माता पिता भगवान नहीं हैं, CEO की वायरल पोस्ट पर क्यों मचा हंगामा?

माता पिता भगवान नहीं हैं, CEO की वायरल पोस्ट पर क्यों मचा हंगामा?


भारत में बचपन से ही बच्चों को सिखाया जाता है कि मां-बाप भगवान के समान होते हैं और उनका सम्मान भी ईश्वर की तरह ही करना चाहिए. हालांकि, अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक पोस्ट ने इसी सोच के एक हिस्से पर सवाल खड़ा कर दिया है. इस पोस्ट में पैरेंट्स और बच्चों के रिश्ते को एक अलग नजरिए से समझाने की कोशिश की गई है.

इसमें कहा गया कि बच्चा पैदा करना माता-पिता का फैसला होता है, इसलिए सिर्फ इस वजह से बच्चे पर जिंदगीभर बिना सवाल किए हर बात मानने की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती. पोस्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों के बीच इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि माता-पिता का सम्मान और उनकी हर बात को सही मानना, क्या दोनों एक ही चीज हैं?

‘मां-बाप भगवान का रूप होते हैं’ वाली सोच पर सवाल

पोस्ट की शुरुआत ही एक ऐसी बात से होती है, जिस पर शायद कई लोग तुरंत असहमत हो जाएं. इसमें कहा गया है कि माता-पिता को सम्मान देना अलग बात है, लेकिन उन्हें भगवान का दर्जा देना जरूरी नहीं है. माता-पिता भी आखिर इंसान ही होते हैं और उनसे भी गलतियां हो सकती हैं. उनके पास अनुभव हो सकता है, उन्होंने बच्चों के लिए बहुत कुछ किया हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनकी हर सोच या हर फैसला हमेशा सही ही होगा. पोस्ट का यही हिस्सा सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा में है.

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सिर्फ पिता बन जाने से इंसान नहीं बदल जाता

पोस्ट में एक दोस्त का उदाहरण देकर इस बात को समझाया गया है. इसमें कहा गया कि अगर कोई व्यक्ति पिता बनने से पहले अपनी गलतियों, बुरी आदतों या गलत फैसलों के लिए जाना जाता था, तो बच्चे के जन्म के बाद अचानक उसके अंदर सारी कमियां खत्म नहीं हो जातीं. पिता बनना एक बड़ी जिम्मेदारी जरूर है, लेकिन इससे किसी की समझदारी या सोच अपने आप नहीं बदल जाती. पोस्ट का सवाल यही है कि आखिर बच्चे के जन्म के साथ माता-पिता को ऐसा कौन सा प्रमाणपत्र मिल जाता है, जिससे उनकी हर बात सही मानी जाए?

लोगों ने कहा- सम्मान जरूरी है, लेकिन…

इस पोस्ट के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग राय देखने को मिल रही है. कुछ लोग इसके विचार से सहमत नजर आए और कहा कि माता-पिता का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन बच्चों को अपनी जिंदगी के फैसले लेने की आजादी भी मिलनी चाहिए. वहीं कुछ लोगों ने कहा कि भारतीय परिवारों में माता-पिता ने बच्चों के लिए बहुत त्याग किया है, इसलिए उनके योगदान को इस तरह कम करके नहीं देखा जाना चाहिए. यानी पोस्ट ने एक सीधा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि सम्मान और बिना सवाल किए आज्ञा मानने में आखिर फर्क कितना है?

‘तुम्हारे लिए इतना किया’पर भी उठाया सवाल

पोस्ट में उस आम तर्क पर भी बात की गई है जिसमें बच्चों से कहा जाता है कि अगर माता-पिता ने उन्हें जन्म नहीं दिया होता तो वे आज इस दुनिया में ही नहीं होते. पोस्ट के मुताबिक, बच्चे ने पैदा होने का फैसला खुद नहीं लिया था. बच्चे को दुनिया में लाना माता-पिता का फैसला था, इसलिए सिर्फ जन्म देने के बदले बच्चे से जिंदगीभर की आज्ञाकारिता की उम्मीद करना सही नहीं माना जा सकता. हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं कि माता-पिता की मेहनत या उनके प्यार की कोई कीमत नहीं है. मुद्दा यह है कि रिश्ते में प्यार और सम्मान हो, लेकिन उसे हमेशा एहसान की तरह इस्तेमाल न किया जाए.

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