कर्ज में डूबे PAK को ‘कर्जदार देशों का नेता’ क्यों चुना गया? भारत को क्या लेना-देना


पाकिस्तान को एक ऐसी कुर्सी मिली है, जिस पर बैठकर उसे दुनिया के कर्जदार देशों को कर्ज से निपटने का ‘पाठ’ पढ़ाना है. बैंकॉक में पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने संयुक्त राष्ट्र समर्थित ‘बोरोवर्स प्लेटफॉर्म’ की गवर्निंग काउंसिल की अध्यक्षता संभाली. मजाक देखिए कि जिस देश का खुद का कुल बाहरी कर्ज मार्च 2026 तक 137.55 अरब डॉलर था और जिसे 2023 में कर्ज न चुका पाने की कगार से बचाने के लिए इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की मदद लेनी पड़ी थी, वही देश अब 30 से ज्यादा कर्जदार देशों का ‘नेता’ बन गया है.

यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के उस ‘विरोधाभास’ की कहानी है, जिसे समझना हर उस देश के लिए जरूरी है, जो कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है…

‘बोरोवर्स प्लेटफॉर्म’ आखिर है क्या?

बोरोवर्स प्लेटफॉर्म की शुरुआत अप्रैल 2026 में हुई थी और इसका सचिवालय संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (UNCTAD) के पास है. इसका मकसद कर्ज लेने वाले विकासशील देशों को एक मंच देना है, जहां वे अपने अनुभव साझा कर सकें, कर्ज प्रबंधन की क्षमता बढ़ा सकें और वैश्विक वित्तीय बहस में अपनी आवाज बुलंद कर सकें.

आसान शब्दों में कहें तो यह ‘कर्जदारों का क्लब’ है, जो कर्ज देने वालों (जैसे पेरिस क्लब) के समूह के सामने एक मुकाबला पैदा करना चाहता है. हालांकि, यह प्लेटफॉर्म कोई ‘सौदेबाजी’ करने वाली संस्था नहीं है. पाकिस्तान ने साफ कर दिया है कि यह कर्ज की शर्तों पर मोलभाव नहीं करेगा, बल्कि सिर्फ सहयोग और ज्ञान के आदान-प्रदान तक सीमित रहेगा.

पाकिस्तान की कर्ज की ‘कहानी’ क्या है?

अब बात करते हैं उस देश की, जिसे यह कमान मिली है. पाकिस्तान का कर्ज सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उसकी मजबूरी की कहानी है. सितंबर 2026 में पाकिस्तान ने IMF के साथ करीब 1.21 अरब डॉलर के नए कर्ज के लिए समझौता किया, जिससे उसके मौजूदा कार्यक्रमों के तहत कुल वितरण करीब 5.7 अरब डॉलर हो जाएगा. लेकिन यह कर्ज मुफ्त नहीं है.

IMF के भुगतान कार्यक्रम के मुताबिक, पाकिस्तान को 2026 में करीब 610.8 मिलियन SDR (लगभग 81 करोड़ डॉलर) का भुगतान करना है, जो 2027 में बढ़कर 1.66 अरब SDR और 2028 में 1.76 अरब SDR हो जाएगा. यानी नया कर्ज पुराने कर्ज का बोझ कम नहीं कर रहा, बल्कि एक साइकिल चला रहा है.

कर्ज लेने वाला ही कर्ज देने वालों को सलाह देगा?

यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा ‘ट्विस्ट’ है. पाकिस्तान खुद उस समस्या से जूझ रहा है, जिसका समाधान वह दूसरों को सुझाएगा. 2023 में पाकिस्तान सॉवरेन डिफॉल्ट (कर्ज न चुका पाने) की कगार पर पहुंच गया था और उसे 3 अरब डॉलर के IMF बेलआउट से बचाया गया था.

2024 में 7 अरब डॉलर का कार्यक्रम मिला और फिर 1.3 अरब डॉलर का क्लाइमेट रेजिलियंस लोन भी मिला. यानी पाकिस्तान के पास ‘कर्ज लेने’ का लंबा और समृद्ध अनुभव है, लेकिन ‘कर्ज से उबरने’ का अनुभव उतना ही कमजोर है.

तो फिर पाकिस्तान को ही क्यों चुना गया?

यह सवाल बिल्कुल जायज है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस प्लेटफॉर्म का मकसद किसी ‘आदर्श’ देश को नेता बनाना नहीं था. इसकी जरूरत पड़ी क्योंकि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में कर्जदार देशों के पास कोई स्थायी और साझा मंच नहीं था.

UNCTAD के अधिकारी पेनेलोप हॉकिन्स ने कहा, ‘पेरिस क्लब के पास 70 साल की बढ़त है, जबकि कर्जदारों के पास ऐसा कुछ नहीं था.’

पाकिस्तान को चुनने के पीछे उसका ‘अनुभव’ काम आया. एक ऐसा देश जिसने बार-बार IMF का दरवाजा खटखटाया है, वह अच्छी तरह जानता है कि कर्ज का बोझ कैसे देश की अर्थव्यवस्था को जकड़ लेता है. यह अध्यक्षता उसे कोई वित्तीय राहत नहीं देती, बल्कि सिर्फ एक मंच पर बैठाकर उस अनुभव को साझा करने का मौका देती है.

पाकिस्तान की कहानी दुनिया के लिए सबक कैसे?

पाकिस्तान का यह कदम उस आर्थिक वास्तविकता को उजागर करता है, जिसमें विकासशील देश कर्ज के जाल में फंसे हुए हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस स्थिति को ‘परफेक्ट स्टॉर्म’ कहा है. पाकिस्तान का नेतृत्व इस ‘तूफान’ के बीच एक ऐसी आवाज है, जो कम से कम यह बताती है कि कर्जदार देश अब चुप नहीं रहना चाहते.

सवाल यह है कि क्या सिर्फ बैठकें और चर्चाएं इस समस्या का हल निकाल पाएंगी, जब खुद पाकिस्तान जैसे देश को हर कुछ महीनों में नई किस्त के लिए IMF के पास जाना पड़ता है?