Anhad Naad Column Indore: मगर मुझ को लौटा दो बचपन की मस्ती

Anhad Naad Column Indore: इंदौर की एक सोसायटी के हॉल में बड़े बच्चे बनकर कैरम व शतरंज की महफिल सजाते हैं।

By Hemraj Yadav

Publish Date: Solar, 17 Mar 2024 05:54 PM (IST)

Up to date Date: Solar, 17 Mar 2024 05:54 PM (IST)

Anhad Naad Column Indore: मगर मुझ को लौटा दो बचपन की मस्ती
सोसायटी के खेल हाल में अब रोज शाम को इस तरह जमती है जाजम। ~ सौ. दिनेश रेट्रेकर

Anhad Naad Column Indore: ईश्वर शर्मा, नईदुनिया इंदौर। दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी। मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन कागज की कश्ती वो बारिश का पानी। जगजीत सिंह की गाई व सुदर्शन फाकिर की लिखी इस दिलकश गजल को जरा गहरे मन से सुन लो तो आंखों से यादें बह निकलें। कुछ दीवाने-मस्ताने होते हैं, जो इस गजल को सुनते ही नहीं बल्कि जी भी लेते हैं। यह किस्सा ऐसे ही जिंदादिल लोगों का है, जिन्होंने जिंदगी की आपाधापी में भी खुशनुमा पल तलाश लिए हैं। इन्होंने अपनी मल्टी के खाली पड़े हाल का रंगरोगन करवाया और जमा ली कैरम व शतरंज की बिसात। मल्टी के बच्चों से लेकर बड़े तक यहां बच्चे बनकर कैरम व शतरंज की महफिल जमाते हैं। समिति अध्यक्ष दिनेश रेट्रेकर और साथी कहते हैं- यह बचपन को फिर से जी लेने की कोशिश है।

इंस्टा, फेबु, यूट्यूब की रील में संस्कृत के पाठ

लोग कहते हैं कि यह 15 सेकंड वाली रील्स का जमाना है। किंतु एक शख्स ने 15 सेकंड की इन अत्यंत क्षणभंगुर रील्स को भी गजब के स्थायी भाव में बदल दिया है। दरअसल, संस्कृत जानने वाले एक व्यक्ति ने 15-15 सेकंड की रील बनाकर इन दिनों संस्कृत सिखाना शुरू किया है। एक रील में वे संस्कृत के दो शब्द सिखाते हैं और उनका हिंदी व अंग्रेजी में अर्थ बताते हैं। इन्हें वे इंस्टाग्राम से लेकर फेसबुक और यूट्यूब तक पर अपलोड करते हैं। मजे की बात यह है कि लोग इन्हें खूब देख रहे हैं और संस्कृत का शुरुआती ककहरा भी बड़े मन से सीख रहे हैं। इस तरह इस शख्स ने बता दिया कि यदि मन में लगन हो तो अत्यंत विपरीत चीजों को भी कैसे अपनी संस्कृति के हित में उपयोग लिया जा सकता है।

मुझे गहरी प्रतीक्षा है… ऐ यार तुम मिलने आ जाओ

कभी यूं भी हो, दरिया का साहिल हो पूरे चांद की रात हो और तुम आओ। यह गजल किसी से मिलने की गहरी चाह के साथ किसी को पुकारती है। मित्रों, परिचितों, रिश्तेदारों से मिलने की ऐसी ही गहरी पुकार इंदौर के वयोश्रेष्ठ जीडी अग्रवाल ने लगाई है। उन्होंने जानने वाले प्रत्येक शख्स को एक मार्मिक संदेश भेजा है कि- फसल खेत में पकी खड़ी है। फल पेड़ पर पक चुका है। यह पका फल कभी भी पेड़ से टपक सकता है। अतः आप सब मुझसे मिलने श्री अहिल्या माता गोशाला परिसर में आइए। मैं टकटकी बांधे हुए भीगी आंखों से आपकी प्रतीक्षा करूंगा। दरअसल, जीवनभर कई बड़े पदों पर रहे जीडी अग्रवाल स्वयं को पका हुआ फल कहकर सबको मिलने बुला रहे हैं। यह पुकार उनके चिंतन की गहराई और ह्रदय की करुणा से निकली है। बुजुर्गियत में भी तबियत अगर इतनी मिलनसार हो तो यह आनंद की बात है।

हर इंसान के जीवन में धर्म इसलिए जरूरी है

विधर्मी लोग अक्सर प्रश्न उठाते हैं कि इंसान के जीवन में धर्म की क्या जरूरत? उन्हें सुनील सामरिया नामक व्यक्ति के साथ हुई घटना में इस प्रश्न का सटीक जवाब मिल जाएगा। हुआ यूं कि सुनील सामरिया तिरुवनंतपुरम के पद्मनाभस्वामी मंदिर में सपरिवार दर्शन करने पहुंचे। मंदिर में अपार भीड़ के बीच भी अच्छी तरह दर्शन हुए। दर्शन कर बाहर आए तो पत्नी को अहसास हुआ कि उनके कान से सोने के महंगे टाप्स भीड़ में कहीं गिर गए हैं। पलभर में आंखों के सामने अंधेरा छा गया। भीड़ इतनी थी कि बच्चा गुम जाए तो न मिले, छोटे टाप्स की क्या बिसात। गहरी निराशा के बावजूद पति-पत्नी फिर मंदिर में गए और मुख्य पुजारी को वाकया बताया। पुजारी ने मुस्कुराकर तुरंत टाप्स निकाले और बोले- किसी भक्त को ये फर्श पर पड़े मिले, वो इन्हें हमारे पास जमा कर गया है। यह धर्म ही है, जो दूसरे के धन को अपना न समझना सिखाता है।

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    1993 में नवभारत इंदौर में कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में करियर शुरू किया। इसके बाद 1995 में दैनिक भास्कर में प्रूफ रीडर के तौर पर ज्वाइन किया। 1995 में ही सांध्य दैनिक अग्निबाण में भी पेजमेकर के रूप में सेवाएं दी।