Court Information: कोर्ट ने केदारपुर की 22 बीघा दस बिस्वा जमीन निजी मानी

केदारपुर की 22 बीघा 10 बिस्वा जमीन को कोर्ट ने निजी घोषित कर दिया है। जबकि शासन ने इस पर अपना बताया था। सिविल न्‍यायालय ने 2011 में सरकारी ही बताया था और फरियादी का दावा खारिज कर दिया था। लेकिन उच्‍च न्‍यायालय ने फरियादी के दावे को सही माना और जमीन को निजी घोषित कर दिया।

By Vikram Singh Tomar

Publish Date: Tue, 19 Nov 2024 11:00:16 AM (IST)

Up to date Date: Tue, 19 Nov 2024 11:00:16 AM (IST)

कोर्ट ने केदारपुर की 22 बीघा दस बिस्वा जमीन निजी मानी। सांकेतिक चित्र।

HighLights

  1. कोर्ट ने भूमि को निजी घोषित करते हुए शासन की अपील खारिज की
  2. शासन ने आजादी से पहले से सरकारी होना बताया था
  3. सिविल न्यायालय ने 2011 में कर दिया था दावा खारिज

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। ग्वालियर शिवपुरी लिंक रोड स्थित केदारपुर की 22 बीघा 10 बिस्वा जमीन के मामले में दायर सेकेंड अपील पर फैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट ने भूमि को निजी घोषित करते हुए शासन की अपील को खारिज कर दिया है। बीती सुनवाई पर शासन की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता ने उक्त भूमि को आजादी से पहले से सरकारी होना बताया था और साथ ही इसको काट छांटकर पंजाब सिंह के नाम पर करने की बात कही थी।

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हाई कोर्ट ने फाइनल बहस सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। जिसे स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया। दरअसल, एडीजे कोर्ट के आदेश के खिलाफ शासन ने यह अपील की थी। जिसमें ग्राम केदारपुर की सर्वे क्रमांक -476 की सात बीघा नौ बिस्वा और 480 की 15 बीघा एक बिस्वा जमीन (कुल 22 बीघा 10 बिस्वा) बेशकीमती जमीन पर पंजाब सिंह के मालिकाना हक को शासन ने गलत बताया था।

वहीं पंजाब सिंह ने स्थाई निषेधाज्ञा व भूमि स्वामी घोषित करने की मांग करते हुए 2009 में सिविल कोर्ट में दावा पेश किया। 25 अगस्त 2011 को सिविल न्यायालय ने दावा खारिज कर दिया। इस आदेश के खिलाफ एडीजे कोर्ट में अपील की गई। जिस पर तीन अक्टूबर 2012 को न्यायाधीश रुचिर शर्मा ने पंजाब सिंह के पक्ष में फैसला सुनाया।

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खनन कर भूमि को बदहाल छोड़ने के मामले में पट्टाधारियों सहित अधिकारियों को नोटिस

हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में युगल पीठ के समक्ष एक जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका शताब्दीपुरम के महू क्षेत्र में खनन के बाद खुले पड़े गड्ढों को लेकर दायर की गई है। समाज सेवक अमित शर्मा के द्वारा दायर इस याचिका में पैरवी करते हुए अधिवक्ता अवधेश सिंह तोमर ने कोर्ट के समक्ष तर्क देते हुए बताया कि खनन की लीज 2017 में खत्म हो जाने के बाद भी खदान सुरक्षा अधिनियम का पालन नहीं किया गया।

न तो मौके पर तार फेंसिंग की गई है और न ही गड्ढों को भरकर समतल किया गया। अब वहां स्थिति यह है कि आए दिन घटनाएं होती हैं, कई मौतें भी हुई हैं और पानी के भराव के कारण इसी क्षेत्र में सबसे अधिक डेंगू के मामले भी दर्ज हुए हैं। हाई कोर्ट ने तर्कों पर चिंता जताते हुए ग्वालियर के कलेक्टर, प्रदूषण अधिकारी और खनन अधिकारी सहित संबंधित क्षेत्र के भोपाल तक के अधिकारियों को नोटिस जारी किए हैं। अब इस मामले में आगामी सुनवाई तीन जनवरी 2025 को होगी।