खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी! दिल्ली के खान मार्केट से 75 साल पुराना रिश्ता क्या?


पाकिस्तान ने खैबर पख्तूनख्वा में 11 अक्टूबर 2026 को आपातकाल लगा दिया. इमरान खान की PTI की प्रांतीय सरकार बर्खास्त कर दी गई. सेना सड़कों पर उतर आई, लेकिन इस खबर का दिल्ली से एक गहरा रिश्ता है. वो रिश्ता है खान मार्केट. जी हां, दिल्ली का मशहूर खान मार्केट. आज वही प्रांत पाकिस्तान में सबसे बड़े राजनीतिक संकट का केंद्र बना हुआ है. यानी दिल्ली के सबसे पॉश बाजार की जड़ें उसी धरती में हैं, जहां आज आपातकाल लगा है. आखिर खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल क्यों लगा और दिल्ली के मार्केट से क्या है रिश्ता…

खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी क्यों लगी?

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने संविधान के अनुच्छेद 232 और 234 के तहत खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल और राज्यपाल शासन लागू कर दिया. इसके साथ ही इमरान खान की पार्टी PTI की प्रांतीय सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और प्रांतीय विधानसभा को भंग कर दिया गया. सेना को सिविल प्रशासन की मदद के लिए तैनात किया गया. सरकार ने इसके पीछे तीन बड़े कारण बताए:

  • आतंकवाद में भारी बढ़ोतरी: सरकार का दावा है कि पिछले ढाई साल में खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवादी घटनाओं में 196 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. कानून मंत्री अजम नजीर तरार के मुताबिक, 2021 से 2024 के बीच 2,900 आतंकी घटनाएं हुईं, जबकि अगले दो साल में यह आंकड़ा 195 प्रतिशत बढ़कर करीब 8,600 हो गया.
  • प्रांतीय सरकार पर आतंकवाद में मिलीभगत का आरोप: सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार ने आरोप लगाया कि PTI सरकार आतंकवादियों से ‘अनपवित्र गठबंधन’ कर रही थी और उसने कई जिलों में पुलिस थानों को तालिबान को सौंप दिया था. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के कार्यालय ने कहा कि प्रांतीय सरकार ‘आतंकवाद के खिलाफ जंग में जानबूझकर उदासीनता’ बरत रही थी.
  • PTI का लॉन्ग मार्च और इमरान खान की रिहाई की मांग: यह सबसे बड़ा राजनीतिक कारण था. 4 अक्टूबर 2026 से PTI ने इमरान खान की रिहाई और उन्हें मेडिकल सुविधा देने की मांग को लेकर लॉन्ग मार्च शुरू किया था. इस मार्च का नेतृत्व खुद खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी कर रहे थे, जो इस्लामाबाद की ओर बढ़ रहा था. सरकार ने इसे रोकने के लिए यह कदम उठाया.

29 सितंबर 2026: जब संकेत मिल गया था

कानून मंत्री अजम नजीर तरार ने 29 सितंबर 2026 को ही संकेत दे दिया था कि अगर संविधान अनुमति देता है, तो राज्यपाल शासन या आपातकाल लगाया जा सकता है. यानी यह फैसला अचानक नहीं था, बल्कि पहले से तैयारी थी.

इस्लामाबाद स्थित थिंक-टैंक सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज (CRSS) के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 के पहले नौ महीनों में खैबर पख्तूनख्वा में नागरिक और सुरक्षाकर्मियों की मौत 485 थी, जो 2025 की इसी अवधि से 16 प्रतिशत कम है. पूरे पाकिस्तान में यह संख्या 9 प्रतिशत बढ़ी. यानी सरकार जिस ‘बढ़ते आतंकवाद’ का हवाला दे रही है, वह आंकड़ों में उतना साफ नहीं दिखता.

लेकिन इसका दिल्ली के खान मार्केट से क्या रिश्ता?

यह रिश्ता 1947 के बंटवारे से जुड़ा है और यह सिर्फ नाम का नहीं, दिल का है. दिल्ली का खान मार्केट खान अब्दुल जब्बार खान के नाम पर है, जिन्हें ‘डॉ. खान साहिब’ कहा जाता था.

खान पेशावर के पास चरसद्दा जिले के उत्मानजई गांव में 1883 में पैदा हुए थे. वे उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) के मुख्यमंत्री थे. यही NWFP बाद में खैबर पख्तूनख्वा बना. वे पश्तून स्वतंत्रता सेनानी खान अब्दुल गफ्फार खान (फ्रंटियर गांधी) के बड़े भाई थे.

1951 में भारत सरकार के पुनर्वास मंत्रालय ने दिल्ली में एक बाजार बसाया, जिसका मकसद बंटवारे के NWFP शरणार्थियों को रोजगार देना था. यह बाजार डॉ. खान साहिब के नाम पर ‘खान मार्केट’ कहलाया, क्योंकि उन्होंने बंटवारे के वक्त कई शरणार्थियों को सुरक्षित निकलने में मदद की थी. शुरुआत में यहां 154 दुकानें और 74 फ्लैट थे.

अब जिस खैबर पख्तूनख्वा में आज इमरजेंसी लगी है, वही प्रांत (तब NWFP) खान मार्केट के शरणार्थियों की जन्मभूमि थी. दिल्ली का सबसे महंगा बाजार उसी प्रांत के लोगों ने बसाया था, जो अब पाकिस्तान में सबसे बड़े राजनीतिक संकट का केंद्र बना हुआ है.

क्या खान मार्केट का नाम बदलने की बात होती है?

नहीं. इसकी वजह भी यही इतिहास है. भले ही खान मार्केट को लेकर राजनीतिक बयानबाजी होती रहती है, लेकिन इसके नाम पर सवाल नहीं उठता क्योंकि यह नाम उस शख्स से जुड़ा है जिसने बंटवारे के वक्त हजारों लोगों की जान बचाई थी. यही वजह है कि आज भी खान मार्केट और गफ्फार मार्केट का नाम बदलने की बात नहीं होती.

PTI सरकार पर नए सवाल उठे

इमरान खान की पार्टी PTI ने इस कदम को ‘राजनीतिक तख्तापलट’ करार दिया है. पार्टी अध्यक्ष गोहर अली खान ने इसे ‘बेहद खतरनाक और गंभीर राजनीतिक गलती’ और ‘अलोकतांत्रिक कदम’ बताया. बर्खास्त मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी ने इसे ‘अवैध’ कहा और स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकार ने आतंकवाद के मुद्दे पर पूरी प्रांतीय सरकार को हटाने की जगह सिर्फ अनुच्छेद 232 के तहत सीमित आपातकाल लगाकर काम चला सकता था.

एक तरफ सरकार का दावा है कि खैबर पख्तूनख्वा के लोगों ने इस फैसले का ‘स्वागत’ किया है, तो दूसरी तरफ पेशावर में प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यह ‘पश्तून लोगों का जनादेश चोरी करने’ जैसा है. सच्चाई शायद दोनों के बीच कहीं है, लेकिन एक बात साफ है कि इमरान खान की पार्टी का आखिरी प्रांतीय गढ़ अब सरकार के सीधे कंट्रोल में आ गया है. यह लड़ाई अब अदालतों तक पहुंच सकती है.