Raisen Information: यूं ही नहीं पड़ा नाम, वाकई “रायल” था रायसेन का टाइगर
लंबे समय से इस बाघ की तलाश थी, आखिर अब वह पूरी हो गई। इंदौर के पास महू से चलकर जंगल-जंगल घूमते हुए वह रायसेन तक पहुंचा, काफी भटकने के बाद उसने रायसेन के आसपास अपने अनुकूल क्षेत्र को टेरेटरी बनाया। इस संघर्ष के दौरान तार के बाड़े में फंसने से उसी पीठ पर गंभीर घाव भी हुआ, जिसे महीने भर में उसने ठीक किया।
By Chetan Rai
Publish Date: Solar, 16 Jun 2024 07:28:33 PM (IST)
Up to date Date: Solar, 16 Jun 2024 09:31:31 PM (IST)
HighLights
- संघर्षों ने बनाया सशक्त, सामान्य बाघों से अलग हो गया बर्ताव
- उसे रेस्क्यू के बाद सतपुड़ा टाइगर रिजर्व भेज दिया गया है
- बाघ को पकड़ने में 10 दिन लग गए थे
चेतन राय, रायसेन। रेस्क्यू किए गए बाघ को रायसेन में रायल टाइगर की पहचान मिली थी। एक बार बाघ को शहर के सांची रोड स्थित “रायल” नाम के एक शादी गार्डन में घुसकर बेखौफ घूमते देखा गया था। उसके बेखौफ अंदाज और रायल गार्डन में घुसने के इत्तेफाक से उसे यह नाम मिला, लेकिन कहा जाता है कि इत्तेफाक भी यूं ही नहीं होते। रायसेन का बाघ वाकई रायल था, यह हम नहीं कह रहे। वो पूरी टीम कह रही है, जो बीते तीस दिन से बाघ को पकड़ने जंगल-जंगल भटक रही थी। रायल टाइगर कई मायनों में अलग और अनूठा था, उसका व्यवहार सामान्य बाघों की तरह नहीं था। उसे रेस्क्यू के बाद सतपुड़ा टाइगर रिजर्व भेज दिया गया है, वाइल्ड लाइफ प्रेमी इस बात को जान पा रहे हैं कि एक शानदार बाघ रायसेन से चला गया है।
“रायल” जिसका अर्थ होता है राजशी, शाही अथवा नबावी। इसे जीवन जीने के अंदाज के तौर पर देखा जाता है। यही नाम रायसेन में रेस्क्यू किए गए बाघ को यहां के लोगों ने दिया था। एक घटना के बाद जब उसे पकड़ने अभियान चलाया गया तो पहले उसके व्यवहार का आंकलन किया गया।
करीब 20 दिन स्थानीय टीम ने बाघ का सर्वे किया, इतने समय में टीम ये जान गई कि बाघ सामान्य से कुछ अलग है। टीम को समझ आ गया कि रॉयल टाइगर को पकड़ पाना उनके वश की बात नहीं। इसके बाद कान्हा, पन्ना, वन विहार और सतपुड़ा से विशेषज्ञों की टीम व पांच हाथी बुलाए गए।
इतने बड़े तामझाम के बाद भी बाघ को पकड़ने में 10 दिन लग गए। टीम लीडर डीएफओ विजय कुमार इस बात को पूरी ईमानदारी से स्वीकारते हैं कि बाघ की इंटेंलीजेंसी काफी बेहतर थी और कई मौकों पर वह हमारी सोच से एकदम अलग बर्ताव करता था, इसलिए उसे पकड़ना चुनौतीपूर्ण हो गया था।
हमारे द्वारा जंगल में लगाए गए कैमरों से बचने में भी वह माहिर था। एक बार यदि किसी कैमरे की फ्लैश चमक जाए तो दोबारा वह उसके सामने कभी नहीं आया। वह अपनी उम्र के हिसाब से शारीरिक और मानसिक रूप से काफी अधिक परिपक्व था।
तीन गुना बड़ी टेरेटरी बनाई
डीएफओ विजय कुमार के अनुसार एकमात्र घटना को छोड़ दिया जाए तो बाघ ने कभी भी इंसानों के साथ असामान्य व्यवहार नहीं किया। बस सामान्य टाइगरों से वह इसलिए अलग था कि इंसानों से नजदीकी उसे डराती नहीं थी। बेखौफ होकर शहर, गांव, सड़क और खेत से गुजरता था।
ऐसा अमूमन दूसरे बाघ नहीं करते और यहां के अन्य बाघों का भी ऐसा व्यवहार कभी सामने नहीं आया। सामान्यता बाघ इंसानों से दूर ही रहते हैं। 50 से 60 वर्ग किमी की सामान्य टेरेटरी की तुलना में उसने डेढ़ सौ वर्ग किमी में टेरेटरी बनाई थी, जिसमें लगातार घूमता रहता था। शारीरिक रूप से काफी सक्रिय था। एक बार किए शिकार को उसने कभी दोबारा नहीं खाया।
संघर्षों ने बना दिया मजबूत
रॉयल टाइगर का सामान्य से अलग व्यवहार होने के पीछे का कारण है कि वह समय से पहले अपनी मां से बिछड़ गया। इसके बाद उसने अकेले जंगल में संघर्ष करते हुए खुद को बड़ा किया। इन्हीं संघर्ष और चुनौतियों ने उसे समय से पहले शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत कर दिया।

