‘Kantara impressed me to make ‘Munjya” | ‘कांतारा से मिली ‘मुंज्या’ बनाने की प्रेरणा’: डायरेक्टर बोले- हॉलीवुड में पचास साल पुरानी कहानी, हमारे पास तो सदियों से कहानियां हैं

6 घंटे पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र

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डायरेक्टर आदित्य सरपोतदार की फिल्म ‘मुंज्या’ इन दिनों खूब पसंद की जा रही है। बिना किसी बड़े स्टार के इस फिल्म को सिर्फ सब्जेक्ट की वजह से पसंद किया जा रहा है। डायरेक्टर को इस फिल्म को बनाने की प्रेरणा ‘कांतारा’ से मिली। दैनिक भास्कर से खास बातचीत के दौरान डायरेक्टर ने बताया कि हमारे देश के हर प्रांत में ऐसी- ऐसी लोक कथाएं हैं। जिन पर फिल्में बनाई जाए तो सदियां बीत जाएंगी, हमारे पास फिल्म के लिए सब्जेक्ट की कमी नहीं होगी। आदित्य को फिल्म मेकिंग विरासत में मिली है। उनके दादा विश्वास सरपोतदार और पिता अजय सरपोतदार मराठी सिनेमा के जाने माने प्रोड्यूसर और डिस्ट्रीब्यूटर रहे हैं। आदित्य सरपोतदार ने अपने करियर की शुरुआत 2008 में मराठी फिल्म ‘उलाधाल’ से की थी।

मुंज्या क्या है, इस विषय पर फिल्म बनाने की प्रेरणा कहां से मिली?

मुंज्या एक ऐसे ब्रह्मराक्षस की कहानी है, जिसकी कथाएं महाराष्ट्र के कोंकण में बहुत प्रचलित है। बचपन से ही सोचता था कि ऐसी कथाओं पर फिल्में क्यों नहीं बनती हैं। ऐसी ही लोक कथा पर बनी फिल्म ‘कांतारा’ खूब चली। हमारे महाराष्ट्र और देश के हर प्रांत में ऐसी बहुत सारी कहानियां हैं। जिनपर फिल्में बनाई जाए तो हमारे यहां कभी सब्जेक्ट की कमी नहीं होगी। हॉलीवुड में 50- 60 सालों में जो किताबें लिखी गई थी उस पर गेम ऑफ थ्रोन्स, हैरी पॉटर जैसी बड़ी-बड़ी सीरीज बनी है। हमारे पास तो सदियों से ऐसी कहानियां पड़ी हुई हैं कि सदियां बीत जाएंगी। फिल्मों के लिए कहानियां कम नहीं पड़ेगी।

मुंज्या कोंकण के ब्राह्मण समाज से आता है। 5-7 साल की उम्र में बच्चों का उपनयन संस्कार कर देते हैं। जिसे कोंकण में मुंज्य कहते हैं। अगर उन बच्चों की मुंज्य के 10 दिन के बाद अकाल मृत्यु हो जाए तो उनकी अतृप्त इच्छाएं पूरी नहीं होती हैं। इसलिए वो भूत बन जाते हैं जिसे मुंज्या कहा जाता है। यानि की मुंज्य से मुंज्या बनता है,जिसका पीपल के पेड़ के साथ खास कनेक्शन होता है। क्योंकि मृत बच्चे की अस्थियां पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ देते है और जनेऊ पेड़ से बांध देते हैं। ऐसी मान्यता है कि भूत पेड़ से बंधा होता है। अगर वह पेड़ से छूटकर किसी तरह से निकाल गया तो गाव में पहुंचकर उत्पाद मचाएगा।

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यह हॉरर फिल्म है,लेकिन बच्चे डरने के बजाय फिल्म को इंजॉय कर रहे हैं?

यह हॉरर से ज्यादा यह कॉमेडी फिल्म है। जब हम भूत प्रेत के बारे में सोचते हैं, तो हमारे सामने छह फुट लंबे डरावने वाले चेहरे आते हैं। लेकिन मुंज्या को लेकर बचपन से मेरे मन में जो इमेज रही है, वह वह डरावना नहीं थी। मैंने इस फिल्म को 10-20 वर्ष के लोगों को ध्यान में रखकर बनाया है। मुझे हमेशा से यह लगता था कि अगर इस विषय पर फिल्म बनानी है तो फिल्म बच्चों वाली लगनी चाहिए। इसमें बच्चों के लिए थोड़ा ज्यादा ह्यूमर रखा है। फिल्म शूटिंग हमने रियल लोकेशन पर की है।

शूटिंग के दौरान कभी डरावने वाले अनुभव हुए?

