चुनावी वैतरणी पार करने के लिए अब हनुमान जी से आस, हनुमान चालीसा और सुंदरकांड की मांग बढ़ी
गीता प्रेस गोरखपुर के प्रबंधक डा. लाल मणि तिवारी का कहना है कि इस तरह से लग रहा है कि आने वाले समय में इनकी मांग और बढ़ सकती है।
By Navodit Saktawat
Publish Date: Thu, 28 Mar 2024 12:39 PM (IST)
Up to date Date: Thu, 28 Mar 2024 12:45 PM (IST)

HighLights
- चुनावी भवसागर पार करवाने के लिए अब वे हनुमान जी से ही आस लगा रहे हैं।
- हनुमान चालीसा एवं सुंदरकांड की सर्वाधिक मांग हिंदी भाषी प्रदेशों में है।
- हिंदी के बाद गुजराती भाषा में हनुमान चालीसा एवं सुंदर कांड की मांग सबसे अधिक है।
गजाधर द्विवेदी, गोरखपुर। हनुमान जी की स्तुति में भक्त तो भगवान से कहते ही हैं कि, “कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसे नहीं जात है टारो, बेगी हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो, को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो”। जब संकट की घड़ी आती है सबसे पहले हनुमान जी की ही याद आती है।
इसीलिए तो उन्हें संकट मोचक कहा जाता है। अब चूंकि चुनावी समय है तो ऐसे में प्रत्याशियों को हनुमान जी याद आ रहे हैं। नतीजा, बाजार में हनुमान चालीसा और सुंदरकांड की मांग में बढ़ोतरी हो गई है।
चुनावी भवसागर पार करवाने के लिए अब वे हनुमान जी से ही आस लगा रहे हैं। इस सब के बीच गोरखपुर की गीता प्रेस की मुश्किल बढ़ गई है क्योंकि लगातार बढ़ती मांग के चलते वह इनका प्रकाशन नहीं कर पा रहा है। प्रेस प्रबंधन ने प्रकाशन का दायरा बढ़ाया है लेकिन यह भी पर्याप्त नहीं लग रहा है।
बीते जनवरी से लेकर अभी तक हनुमान चालीसा की 63.90 लाख एवं सुंदर कांड की 15.20 लाख प्रतियां विक्रय के लिए भेजी गई हैं। हनुमान चालीसा एवं सुंदरकांड की सर्वाधिक मांग हिंदी भाषी प्रदेशों में है।
गीता प्रेस गोरखपुर के प्रबंधक डा. लाल मणि तिवारी का कहना है कि इस तरह से लग रहा है कि आने वाले समय में इनकी मांग और बढ़ सकती है।
देखा जाए तो बात सही भी है क्योंकि चुनाव जीतना है तो हनुमान जी की कृपा तो चाहिये ही चाहिये। जहां तक भाषा की बात है, हिंदी के बाद गुजराती भाषा में हनुमान चालीसा एवं सुंदर कांड की मांग सबसे अधिक है।
गत वर्ष भी गुजराती हनुमान चालीसा की दो लाख प्रतियां प्रकाशित की गई थी। इस बार इसकी चार लाख प्रतियां प्रकाशित हुईं हैं। इस बार भी उम्मीद जताई जा रही है हनुमान चालीसा एवं सुंदर कांड की प्रतियां अधिकाअधिक प्रकाशित होंगी। राजनीति ही सही, चुनाव ही सही, इसी बहाने कम से कम लोग धर्म के साथ तो जुड़ रहे हैं।
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