कर देगी बड़े नुकसान, न तो फोन चलेगा और न ही बिकेगा

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सर्दियों का मौसम आ गया है और अब लोगों को गर्माहट पाने के लिए धूप का इंतजार रहेगा. सर्दियों में धूप सेंकते समय कई लोग अपने फोन को भी धूप में रख देते हैं. आपको बता दें कि धूप आपके फोन की दुश्मन है. लगातार सीधी धूप पड़ने से फोन में एक नहीं बल्कि कई बड़े नुकसान हो सकते हैं. इससे आपका फोन न तो चलने लायक रहेगा और न ही बेचने लायक. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि कैसे धूप आपके फोन को खराब कर सकती है.

बैटरी हो सकती है खराब

लगातार धूप में रहने से फोन में हीट जनरेट होती है. यह हीट फोन की बैटरी में होने वाली केमिकल रिएक्शन को तेज कर देती है. इससे बैटरी के पार्ट्स खराब होने लगते हैं और बैटरी लाइफ भी कम हो जाती है. इसका मतलब है कि आपको फोन को बार-बार चार्ज करना पड़ेगा. अगर लिथियम ऑयन बैटरी को लगातार 30 डिग्री से अधिक तापमान में रखा जाता है तो इनका लाइफस्पैन कम हो जाता है.

बैटरी में ब्लास्ट का भी खतरा

अगर फोन को लगातार लंबे समय तक धूप में रखा जाता है तो बैटरी के खराब होने के अलावा भी नुकसान हो सकते हैं. ज्यादा तापमान से बैटरी ओवरहीट होती रहती है. अगर लंबे समय तक यह स्थिति बने रहे तो बैटरी में ब्लास्ट भी हो सकता है. 

एडहेसिव हो जाता है कमजोर

लगातार धूप के संपर्क में रहने से फोन के पार्ट्स को चिपकाने वाला एडहेसिव कमजोर होकर उखड़ सकता है. इससे इंटरनल पार्ट्स काम करना बंद कर देंगे और स्क्रीन भी उखड़कर ऊपर आ सकती है. इस तरह यह फोन यूज करने लायक नहीं रहेगा. 

UV किरणें भी खतरनाक

अगर फोन को लंबे समय तक धूप में छोड़ दिया जाए तो UV किरणें भी बड़ा नुकसान कर सकती हैं. इनके कारण कुछ फोन का कलर खराब हो सकता है, जिससे उसका लुक बिगड़ जाएगा. इससे न सिर्फ फोन की अपीयरेंस खराब होती है बल्कि इसकी रीसेल वैल्यू पर भी असर पड़ता है.

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एक छोटी गलती और ठप हो सकता है पूरा इंटरनेट! डिजिटल सिस्टम इतना नाज़ुक क्यों होता है? जानिए क्या होती है असली वजह

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असल में इंटरनेट बाहर से भले ही विशाल और हाई-टेक नजर आता हो पर इसके पीछे बेहद जटिल और कई बार चौंकाने वाला कमजोर ढांचा छिपा है. कहीं एक सर्वर में गड़बड़ी हो जाए किसी जगह DNS की दिक्कत आ जाए या कोई सॉफ्टवेयर अपडेट गलत तरीके से लागू हो जाए तो यह समस्या चेन रिएक्शन की तरह पूरी दुनिया में फैल सकती है.

असल में इंटरनेट बाहर से भले ही विशाल और हाई-टेक नजर आता हो पर इसके पीछे बेहद जटिल और कई बार चौंकाने वाला कमजोर ढांचा छिपा है. कहीं एक सर्वर में गड़बड़ी हो जाए किसी जगह DNS की दिक्कत आ जाए या कोई सॉफ्टवेयर अपडेट गलत तरीके से लागू हो जाए तो यह समस्या चेन रिएक्शन की तरह पूरी दुनिया में फैल सकती है.

इंटरनेट लाखों नोड्स का नेटवर्क है लेकिन फिर भी कई महत्वपूर्ण सेवाएं कुछ बड़े प्लेटफॉर्म पर ही निर्भर रहती हैं. यही वजह है कि हर आउटेज इस सिस्टम की असली कमजोरी उजागर कर देता है.

