
डॉक्टरों के मुताबिक Chandipura वायरस जानबूझकर बच्चों को नहीं चुनता, बल्कि बच्चों का दिमाग और नर्वस सिस्टम अभी विकसित हो रहा होता है, इसलिए उनका शरीर इस संक्रमण से होने वाले नुकसान को झेल नहीं पाता. पांच साल से कम उम्र के बच्चों में ब्लड-ब्रेन बैरियर, यानी दिमाग की सुरक्षा करने वाली एक परत, अभी पूरी तरह मजबूत नहीं होती है. बता दें कि यह परत सामान्य तौर पर हानिकारक चीजों को दिमाग तक पहुंचने से रोकती है, लेकिन कमजोर होने की वजह से वायरस और उससे होने वाली सूजन आसानी से दिमाग को नुकसान पहुंचा देती है. इसी दौरान बच्चों का दिमाग बहुत तेजी से बढ़ भी रहा होता है, इसलिए इस नाजुक समय में कोई भी गंभीर सूजन उनके सामान्य विकास, यानी चलने-फिरने, बोलने और सीखने की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित कर देता है.

इसके अलावा बच्चों के खेलने और रहने का तरीका भी उन्हें ज्यादा खतरे में डालता है. यह वायरस रेत मक्खियों यानी सैंडफ्लाइज के काटने से फैलता है, और ये मक्खियां जमीन के पास ही उड़ती हैं. छोटे बच्चे ज्यादातर समय जमीन पर बैठकर, रेंगकर या खेलकर बिताते हैं, वो भी अक्सर हाथ-पैर खुले रखकर, जिससे सैंडफ्लाई के काटने की संभावना बढ़ जाती है. खासतौर पर जो बच्चे गांव या जंगल जैसे इलाकों में रहते हैं, जहां ऐसी मक्खियां आम हैं, उनके लिए खतरा और भी ज्यादा हो सकता है.

एक और बड़ी वजह यह है कि छोटे बच्चे अपनी तकलीफ ठीक से बता नहीं पाते. बड़े लोग बता सकते हैं कि उन्हें तेज सिरदर्द, चक्कर जैसा महसूस हो रहा है, लेकिन बच्चे ऐसा नहीं कर पाते. ऐसे में माता-पिता को पूरी तरह समझ नहीं आता है कि बच्चे को कोई चीज तकलीफ दें रही है. इसलिए बच्चे के व्यवहार में आने वाले बदलावों पर ही निर्भर रहना पड़ता है, डॉक्टरों का कहना है कि माता-पिता को बच्चे के लक्षण बताने का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि अचानक होने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए, जैसे खेलते-खेलते अचानक बहुत ज्यादा नींद आना, दूध या खाना पीने-खाने से मना करना, सिर को संभाल न पाना, हाथ-पैर में कमजोरी, झटके आना, लगातार उल्टी होना या बच्चे का सुस्त हो जाना. ये सभी दिमाग से जुड़े खतरे के संकेत हैं, जिनमें तुरंत डॉक्टर को दिखाना जरूरी है.

डॉक्टरों के अनुसार Chandipura वायरस मुख्य रूप से दिमाग और नर्वस सिस्टम पर हमला करता है. यह संक्रमण एक्यूट इंसेफेलाइटिस का कारण बन सकता है, जिसमें दिमाग में सूजन आ जाती है. एक बार दिमाग प्रभावित हो जाए तो बहुत कम समय में बच्चे को झटके, बेहोशी, सांस लेने में तकलीफ, या कोमा तक हो सकता है. बीमारी इतनी तेजी से बढ़ती है कि रातभर इंतजार करना खतरनाक साबित हो सकता है, इसलिए जल्दी पहचान और तुरंत अस्पताल में इलाज बेहद जरूरी है.

एक जरूरी बात यह भी है कि इस वायरस से बचने पर भी खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता. अक्सर लोगों का ध्यान सिर्फ इस बीमारी से होने वाली मौतों पर जाता है, लेकिन बहुत से बच्चे जो इस संक्रमण से बच जाते हैं, उन्हें बाद में लंबे समय तक दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं. डॉक्टरों के मुताबिक कुछ बच्चे आईसीयू से बाहर आने के बाद भी मांसपेशियों में कमजोरी, झटके, देर से बोलना, संतुलन बनाने में परेशानी या शारीरिक विकास में पीछे रह जाते हैं.कई बार महीनों बाद परिवार को यह भी नहीं पता होता कि उनके बच्चे की यह दिक्कत पिछले मानसून में हुए Chandipura संक्रमण से जुड़ी है.

फिलहाल Chandipura वायरस का कोई खास एंटीवायरल इलाज मौजूद नहीं है, इसलिए बचाव ही सबसे बड़ा हथियार है. डॉक्टर सलाह देते हैं कि बच्चों को कीटनाशक-उपचारित मच्छरदानी के नीचे सुलाए, खासकर शाम के समय उन्हें पूरी बांह के कपड़े और पूरी पैंट पहनाए, डॉक्टर की सलाह से बच्चों के लिए सुरक्षित मच्छर भगाने वाली क्रीम या लोशन इस्तेमाल करें, साथ ही घर और आसपास की सफाई रखें ताकि कीड़े-मकोड़े न आए, और सबसे जरूरी अगर बच्चे को अचानक तेज बुखार के साथ सुस्ती, झटके, कमजोरी दिखे तो तुरंत डॉक्टर के पास ले जाया जाए.
Published at : 05 Aug 2026 07:30 AM (IST)





