कैसे हूती विद्रोही 12 साल से टिके हुए? US, सऊदी अरब और इजरायल तक ने गिराए बम


हूती एक ऐसा समूह जिस पर अमेरिका, सऊदी अरब, ब्रिटेन और इजरायल यानी दुनिया की सबसे ताकतवर वायुसेनाएं लगातार बम बरसा रही हैं. हजारों हमले हुए, अरबों डॉलर के हथियार दागे गए और बड़े-बड़े कमांडर मारे गए, लेकिन नतीजा उल्टा निकला.जो समूह 2015 में 30,000 लड़ाकों वाला एक छोटा विद्रोही गुट था, वह 2024 तक 3,50,000 लड़ाकों की ताकत बन गया. आखिर इतने हमलों के बाद भी मजबूत कैसे होते जा रहे हैं?

सबसे पहले समझें कि हूती कौन हैं?

हूती यमन के उत्तर में रहने वाले जैदी शिया मुस्लिमों का एक सशस्त्र समूह है, जिसका औपचारिक नाम ‘अंसार अल्लाह’ है. ये 1990 के दशक से सक्रिय थे, लेकिन 2014 में इन्होंने यमन की राजधानी सना यानी देश के बड़े हिस्से पर कंट्रोल कर लिया.

2015 में सऊदी अरब ने अमेरिका और ब्रिटेन के समर्थन से हूतियों के खिलाफ जंग छेड़ दी. लेकिन यह जंग जितनी जल्दी शुरू हुई थी, उतनी जल्दी खत्म नहीं हुई. एक दशक बाद भी हूती पहले से ज्यादा ताकतवर हैं.

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इसकी 5 बड़ी वजहें हैं…

वजह- 1: हूतियों का सबसे बड़ा बचाव पहाड़

यमन का उत्तरी हिस्सा ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों से भरा है और हूती इन्हीं पहाड़ों में अपने ठिकाने बनाए हुए हैं. यहां वे अपने लड़ाकों को छोटे-छोटे समूहों में बिखेर देते हैं, हथियारों के भंडार अलग-अलग जगह छिपा देते हैं. इसका मतलब यह हुआ कि जब भी कोई हवाई हमला होता है, हूतियों को बड़ा नुकसान नहीं पहुंचता, क्योंकि उनका सारा सामान एक जगह नहीं होता.

इसे ऐसे समझें- अगर आप एक बड़े खुले मैदान में बम गिराएंगे, तो सब कुछ तबाह हो जाएगा. लेकिन अगर दुश्मन पहाड़ों की गुफाओं और घाटियों में छिपा हो, तो हवाई हमलों का असर सीमित हो जाता है. अमेरिकी और इजरायली हमलों ने हूती नेतृत्व और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया, लेकिन उनकी सैन्य क्षमता को खत्म नहीं कर पाए.

वजह- 2: ईरान का लगातार समर्थन

हूतियों की सबसे बड़ी ताकत के पीछे ईरान है. ईरान ने हूतियों को सिर्फ हथियार ही नहीं दिए, बल्कि उन्हें बनाने की ट्रेनिंग भी दी. न्यूयॉर्क में स्थित थिंक टैंक होराइजन एंगेज के रिसर्च हेड माइकल नाइट्स कहते हैं, ‘जो काम लेबनान के हिजबुल्लाह ने 20 साल में किया, वही हूतियों ने 5 साल में कर लिया.’

जुलाई 2026 में रॉयटर्स ने खुलासा किया कि ईरान ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के 10 से 21 कमांडरों और सैन्य सलाहकारों को एक फ्लाइट से यमन भेजा. इस फ्लाइट में मिसाइल और ड्रोन से जुड़े उपकरण भी थे और हूतियों के ऑपरेशन फंड करने के लिए सोना भी भेजा गया.

ईरान हमेशा से हूतियों को हथियार देने से इनकार करता रहा है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के एक्सपर्ट्स ने 2024 की एक रिपोर्ट में हूतियों, ईरान और उसके अन्य सहयोगियों के बीच गहरे सैन्य संबंधों के दस्तावेज जारी कर दिए.

वजह- 3: हूती खुद हथियार बनाने लगे

हूती अब सिर्फ ईरान से हथियार नहीं लेते, बल्कि खुद भी बना रहे हैं. उनके पास बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल, ड्रोन और नौसैनिक ड्रोन हैं, जो पूरे खाड़ी देशों और इजरायल तक पहुंच सकते हैं. वे लाल सागर में जहाजों पर हमला करने के लिए एंटी-शिप मिसाइल और नेवल ड्रोन इस्तेमाल करते हैं.

न्यूयॉर्क टाइम्स की सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, हूती अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल करके गाइडेड हथियार बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

अमेरिकी कंपनी एंथ्रोपिक की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तरी यमन में हूतियों से जुड़े लोगों ने AI टूल का इस्तेमाल करके गाइडेड रॉकेट बनाने और उसका टेस्ट फायरिंग करने तक का काम किया है.