इंटरनेट लाखों नोड्स का नेटवर्क है लेकिन फिर भी कई महत्वपूर्ण सेवाएं कुछ बड़े प्लेटफॉर्म पर ही निर्भर रहती हैं. यही वजह है कि हर आउटेज इस सिस्टम की असली कमजोरी उजागर कर देता है.

इस पूरे ढांचे में Cloudflare की भूमिका काफी अहम है. आम यूजर को लगता है कि वह किसी वेबसाइट तक सीधे पहुंचता है जबकि हकीकत में Cloudflare बीच में एक सुरक्षा और ट्रैफिक मैनेजमेंट गेटकीपर की तरह काम करता है. यह दुनिया भर में फैले अपने डेटा सेंटर्स पर वेबसाइटों की कॉपी रखता है ताकि यूजर को उसके नजदीकी सर्वर से डेटा मिले और स्पीड बढ़े. इसके अलावा यह बड़े पैमाने पर होने वाले DDoS हमलों से भी बचाव करता है. इसलिए इसे इंटरनेट का ट्रैफिक कंट्रोलर और सिक्योरिटी गार्ड दोनों कहा जाता है.

इस पूरे ढांचे में Cloudflare की भूमिका काफी अहम है. आम यूजर को लगता है कि वह किसी वेबसाइट तक सीधे पहुंचता है जबकि हकीकत में Cloudflare बीच में एक सुरक्षा और ट्रैफिक मैनेजमेंट गेटकीपर की तरह काम करता है. यह दुनिया भर में फैले अपने डेटा सेंटर्स पर वेबसाइटों की कॉपी रखता है ताकि यूजर को उसके नजदीकी सर्वर से डेटा मिले और स्पीड बढ़े. इसके अलावा यह बड़े पैमाने पर होने वाले DDoS हमलों से भी बचाव करता है. इसलिए इसे इंटरनेट का ट्रैफिक कंट्रोलर और सिक्योरिटी गार्ड दोनों कहा जाता है.

समस्या तब पैदा होती है जब Cloudflare खुद किसी गड़बड़ी का शिकार हो जाए. कभी किसी अपडेट के दौरान फाइल करप्ट हो जाती है कभी Bot Management सिस्टम में कोई बग सक्रिय हो उठता है या किसी एक सर्वर पर अतिरक्त लोड पड़ जाता है. ऐसे में सर्वर खुद को संभाल नहीं पाता और आउटेज शुरू हो जाता है. यह साइबर हमला नहीं बल्कि तकनीकी आधारभूत ढांचे की अपनी कमजोरी है जिसे लोग अक्सर गलत समझ बैठते हैं.

समस्या तब पैदा होती है जब Cloudflare खुद किसी गड़बड़ी का शिकार हो जाए. कभी किसी अपडेट के दौरान फाइल करप्ट हो जाती है कभी Bot Management सिस्टम में कोई बग सक्रिय हो उठता है या किसी एक सर्वर पर अतिरक्त लोड पड़ जाता है. ऐसे में सर्वर खुद को संभाल नहीं पाता और आउटेज शुरू हो जाता है. यह साइबर हमला नहीं बल्कि तकनीकी आधारभूत ढांचे की अपनी कमजोरी है जिसे लोग अक्सर गलत समझ बैठते हैं.

सबसे बड़ी चिंता यह है कि इंटरनेट की रीढ़ अब कुछ चुनिंदा कंपनियों के हाथ में है AWS, Google Cloud, Azure और Cloudflare. इसे सिंगल पॉइंट ऑफ फेलियर कहा जाता है. इनमें से कोई एक भी बंद हो जाए तो असर पूरे विश्व में महसूस होता है. भारत के लिए यह जोखिम और भी बड़ा है क्योंकि अब पेमेंट्स, ई-कॉमर्स, स्टॉक ट्रेडिंग, बैंकिंग और सरकारी सेवाएं पूरी तरह क्लाउड आधारित हैं.

सबसे बड़ी चिंता यह है कि इंटरनेट की रीढ़ अब कुछ चुनिंदा कंपनियों के हाथ में है AWS, Google Cloud, Azure और Cloudflare. इसे सिंगल पॉइंट ऑफ फेलियर कहा जाता है. इनमें से कोई एक भी बंद हो जाए तो असर पूरे विश्व में महसूस होता है. भारत के लिए यह जोखिम और भी बड़ा है क्योंकि अब पेमेंट्स, ई-कॉमर्स, स्टॉक ट्रेडिंग, बैंकिंग और सरकारी सेवाएं पूरी तरह क्लाउड आधारित हैं.

