अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर दस्तखत से ठीक पहले इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बेरूत पर हवाई हमला कर दिया. इससे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप गुस्से से आगबबूला हो गए. उन्होंने नेतन्याहू को फोन पर कहा, ‘तुम क्या कर रहे हो?’ और फिर उन्हें ‘बहुत मुश्किल इंसान’ कह दिया. अब सवाल पूरे मिडिल ईस्ट में गूंज रहे हैं कि क्या वाकई अमेरिका, अपने सबसे पक्के सहयोगी इजरायल की पीठ थपथपाकर उसे अकेला छोड़ सकता है. अगर ऐसा हुआ, तो क्या इजरायल जैसा छोटा सा देश अपनी सत्ता बचाए रख पाएगा या फिर यरुशलेम की गलियां फिर से कब्जे की लड़ाई की गवाह बनेंगी?
अमेरिकी मदद पर क्यों टिकी है इजरायल की सांसें?
अमेरिका, इजरायल को सबसे बड़ी सैन्य मदद देता है. 2016 में हुए एक समझौते के तहत, अमेरिका 2019 से 2028 तक इजरायल को 38 बिलियन डॉलर देने पर राजी हुआ था. हर साल करीब 3.8 बिलियन डॉलर की यह मदद इजरायल तक पहुंचती है. इतना ही नहीं, 2025 में बाइडेन प्रशासन ने एक अतिरिक्त 8 बिलियन डॉलर के सैन्य सहायता पैकेज को भी मंजूरी दी थी. दूसरे शब्दों में कहें तो अमेरिकी मदद इजरायल के कुल रक्षा बजट का करीब 15% है. इसे छोटा समझने की भूल मत करिएगा, क्योंकि दुश्मन इसी अंतर को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं.
क्या इजरायल अकेले ही अपनी सुरक्षा कर सकता है?
इजरायल के पास अपनी शानदार सेना तो है, लेकिन अमेरिकी संसाधनों के बिना उसके लिए लंबी लड़ाई लड़ना मुश्किल हो जाएगा. सेना प्रमुख हर्जी हलेवी ने दावा किया है कि वे ईरान पर हमला करने को तैयार हैं और अकेले काम करना जानते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इजरायल सिर्फ तकनीकी मदद पर ही निर्भर नहीं है. अकेले 2023-24 के युद्ध के दौरान, अमेरिका ने इजरायल के लिए अपनी थाड एयर डिफेंस सिस्टम भी तैनात कर दी थी, यानी अमेरिकी सैनिकों ने सीधे इजरायल की रक्षा में हिस्सा लिया.
इजरायल विमानों से लेकर सैन्य उपकरणों के लिए अमेरिकी उद्योग पर निर्भर है. इजरायल के 334 लड़ाकू विमान, जो उसकी सेना की रीढ़ हैं, सब अमेरिका में बने हैं. इसके अलावा, अमेरिकी कांग्रेस ने 2027 के रक्षा बजट में इजरायल के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाने के प्रस्ताव पास कर दिए हैं. इसमें उनकी खुफिया एजेंसियों को एक-दूसरे से जोड़ने की योजना भी है. अगर अमेरिका पीछे हट गया, तो यह पूरा पेंच खुल जाएगा.
क्या अकेले सर्वाइव नहीं कर पाएगा इजरायल और यरूशलेम भी जाएगा हाथ से?
हां, क्योंकि न सिर्फ सैन्य मदद बंद होगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजरायल को बचाने वाली ढाल भी हट जाएगी. यूनाइटेड नेशंस और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका अक्सर इजरायल के खिलाफ प्रस्तावों को वीटो कर देता है. अगर अमेरिका अपना हाथ खींच लेता है, तो दुनिया इजरायल पर और ज्यादा प्रतिबंध और दबाव बना सकती है. इसका सीधा मतलब होगा कि यरूशलेम पर इजरायल के दावे को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पहचान दिलाने वाला सबसे ताकतवर समर्थक अब उसके साथ नहीं खड़ा होगा. अमेरिकी समर्थन के बिना, इजरायल को कई मोर्चों पर लड़ना होगा और मौजूदा क्षेत्रों पर कब्जा बनाए रखना और भी मुश्किल हो जाएगा.
अमेरिकी समर्थन घटने की क्या वजह है?
