अगहन मास के पहले गुरुवार को शहर में भक्ति और परंपरा की झलक देखने को मिली। घर-घर में मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा- शनिवार की शाम से पवित्र घर के लिए पूरी तरह से छुट्टी ले ली गई थी। रविवार शाम से ही महिलाओं ने घर के आंगन और गोदामों पर चावल के घोल से चौक और रंगोली बनाई।
द्वारा धीरेंद्र कुमार सिन्हा
प्रकाशित तिथि: गुरु, 21 नवंबर 2024 08:30:48 पूर्वाह्न (IST)
अद्यतन दिनांक: गुरु, 21 नवंबर 2024 08:30:48 पूर्वाह्न (IST)
पर प्रकाश डाला गया
- अगहन मास के हर गुरुवार का विशेष महत्व है।
- गुरुवार सूर्योदय से पूर्व उठकर माताएं करती हैं पूजा।
- अगहन में गुरुवार को लक्ष्मीनारायण की पूजा होती है।
नईदुनिया प्रतिनिधि बिलासपुर। हिंदू सिद्धांत के अनुसार अगहन मास के गुरुवार को लक्ष्मी और विष्णु की पूजा करने से घर में समृद्धि और खुशहाली आती है। ज्योतिषाचार्य पंडित देव कुमार पाठक के अनुसार प्रातः शुभ अभिषेक में महिलाएं हल्दी और आंवले का उबटन स्नानघर और पूजा- अभिषेक में भाग लेंगी। इस दौरान घर-आंगन को सुंदर चौक, दीपों और फूलों से गिराया जाता है।
लक्ष्मी और विष्णु की मूर्ति की स्थापना पर विशेष धूप, दीप, और धार्मिक अनुष्ठान के साथ पूजा की जाएगी। पूजा के बाद खेड, पूड़ी और अन्य पारंपरिक व्यंजन भोग के रूप में बेक किये जायेंगे।

इस पूजा की खास बात
अगहन मास के हर गुरुवार की पूजा में उस प्रसाद को घर के बाहर नहीं खाया जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से मां लक्ष्मी नाराज हो सकती हैं। पूजा के बाद परिवार के सदस्य एक साथ प्रसाद ग्रहण करेंगे। ग्रामीण क्षेत्र में विशेष रूप से नए चावल से बने व्यंजन, जैसे फरा और पूड़ी, भोग में शामिल होंगे। वहीं शहर के लोग खेड-पूड़ी और अन्य मिठाइयों का भोग लगाएंगे।
पूरे महीने की पूजा उत्सव
अगहन मास के हर गुरुवार को यह पूजा अलग-अलग प्रकार के व्यंजन और उपहार के साथ की जाती है। पहले गुरुवार का विशेष महत्व है, क्योंकि इसे नए फल के उपयोग की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है। यह पारंपरिक परिवार और समाज के बीच समानता और समृद्धि का संदेश है।
अगहन महामहालक्ष्मी मानी जाती है
आज गुरुवार 21 नवंबर 2024 को पहला अगहन गुरुवार को पर्व मनाया जा रहा है। जिसमें शास्त्र शास्त्र के आधार पर अगहन गुरुवार में व्रत रखने का विधान है। इस दिन स्नानादि से निवृत्त व्रत का संकल्प महिलाओं द्वारा किया जाता है। इसके अलावा शाम को चंद्रमा के उदित होने के बाद पुष्प, नैवेध, धूम, दीप से भगवान गणेश की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार अगहन माह महालक्ष्मी का महत्व माना गया है। इस माह के गुरुवार को धन देवी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने से सुख-शांति और समृद्धि मिलती है।
देवी के पग चिह्न का स्वागत है
घर व द्वार कोली से सजाकर मां पूजा स्थल तक देवी के पग चिन्हा गुरुवार को भोर में उनकी पूजा करती हैं। सुबह, दोपहर और शाम को तीन बजे का समय उन्हें भोग लगाते हुए पूजा-अर्चना की जाती है। चावल के आटे से सजाएंगे घर का द्वारगुरुवर को सुबह अल मां की पूजा- प्रारंभ होगी। महिलाओं ने घर-द्वार की सजावट के साथ ही पूजा की तैयारी मंगलवार से ही शुरू कर दी है।
रविवार को मृत घर के द्वार से लेकर पूजा स्थल तक चावल के आटे के गालों से मां लक्ष्मी के पद तक। साथ ही बैले में रंगोली चिलचिलाती। गुरुवार की सुबह सूर्य आरोहण से पहले गृह लक्ष्मी स्नान-ध्यान कर मां लक्ष्मी की पूजा- आर्द्र पूजा करें। यही क्रम दो व शाम को भी छोड़ें। इस बीच मां को तीन बार अलग-अलग भोगने का मौका मिलेगा।
माँ लक्ष्मी पृथ्वी लोक का विचरण करती हैं
अगहन गुरुवार की पौराणिक ज्योतिष के अनुसार इस माह को लेकर यह प्रचलित है कि अगहन गुरुवार को मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक का विचरण करने आती हैं। इस अवसर पर जो अखंड घर-द्वार की विशेष साज-सज्जा के साथ मां लक्ष्मी की पूजन-अर्चन करता है। उसके घर सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इन सिद्धांतों को लेकर लोग आदि काल से मानते आ रहे हैं।
अघन को लेकर बाजार में रही पटरी
अगहन पूजा को लेकर हर वर्ग द्वारा किया जाता है। इस पूजा में फल फूल और दुबी का बहुत महत्व है। इस आकर्षक शहर के अधिकांश चौक-चित्र में यह पूजा से जुड़ा सामान लेकर ग्रामीण आये थे। इससे पहले बाजार में लोगो की चॉकलेडेमी देखते ही बन रही थी।
ये काम नहीं है
- इस दिन को कपड़े के कपड़े, साबुन के कपड़े के सामान के रूप में जाना जाता है।
- इस दिन के भोजन को भी नहीं खाना चाहिए।
- गुरुवार को ऊपर से नाममात्र का खाना नहीं बनाना चाहिए।
- दक्षिण, पूर्व, नैऋत्य में यात्रा करने से बचें।



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