प्रीमैच्योर बेबी में अंधेपन का खतरा रोक सकती है शुरुआती आई स्क्रीनिंग, जानिए कैसे?

प्रीमैच्योर बेबी में अंधेपन का खतरा रोक सकती है शुरुआती आई स्क्रीनिंग, जानिए कैसे?


रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी एक ऐसी आंखों की बीमारी है, जो मुख्य रूप से प्रीमैच्योर बेबी में होती है. इसमें आंख के पीछे मौजूद रेटिना की रेड ब्लड सेल्स असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं. रेटिना वह हिस्सा होता है, जो रोशनी को पहचान कर दिमाग तक संदेश पहुंचाता है. अगर यह बीमारी गंभीर रूप ले ले, तो रेटिना अपनी जगह से अलग हो सकती है और बच्चे की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है. हालांकि शुरुआती चरण में इसका इलाज संभव है.

रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी एक ऐसी आंखों की बीमारी है, जो मुख्य रूप से प्रीमैच्योर बेबी में होती है. इसमें आंख के पीछे मौजूद रेटिना की रेड ब्लड सेल्स असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं. रेटिना वह हिस्सा होता है, जो रोशनी को पहचान कर दिमाग तक संदेश पहुंचाता है. अगर यह बीमारी गंभीर रूप ले ले, तो रेटिना अपनी जगह से अलग हो सकती है और बच्चे की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है. हालांकि शुरुआती चरण में इसका इलाज संभव है.

भारत में हर साल बड़ी संख्या में प्रीमैच्योर बच्चों का जन्म होता है. पहले जहां ऐसे बच्चों के बचने की संभावना कम होती थी, वहीं अब बेहतर देखभाल के कारण उनकी जान बचाई जा रही है, लेकिन सभी अस्पतालों में आंखों की जांच की सुविधा और निगरानी की व्यवस्था समान रूप से उपलब्ध नहीं है. यही वजह है कि विशेषज्ञ भारत में ROP को तीसरी महामारी के रूप में देख रहे हैं. यहां केवल बहुत कम वजन वाले ही नहीं, बल्कि 34 हफ्ते तक जन्मे या 2 किलो तक वजन वाले बच्चों में भी यह बीमारी देखने को मिल रही है.

भारत में हर साल बड़ी संख्या में प्रीमैच्योर बच्चों का जन्म होता है. पहले जहां ऐसे बच्चों के बचने की संभावना कम होती थी, वहीं अब बेहतर देखभाल के कारण उनकी जान बचाई जा रही है, लेकिन सभी अस्पतालों में आंखों की जांच की सुविधा और निगरानी की व्यवस्था समान रूप से उपलब्ध नहीं है. यही वजह है कि विशेषज्ञ भारत में ROP को तीसरी महामारी के रूप में देख रहे हैं. यहां केवल बहुत कम वजन वाले ही नहीं, बल्कि 34 हफ्ते तक जन्मे या 2 किलो तक वजन वाले बच्चों में भी यह बीमारी देखने को मिल रही है.

Published at : 12 Jun 2026 05:45 PM (IST)

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