शूटिंग से समय हंसे ज्यादा और डरे कम हैं। जब प्योर हॉरर फिल्म बनती है तो थोड़ा सा डरावना माहौल होता है। लेकिन यह पूरी तरह से हॉरर फिल्म नहीं है। एक घटना हुई थी,जहां थोड़ा सा डरावना अनुभव हुआ। जब हम लोग कोंकण में शूटिंग रहे थे। वहां पर यूनिट के एक व्यक्ति ने कहा कि नींद नहीं पूरी हो रही, क्योंकि रोज रात को तीन बजे नींद खुल जाती है। रोज उसी समय नींद खुलती थी। ऐसे 20- 25 लोग निकले जिनके साथ वैसा हो रहा था। मेरे भी साथ भी हुआ था। हम सोच में पड़ गए कि ऐसा सबके साथ क्यों हो रहा है? थोड़ा सा डर गए थे।

आप भूत- प्रेतों में विश्वास करते हैं?

मैं पॉजिटिव और निगेटिव एनर्जी में विश्वास करता हूं। कुछ जगह ऐसे होते हैं जहां आपको लगता है कि वहां ज्यादे समय तक नहीं रूकना चाहिए। ऐसा क्यों होता है,आज तक इसका लॉजिक समझ में नहीं आया। कभी आप किसी गुफा में जाओ तो वहां ऐसी पॉजिटिव एनर्जी आती हैं कि मन करता है कि कुछ समय के लिए वहां बैठ जाएं। कभी- कभी खुली जगह में भी ऐसा लगता है कि वहां रुकने लायक नहीं है।

फिल्म मेकिंग आपको विरासत में मिली है। आपके दादा और पिता जी भी फिल्म मेकिंग से जुड़े रहे,आपकी शुरुआत कैसे और कहां से हुई?

पूना में हमारा अलका नाम से एक थिएटर था। जिसे हमारे दादा और पिता जी चलाते थे। स्कूल के बाद मैंने थिएटर में बहुत वक्त बिताया। सिनेमा को समझने का बहुत मौका मिला। मेरे दादा जी ने कई मराठी फिल्में प्रोड्यूस की। उनके सेट्स पर जाया करता था। मैंने बाइक चलाना सेट पर ही सीखा था। सेट मेरी लाइफ का हिस्सा बन गया था। उसके अलावा मुझे कुछ और पता ही नहीं था। मैंने सोच लिया था जो कुछ करना इंडस्ट्री में ही करना है।

पहली फिल्म बनाने के लिए किस तरह का संघर्ष करना पड़ा?

जब आप फिल्मी बैकग्राउन्ड से आते हैं तो पहली फिल्म बनाने के लिए कम संघर्ष करना पड़ता है। फिल्म अच्छी बने इसके लिए संघर्ष करना पड़ता है। मैंने पहली मराठी फिल्म ‘उलाधाल’ 2008 में बनाई थी। वह मेरे लिए आसान था। उस समय मल्टीस्टारर फिल्म थी। मैं पहला शॉट ले रहा था और रोल एक्शन कैमरा बोलना भूल गया। इसके बाद 5-6 मराठी फिल्में और बनाई।

हिंदी में आपने एक नया प्रयोग द शोले गर्ल बनाकर की थी?

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए वह फिल्म मुझे जी फाइव के लिए बनानी थी। मैंने भारत की पहली स्टंटवुमन रेशमा पठान पर आधारित वह फिल्म बनाई थी, जिन्होंने शोले में हेमा मालिनी के लिए स्टंट डबल के रूप में काम किया। बिदिता बाग ने रेशमा पठान की भूमिका निभाई थी। वह एक घंटे की फिल्म थी। उस फिल्म को बहुत ही कम समय में बनाकर देना था। फिल्म की शूटिंग के दौरान मेरा पैर फैक्चर हो गया और मैंने व्हील चेयर पर बैठकर पूरी फिल्म की शूटिंग पूरी की।

अगली फिल्म ककुड़ा भी हॉरर ही है?

इस फिल्म को हॉरर नहीं, बल्कि कॉमेडी फिल्म कह सकते हैं। इस फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा, रितेश देशमुख और साकिब सलीम ने काम किया है। अपने यहां बड़ी सहजता से यह कहने की आदत है कि हॉरर फिल्म है। लेकिन सच्चाई यह है कि हमारे यहां हॉरर फिल्में बहुत कम बनती हैं। मैंने लास्ट में हॉरर फिल्म तुम्बाड देखी थी। जिसे देखकर डर लगा था। ककुड़ा की कहानी मथुरा और राजस्थान के बॉर्डर पर बसे एक गांव की सत्य घटना पर आधारित है, जिसे हमने कॉमेडी के अंदाज में पेश किया है।