जर्मनी में Gen-Z प्रदर्शन कैसे रातों-रात भड़का? भारत से कितना अलग युवा आक्रोश


जर्मनी इस समय अपनी जमीन पर एक ऐसी आग देख रहा है, जो पहली नजर में भारत के हालिया छात्र प्रदर्शनों जैसी लगती है, लेकिन इसकी जड़ें और मांगें बिल्कुल अलग हैं. अक्टूबर 2026 के आखिरी हफ्ते में ‘Gen Z regelt’ के नाम से उभरे एक नए युवा आंदोलन ने बर्लिन, फ्रैंकफर्ट, हैम्बर्ग और म्यूनिख समेत 30 से ज्यादा शहरों में हजारों लोगों को सड़कों पर उतार दिया.

आखिर दिन में शांतिपूर्ण शुरू हुए ये प्रदर्शन कैसे रात होते-होते हिंसा में बदल गए और यह भारत से कैसे अलग हैं…

आखिर जर्मनी में आंदोलन की आग क्यों भड़की?

जर्मनी में यह प्रदर्शन अचानक नहीं हुआ है. इसके पीछे तीन बड़ी वजहें हैं जो एक साथ काम कर रही हैं:

  • शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं में कटौती: जर्मनी सरकार ने पिछले कुछ सालों में सार्वजनिक खर्च में कटौती की है, जिसका सीधा असर स्कूलों और यूनिवर्सिटीज पर पड़ा है. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि क्लासरूम को पर्याप्त पैसा नहीं मिल रहा हैं और छात्रों को बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है, जबकि रक्षा खर्च बढ़ाया जा रहा है.
  • सैन्य सेवा की वापसी का डर: जर्मनी में एक नई ‘स्वैच्छिक सैन्य सेवा’ योजना शुरू की गई है, लेकिन युवाओं को डर है कि जल्द ही इसे फिर से अनिवार्य कर दिया जाएगा. ‘Gen Z regelt’ का यह सबसे मुख्य मुद्दा है. वे सैन्य सेवा के बजाय शिक्षा और डेवलपमेंट पर खर्च चाहते हैं.
  • बढ़ती रहने की लागत: जर्मनी की अर्थव्यवस्था इस समय धीमी गति से बढ़ रही है. महंगाई ने युवाओं की क्रय शक्ति को कम कर दिया है. एक 18 वर्षीय प्रदर्शनकारी ने कहा कि सरकार के पास उनकी चिंताओं का कोई जवाब नहीं है. सिर्फ कटौती और बोझ बढ़ाया जा रहा है.

शांतिपूर्ण प्रदर्शन से दंगे तक का सफर

प्रदर्शनकारियों ने खुद को शांतिपूर्ण बताया, लेकिन शाम होते-होते स्थिति बिगड़ गई. फ्रैंकफर्ट में दुकानों के शीशे तोड़े गए, मोलोटोव कॉकटेल फेंके गए और पुलिस पर पटाखे, पत्थर और बोतलें चलाई गईं. पुलिस ने वॉटर कैनन और पेपर स्प्रे का इस्तेमाल किया.

हिंसा के पीछे एक अहम खुलासा हुआ है. हेस्से राज्य के गृह मंत्री रोमन पोसेक के मुताबिक, फ्रैंकफर्ट में करीब 100 स्पष्ट रूप से पहचाने गए वामपंथी चरमपंथियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन में घुसपैठ की और हिंसा भड़काई. जर्मन अधिकारियों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि चरमपंथी समूह छात्र प्रदर्शनों को ‘स्ट्रीट कैओस’ में बदलने की कोशिश कर सकते हैं.

‘Gen Z regelt’ के आयोजकों ने हिंसा से दूरी बनाई है और कहा कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण है. सरकार और पुलिस का मानना है कि कुछ तत्वों ने इस मूवमेंट का फायदा उठाया.

भारत से कैसे अलग है यह मॉडल?

भारत में भी 2026 में बड़े छात्र प्रदर्शन हुए हैं, खासकर मतदाता सूची (SIR) के खिलाफ और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर. लेकिन जर्मनी और भारत के प्रदर्शनों में तीन बड़े अंतर हैं:

  • मांगों का दायरा: भारत के छात्र प्रदर्शन मुख्य रूप से चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही पर केंद्रित थे. जर्मनी में मांगें शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और सैन्य सेवा जैसे कल्याणकारी राज्य के पतन से जुड़ी हैं. यह एक ‘अस्तित्व के संकट’ का गुस्सा है, जबकि भारत में यह ‘लोकतांत्रिक प्रक्रिया’ का सवाल है.
  • हिंसा की भूमिका: भारत में छात्र प्रदर्शन मुख्य रूप से शांतिपूर्ण रहे और उनका दमन हिरासत और लाठीचार्ज से हुआ. जर्मनी में हिंसा प्रदर्शन का हिस्सा बन गई. दुकानों की लूट और पुलिस पर हमले हुए, जो भारत के हालिया छात्र आंदोलनों में नहीं देखे गए.
  • राजनीतिक संदर्भ: जर्मनी में यह प्रदर्शन यूरोप भर में फैले युवा आंदोलनों की एक कड़ी है. फ्रांस, सर्बिया और अन्य देशों में भी इसी तरह के प्रदर्शन हुए हैं. भारत में छात्र आंदोलन मुख्य रूप से घरेलू चुनावी मुद्दों से जुड़े हैं, न कि किसी पूरे महाद्वीपीय लहर का हिस्सा.

जर्मनी का गुस्सा ‘कल्याणकारी राज्य’ के टूटने का संकेत

जर्मनी में Gen-Z का प्रदर्शन सिर्फ एक छात्र आंदोलन नहीं है. यह उस सामाजिक अनुबंध के टूटने का संकेत है, जिस पर यूरोपीय कल्याणकारी राज्य टिका था. जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के बदले युवाओं से कर और सैन्य सेवा की उम्मीद की जाती थी. जब सरकारें कटौती करती हैं और सैन्य सेवा की वापसी की बात करती हैं, तो युवाओं को लगता है कि उनका भविष्य ‘गिरवी’ रखा जा रहा है.

एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत के लिए यह एक सबक है. सिर्फ रोजगार या शिक्षा की कमी ही आंदोलन नहीं भड़काती, बल्कि यह भावना कि ‘हमारी बात नहीं सुनी जा रही’. यह ज्यादा खतरनाक है. जर्मनी में ‘Gen Z regelt’ का नारा कहता है, ‘हम संभालेंगे’, क्योंकि उन्हें लगता है कि कोई और उनकी नहीं सुन रहा. हिंसा किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं, लेकिन उस हिंसा की जड़ में बैठे ‘अनदेखेपन’ को नजरअंदाज करना और भी खतरनाक है.