तभी जरूरी है कि कंपनियां केवल स्पीड पर निर्भर न रहें, बल्कि मजबूत बैकअप व्यवस्था भी तैयार करें. Multi-CDN और Multi-Cloud स्ट्रैटेजी अपनाकर ट्रैफिक को जरूरी समय पर दूसरे रास्तों से भेजा जा सकता है ताकि Cloudflare जैसे किसी एक प्लेटफॉर्म के डाउन होने पर पूरा सिस्टम ठप न पड़े. डिजिटल युग में यही एकमात्र रास्ता है जिससे भविष्य के आउटेज के झटकों से बचा जा सके.

तभी जरूरी है कि कंपनियां केवल स्पीड पर निर्भर न रहें, बल्कि मजबूत बैकअप व्यवस्था भी तैयार करें. Multi-CDN और Multi-Cloud स्ट्रैटेजी अपनाकर ट्रैफिक को जरूरी समय पर दूसरे रास्तों से भेजा जा सकता है ताकि Cloudflare जैसे किसी एक प्लेटफॉर्म के डाउन होने पर पूरा सिस्टम ठप न पड़े. डिजिटल युग में यही एकमात्र रास्ता है जिससे भविष्य के आउटेज के झटकों से बचा जा सके.

Published at : 29 Nov 2025 09:31 AM (IST)

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अगले 10 सालों में 30 लाख नौकरियां खा जाएगी एआई, कहीं आपकी जॉब पर भी तो खतरा नहीं!

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यह बात किसी से छिपी नहीं है कि एआई के कारण नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है. अब इसे लेकर अलग-अलग रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं, जिनमें बताया जा रहा है कि एआई के कारण कितनी नौकरियां जा सकती हैं. हाल ही में यूके के नेशनल फाउंडेशन फॉर एजुकेशनल रिसर्च (NFER) की रिपोर्ट आई है, जिसमें कहा गया है कि 2035 तक यूके में लो-स्किल वाली करीब 30 लाख नौकरियां खत्म हो जाएंगी. इन नौकरियों में अभी जो काम इंसान कर रहे हैं, वो एआई और ऑटोमेशन से होने लगेगा. 

इन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा

रिपोर्ट के मुताबिक, एआई और ऑटोमेशन से फैक्ट्री और मशीन ऑपरेटर, एडमिनिस्ट्रेटिव असिस्टेंट, वेयरहाउस वर्क, कैशियर आदि की नौकरियों पर ज्यादा खतरा है. मशीनें और सॉफ्टवेयर अगले कुछ ही सालों में इनकी जगह ले लेंगे. इसी तरह प्लंबिंग, रूफिंग और बिजली से जुड़ा काम भी एआई और रोबोटिक्स से होने लगेगा.

इन नौकरियों में होंगे ज्यादा मौके

रिपोर्ट में खतरे वाले नौकरियों के साथ-साथ उन क्षेत्रों का भी जिक्र किया गया है, जहां नए मौके बनेंगे. रिपोर्ट के अनुसार, क्रिएटिविटी, इमोशनल इंटेलीजेंस और कॉम्प्लेक्स डिसीजन मेकिंग वाले काम करने वाले लोगों की जगह एआई नहीं ले पाएगी. ऐसे में कानून, मैनेजमेंट, एजुकेशन और साइकोलॉजी से जुड़े प्रोफेशनल की डिमांड बढ़ सकती है. हालांकि, इनका काम और काम करने का तरीका पूरी तरह बदल जाएगा.

मौजूदा समय की 12 प्रतिशत नौकरियां खा सकती हैं एआई

यूके की तरह अमेरिका में भी एआई के कारण नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है. MIT की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका की करीब 12 प्रतिशत नौकरियों की जगह एआई ले सकती है. यानी अब इन नौकरियों को करने के लिए इंसानों की जरूरत नहीं है और एआई उनका काम कर सकती है. इससे सबसे ज्यादा प्रभावित फाइनेंस, हेल्थकेयर और प्रोफेशनल सर्विस जैसे सेक्टर हुए हैं. 

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