Malaria Test : बारिश का मौसम आते ही मच्छरों से होने वाली बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. इनमें मलेरिया सबसे गंभीर बीमारियों में से एक है. कई बार लोग तेज बुखार, ठंड लगना या शरीर दर्द जैसी शुरुआती परेशानियों को सामान्य वायरल बुखार समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. यही लापरवाही बीमारी को गंभीर बना सकती है. इसलिए समय रहते मलेरिया की जांच कराना और सही इलाज शुरू करना बेहद जरूरी होता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि मलेरिया टेस्ट कब कराना चाहिए. एक्सपर्ट के अनुसार सही समय और जांच के तरीके क्या है.
मलेरिया टेस्ट कब कराना चाहिए?
एक्सपर्ट के अनुसार, मलेरिया के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य वायरल बुखार जैसे लगते हैं. यही वजह है कि कई लोग समय पर डॉक्टर के पास नहीं पहुंचते. आमतौर पर मरीजों को बुखार, ठंड लगना, सिर दर्द, शरीर में दर्द, बहुत ज्यादा थकान और कमजोरी महसूस होती है. कई लोग इन लक्षणों को सामान्य वायरल संक्रमण मान लेते हैं, जबकि यह मलेरिया भी हो सकता है.अगर किसी व्यक्ति में बुखार के साथ ठंड लगना या बहुत ज्यादा पसीना आना, बार-बार बुखार आना, ज्यादा थकान महसूस होना और मांसपेशियों में दर्द जैसे लक्षण दिखाई दें, तो उसे मलेरिया की जांच करानी चाहिए. इसके अलावा अगर कोई व्यक्ति ऐसे इलाके में रहता है या हाल ही में ऐसे स्थान की यात्रा करके आया है जहां मलेरिया के मामले ज्यादा आते हैं, तो उसे भी जांच कराने में देरी नहीं करनी चाहिए.
एक्सपर्ट के अनुसार सही समय क्या है?
अगर बुखार या अन्य लक्षण 24 से 48 घंटे के अंदर ठीक नहीं होते हैं, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए. मरीज को बुखार कम करने की दवा लेने के बाद भी अगर राहत नहीं मिल रही है तो मेडिकल जांच जरूरी हो जाती है. विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर लैब जांच कराने से मरीज का इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है. इससे मलेरिया की गंभीर जटिलताओं का खतरा कम होता है. साथ ही बिना जरूरत एंटीबायोटिक या मलेरिया की दवाएं लेने से भी बचा जा सकता है.
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समय पर जांच क्यों है जरूरी?
विशेषज्ञ के अनुसार, प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम परजीवी से होने वाला मलेरिया काफी गंभीर हो सकता है. अगर इसकी पहचान और इलाज में देरी हो जाए, तो मरीज को कई गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. इनमें दिमाग पर असर पड़ना, किडनी को नुकसान, गंभीर एनीमिया, सांस लेने में दिक्कत और कई अंगों के एक साथ प्रभावित होने जैसी स्थितियां शामिल हैं.समय पर जांच होने से सही इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है, जिससे बीमारी के गंभीर रूप लेने का खतरा काफी कम हो जाता है.
एक्सपर्ट के अनुसार जांच के तरीके क्या है?
हर जगह माइक्रोस्कोपी की सुविधा उपलब्ध नहीं होती. ऐसे में डॉक्टर दूसरी जांचों की मदद लेते हैं. इनमें रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट (RDT) शामिल है. यह जांच कम समय में रिपोर्ट देने में मदद करती है. इसके अलावा क्वांटिटेटिव बफी कोट (QBC) टेस्ट कुछ विशेष मामलों में तेजी से जांच के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही पॉलीमरेज चेन रिएक्शन (PCR) टेस्ट जरूरत पड़ने पर ज्यादा सटीक और संवेदनशील जांच के लिए इस टेस्ट का यूज किया जाता है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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