12 जोड़ों का सामूहिक विवाह और 62 ब्राह्मण बटुकों का हुआ उपनयन संस्कार

नगर में स्थित भैरव बाबा मंदिर परिसर में बसंत पंचमी के अवसर पर सामूहिक विवाह एवं ब्राह्मण बटुकों का उपनयन संस्कार आयोजित किया गया। बुधवार को मंदिर परिसर वैदिक मंत्रोपचार से गूंज उठा। 62 ब्राह्मण बटुकों का उपनयन और 12 जोड़ों का सामूहिक विवाह कराया गया। इस दौरान बटुकों की शोभायात्रा भी निकाली गई।

By Yogeshwar Sharma

Publish Date: Thu, 15 Feb 2024 12:19 AM (IST)

Up to date Date: Thu, 15 Feb 2024 12:19 AM (IST)

12 जोड़ों का सामूहिक विवाह और 62 ब्राह्मण बटुकों का हुआ उपनयन संस्कार

HighLights

  1. उपनयन, वेदारंभ एवं समावर्तन संस्कार का विशेष महत्व
  2. मंदिर परिसर वैदिक मंत्रोपचार से गूंज उठा
  3. वैदिक धर्म में यज्ञोपवीत दशम संस्कार

नईदुनिया न्यूज रतनपुर नगर में स्थित भैरव बाबा मंदिर परिसर में बसंत पंचमी के अवसर पर सामूहिक विवाह एवं ब्राह्मण बटुकों का उपनयन संस्कार आयोजित किया गया। बुधवार को मंदिर परिसर वैदिक मंत्रोपचार से गूंज उठा। 62 ब्राह्मण बटुकों का उपनयन और 12 जोड़ों का सामूहिक विवाह कराया गया। इस दौरान बटुकों की शोभायात्रा भी निकाली गई।

भैरव मंदिर के प्रबंधक व मुख्य पुजारी प़ं जागेश्वर अवस्थी ने बताया कि भैरव बाबा मंदिर परिसर में प्रतिवर्ष की तरह इस बार भी उपनयन संस्कार संपूर्ण विधि-विधान से कराया गया। इसमें ब्राह्मण बटुकों को तेल, हल्दी, मुंडन ब्रह्मभोज, दीक्षा, हवन, भिक्षा, काशीयात्रा आदि सभी संस्कार वैदिक मंत्रोचार के साथ कराया गया।

16 संस्कारों में एक है उपनयन संस्कार : पं अवस्थी ने बताया कि सोलह संस्कारों में उपनयन, वेदारंभ एवं समावर्तन संस्कार का विशेष महत्व है। सामूहिक उपनयन संस्कार में बटुकों को मंदिर प्रबंधन की ओर उपनयन के पूजन मे लिए आवश्यक सामग्री प्रदान किया गया। उपनयन संस्कार को संपन्न कराने में दो प्रमुख आचार्य प़ं राजेंद्र दुबे,उप आचार्य प़ं कान्हा तिवारी, सामूहिक विवाह के प्रमुख आचार्य महेश्वर पांडेय, उप आचार्य प़ं दीपक अवस्थी ,प़ं राजेंद्र तिवारी के साथ 11 अन्य सहयोगी भी शामिल थे।

बटुकों को दी गई दीक्षा फिर निकली शोभायात्रा

भैरव मंदिर के प्रमुख अवस्थी ने बातया ने बताया कि प्रतिवर्ष यह आयोजन निश्शुल्क किया जाता है। वैदिक धर्म में यज्ञोपवीत दशम संस्कार है। इस संस्कार में बटुक को गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है और यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। यज्ञोपवीत का अर्थ है यज्ञ के समीप या गुरु के समीप आना। यज्ञोपवीत एक तरह से बालक को यज्ञ करने का अधिकार देता है। शिक्षा ग्रहण करने के पहले यानी, गुरु के आश्रम में भेजने से पहले बच्चे का यज्ञोपवीत किया जाता था। भगवान रामचंद्र व कृष्ण का भी गुरुकुल भेजने से पहले यज्ञोपवीत संस्कार हुआ था। दीक्षा के बाद गाजे-बाजे के साथ बटुकों की शोभायात्रा भर निकाली गई, इसमें उनके परिजन सहित अन्य लोग शामिल हुए।