यमन में अमेरिका के स्पेशल एन्वॉय रहे टिमोथी लेंडरकिंग ने कहा है कि हूती अब ‘पूरे मिडिल ईस्ट में सबसे घातक गैर-सरकारी समूह’ बन चुके हैं.

वजह- 4: कमजोर और बिखरे हुए दुश्मन

यह कहानी का वह हिस्सा है जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता. हूतियों के खिलाफ जो ताकतें लड़ रही हैं, वे एकजुट नहीं हैं. सऊदी समर्थित यमन सरकार की सेना भ्रष्ट और कमजोर है. दक्षिणी अलगाववादी, जिन्हें संयुक्त अरब अमीरात का समर्थन हासिल है, सऊदी अरब से अलग अपने हितों के लिए लड़ रहे हैं. ये गुट जनवरी 2026 में एक-दूसरे से भी भिड़ चुके हैं.

ओटावा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थॉमस जूनो कहते हैं, ‘आधी कहानी ईरान के समर्थन की है, जो बेहद अहम है. दूसरी आधी कहानी उनके विरोधियों की कमजोरी है. यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार बिखरी हुई, कमजोर, असंगठित और भ्रष्ट है. हूतियों ने इसका पूरा फायदा उठाया है.’

वजह- 5: हवाई हमले अकेले कभी काम नहीं करते

इतिहास गवाह है कि सिर्फ हवाई हमलों से किसी भी विद्रोही समूह को खत्म नहीं किया जा सकता. अमेरिका ने 2024 और 2025 में तीन बार हूतियों को हवाई हमलों से कुचलने की कोशिश की, लेकिन हर बार नाकाम रहा.

मार्च-अप्रैल 2025 में ‘ऑपरेशन रफ राइडर’ नाम से बड़ा अभियान चलाया गया, जिसमें 1,000 से ज्यादा ठिकानों पर करीब 2,000 हथियार गिराए गए. अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के मुताबिक, सिर्फ इन हथियारों की कीमत 750 मिलियन डॉलर से ज्यादा थी.

हूतियों ने सात अमेरिकी MQ-9 रीपर ड्रोन मार गिराए, जिनमें से हर एक की कीमत 30 मिलियन डॉलर से ज्यादा थी. एक 60 मिलियन डॉलर का F/A-18 फाइटर जेट विमानवाहक पोत से फिसल कर गिर गया.

हफ्तों की अमेरिकी बमबारी के बाद हूतियों ने अमेरिकी जहाजों पर हमले रोकने का वादा किया, लेकिन इजरायल पर हमले जारी रखे. इजरायल ने जवाबी हमले किए और हूतियों के प्रधानमंत्री समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों को मार गिराया. हूतियों की सैन्य क्षमता फिर भी खत्म नहीं हुई.

सितंबर 2026 में हूतियों ने एक बड़ा सैन्य अभियान चलाया है. उन्होंने सऊदी समर्थित सरकारी सेना को पीछे धकेलते हुए मोखा बंदरगाह और मयून द्वीप पर कब्जा कर लिया. यह द्वीप बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के ठीक बीच में है, जहां से लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच के सारे जहाज गुजरते हैं.

हूतियों ने सऊदी अरब की पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन और उससे जुड़ी पंपिंग सुविधाओं पर ड्रोन हमला किया. उन्होंने किंग खालिद एयर बेस समेत सऊदी के कई सैन्य ठिकानों पर दर्जनों बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन दागे.

संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि यमन में सितंबर की शुरुआत से अब तक 1,25,000 से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं. 40 नागरिक हताहत हुए हैं, जिनमें आठ की मौत हुई है.

तो क्या हूतियों को हराया जा सकता है?

सिर्फ हवाई हमलों से नहीं. विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर ए के पाशा कहते हैं, ‘किसी भी स्थायी जीत के लिए जमीनी सैनिकों की जरूरत होगी, जो हमलों के बाद जमीन पर उतरकर इलाकों पर कब्जा कर सकें. लेकिन हूतियों के खिलाफ लड़ने वाली जमीनी ताकतें बिखरी हुई हैं और एक-दूसरे से लड़ चुकी हैं.’

सऊदी अरब हूतियों के साथ एक और जंग से बचना चाहता है, क्योंकि इसमें लंबी लड़ाई और भारी नुकसान होगा. अमेरिका ईरान में उलझा हुआ है और सीधे तौर पर शामिल होने से कतरा रहा है. सऊदी अरब ने पिछले महीने तुर्किये और पाकिस्तान के साथ एक आपसी रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन वह अभी तक सक्रिय नहीं हुआ है.

डिप्लोमैटिक रास्ते भी सीमित हैं. हूती चाहते हैं कि सऊदी अरब अपनी नाकाबंदी हटाए, जो सऊदी के लिए हार मानने जैसा होगा और इससे ईरान की हूतियों को मदद और बढ़ेगी.