नॉर्वे की सरकार सार्वजनिक स्थलों जैसे पार्कों, बीचों, शॉपिंग सेंटरों, स्कूलों, जिम और अस्पतालों में AI-संचालित स्मार्ट चश्मों पर अस्थायी रोक लगाने की योजना बना रही है. इस कदम का मुख्य कारण लोगों की निजता की सुरक्षा है. नॉर्वेजियन डिजिटल एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार, यह चिंताजनक है कि ये आधुनिक वियरेबल डिवाइस बिना किसी के संज्ञान में आए उनकी तस्वीरें, वीडियो और ऑडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं. सरकार एक विशेषज्ञ समूह का गठन भी कर रही है जो इस पर स्थायी नियम बनाने की जांच करेगा.
स्मार्ट चश्मे उपयोगकर्ताओं को बिना हाथ में स्मार्टफोन पकड़े गुप्त रूप से रिकॉर्डिंग करने की अनुमति देते हैं. हालांकि मेटा का दावा है कि उनके डिवाइस में रिकॉर्डिंग के दौरान एक LED लाइट जलती है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि इतनी छोटी लाइट से भीड़भाड़ वाली जगहों पर दूसरों को रिकॉर्डिंग का पता चलना बेहद मुश्किल है.
दुनियाभर के देशों में क्या है हाल
स्मार्ट चश्मों पर प्रतिबंध लगाने वाला नॉर्वे अकेला देश नहीं है: इंग्लैंड और वेल्स की अदालतों (HMCTS) में स्मार्ट ग्लास पहनने पर पूरी तरह रोक है. ‘वेदरस्पून’ जैसी प्रसिद्ध पब श्रृंखलाओं, थिएटरों और रेस्तरां ने भी ग्राहकों की प्राइवेसी और फिल्मों की पायरेसी रोकने के उद्देश्य से इन पर पाबंदी लगाई है.
न्यूयॉर्क यूनिफाइड कोर्ट सिस्टम, कैसीनो और सिनेमाघरों जैसी संवेदनशील जगहों पर इन्हें प्रतिबंधित किया गया है. ऑस्ट्रेलिया सरकारी दफ्तरों, पब्लिक पूल और खेल के मैदानों में इन पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है, जबकि यूरोपीय संघ अपने कड़े डेटा सुरक्षा नियमों के तहत इनकी समीक्षा कर रहा है.
खान मार्केट की घटना और 2.05 करोड़ का नोटिस
प्राइवेसी से जुड़े एक हाई-प्रोफाइल मामले में, दिल्ली के खान मार्केट की घटना काफी चर्चित रही. एक कैफ़े में बिना इजाज़त रिकॉर्डिंग होने के बाद दिल्ली के एक निवासी ने मेटा और एक इंस्टाग्राम कंटेंट क्रिएटर को ₹2.05 करोड़ का कानूनी नोटिस भेजा था. यह घटना तब हुई जब क्रिएटर ने उस व्यक्ति की जानकारी या सहमति के बिना, रे-बैन मेटा स्मार्ट ग्लास का इस्तेमाल करके चुपके से उसकी फ़िल्मिंग करते हुए उससे बातचीत की. इसके बाद उस फ़ुटेज को इंस्टाग्राम रील के तौर पर पोस्ट किया गया, जिसे तेज़ी से 4,19,000 से ज़्यादा बार देखा गया, 15,000 लाइक्स मिले और सैकड़ों कमेंट्स आए, जिनकी वजह से कथित तौर पर पीड़ित व्यक्ति को लोगों के मज़ाक और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा.
डिजिटल अधिकार संगठन ‘इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन’ (IFF) के समर्थन से भेजे गए इस कानूनी नोटिस में क्रिएटर और मेटा, दोनों को निशाना बनाया गया है. इसमें मेटा को दो मोर्चों पर चुनौती दी गई है. एक प्लेटफ़ॉर्म ऑपरेटर के तौर पर, क्योंकि उसने शिकायत के बाद भी बिना सहमति वाला कंटेंट नहीं हटाया और दूसरा, प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनी के तौर पर, क्योंकि इसका डिज़ाइन ख़राब है. नोटिस में तर्क दिया गया है कि स्मार्ट ग्लास का छोटा LED रिकॉर्डिंग इंडिकेटर नाकाफ़ी है, सार्वजनिक जगहों पर आसानी से नज़र नहीं आता और असल में यह चुपके से निगरानी करने में मदद करता है.
क्या भारत में भी है कानून की जरूरत?
भारत में ‘डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP), 2023’ मौजूद है, लेकिन वियरेबल कैमरों की चुनौतियां भिन्न हैं. इसमें रिकॉर्ड होने वाला तीसरा व्यक्ति इस बात से अनजान होता है कि उसकी निजता का उल्लंघन हो रहा है. भारत पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने के बजाय एक संतुलित दृष्टिकोण अपना सकता है.
कोर्ट, अस्पताल, चेंजिंग रूम, स्कूल और सिनेमाघरों जैसी जगह पर स्मार्ट ग्लास को बैन किया जा सकता है. स्टॉकिंग, यौन उत्पीड़न या बिना सहमति रिकॉर्डिंग करने के लिए सख्त कानूनी सजा तय की जा सकती है.
तकनीक के कई फायदे भी हैं, जैसे दिव्यांगों के लिए एक्सेसिबिलिटी और रियल-टाइम अनुवाद. इसलिए तकनीक पर प्रतिबंध लगाने के बजाय उसके इस्तेमाल के स्थान और स्थिति को नियंत्रित करना अधिक तर्कसंगत होगा.