अमेरिकी समर्थन घटने की दो बड़ी वजहें हैं:
1. अमेरिकी जनता और राजनीति में बदलाव
प्यू रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में ज्यादातर लोग अब इजरायल को पसंद नहीं करते. डेमोक्रेट पार्टी में तो स्थिति और भी गंभीर है. बहुत उदारवादी मतदाताओं में 70% लोग इजरायल को ईरान या चीन से भी ज्यादा नकारात्मक रूप में देखते हैं. 2026 में 47 डेमोक्रेट सीनेटरों ने इजरायल को हथियारों की बिक्री रोकने के पक्ष में वोट दिया. यानी, अमेरिका के अंदर ही एक बड़ा वोटिंग ब्लॉक तैयार है जो इजरायल को मिलने वाली रकम बंद करवाना चाहता है.
2. इजरायल खुद चाहता है अमेरिकी समर्थन खत्म होना
नेतन्याहू खुद चाहते हैं कि अगले दस सालों में अमेरिकी सैन्य सहायता को शून्य पर लाया जाए. उनका तर्क है कि इजरायल की अर्थव्यवस्था 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने वाली है और यह सहायता अब अपमानजनक होती जा रही है. अमेरिकी सांसदों का भी कहना है कि अब संबंधों को और मजबूत बनाने की जरूरत है, जहां एकतरफा सहायता की बजाय दोनों एक-दूसरे के पार्टनर हों.
अगर अमेरिकी समर्थन हटा, तो क्या होगा?
अमेरिकी मदद बंद होने से इजरायल को 4 बड़े नुकसान होंगे:
- आर्थिक निर्भरता: अमेरिकी सहायता अब भी इजरायल के अपने रक्षा बजट का 8 से 15% के बीच है. हालांकि 1970 के दशक में यह 25% से ज्यादा था, लेकिन अब भी यह एक बड़ी राशि है. इसे हटाने से पूरी रक्षा व्यवस्था चरमरा सकती है.
- तकनीकी निर्भरता: इजरायल के पास एफ-35 जैसे 39 स्टील्थ फाइटर जेट्स हैं, जो पूरी तरह अमेरिकी तकनीक पर निर्भर हैं. अमेरिकी सहायता घटते ही इन विमानों के पुर्जे और हथियार भी खतरे में पड़ जाएंगे.
- इंटरसेप्टर की कमी: हिजबुल्लाह और ईरान के खतरों से निपटने के लिए इजरायल को हर रोज दर्जनों मिसाइलों को इंटरसेप्ट करना पड़ता है. इसके लिए आयरन डोम जैसी सिस्टम चाहिए. अमेरिकी कांग्रेस ने पहले ही 2026 में इसे मिलने वाले फंडिंग को 110 मिलियन डॉलर से घटाकर 60 मिलियन डॉलर कर दिया है.
- जासूसी नेटवर्क का खतरा: अगर रिश्ते बिगड़ते हैं, तो अमेरिका इजरायल को खुफिया जानकारी देना भी बंद कर सकता है. अमेरिकी डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी ने इजरायल के लिए खतरे का स्तर ‘क्रिटिकल’ कर दिया है, यानी उसके खिलाफ जासूसी की आशंका है.
बदलती दुनिया: सिर्फ इजरायल नहीं, बल्कि अपने लिए सोच रहा अमेरिका
ट्रंप प्रशासन का साफ कहना है कि ईरान के साथ होने वाला परमाणु समझौता अमेरिका के हितों में है, भले ही इजरायल को यह पसंद हो या नहीं. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में खुलकर कहा है, ‘हो सकता है कि इजरायल इससे खुश न हो, लेकिन यह समझौता मूल रूप से अमेरिका के हितों को पूरा करता है.’ इसके अलावा, ट्रंप के पूर्व अधिकारी जो केंट ने सुझाव दिया है कि अगर अमेरिका ईरान के साथ समझौता बचाना चाहता है, तो उसे इजरायल को मिलने वाली मदद पूरी तरह बंद कर देनी चाहिए. ये अब इशारे नहीं, खुले संकेत हैं.
इजरायल की मुश्किलें क्या खत्म होंगी या अभी शुरू हैं?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इजरायल आज भी एक बड़ी सैन्य ताकत है, लेकिन अमेरिका उसके लिए उतना ही जरूरी है जितना एक किले के लिए उसकी नींव. अमेरिकी सहायता न सिर्फ पैसा है, बल्कि यह उसे तकनीकी बढ़त, कूटनीतिक सुरक्षा और भरोसे का सबसे बड़ा सोर्स है. ट्रंप की धमकी और नेतन्याहू की बढ़ती मुश्किलों के बीच यह साफ है कि अमेरिका-इजरायल रिश्ते अब पहले जैसे नहीं रहे. अगर अमेरिका ने हाथ खींच लिया, तो इजरायल की सैन्य क्षमताओं पर गहरा असर पड़ेगा और आने वाला समय मध्य-पूर्व के लिए बड़े बदलाव लेकर आ सकता है.





