जर्मनी के चुनावी नतीजों से हिली यूरोप की पुरानी सत्ता, US और रूस के लिए क्या हैं मायने?


जर्मनी की राजनीति में दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद विचारधारा में बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसने नाजी दौर की याद दिला दी. जर्मनी के पूर्वी राज्य सैक्सनी-अनहाल्ट (Saxony-Anhalt) में दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है. यह दूसरे विश्व युद्ध और नाजी सरकार के अंत के बाद पहली बार है जब किसी धुर दक्षिणपंथी पार्टी ने जर्मनी के किसी राज्य चुनाव में इतनी बड़ी जीत हासिल की है. चुनाव के शुरुआती नतीजों के अनुसार, AfD को 43.8 फीसदी वोट मिले हैं, जो पिछले चुनावों के मुकाबले दोगुने से भी अधिक हैं.

इस जीत ने जर्मनी और पूरे यूरोप में चिंता पैदा कर दी है, क्योंकि इससे पहले 90 से अधिक सालों में किसी भी दक्षिणपंथी पार्टी को इस तरह की बढ़त नहीं मिली थी. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, AfD की इस सफलता के पीछे आम जनता में बढ़ता असंतोष है. इमिग्रेशन को लेकर लोगों की नाराजगी, आर्थिक संकट, मुख्यधारा की पुरानी पार्टियों से मोहभंग और यूक्रेन युद्ध में जर्मनी द्वारा की जा रही भारी आर्थिक मदद का विरोध इसके मुख्य कारण हैं.

जर्मनी चांसलर मर्ज की बढ़ी टेंशन

इसी बात ने जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की चिंता बढ़ा दी है. चुनाव परिणाम के बाद मर्ज ने स्वीकार किया कि यह उनकी पार्टी की दशकों में सबसे गंभीर चुनावी हार में से एक है. उन्होंने कहा कि नतीजे ने उन्हें और उनकी पार्टी को गहराई से झकझोर दिया है और सरकार अब इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती.मर्ज के सामने सबसे सीधा सवाल उनकी राजनीतिक जिम्मेदारी को लेकर था. उनसे पूछा गया कि आखिर वह किस बिंदु पर यह स्वीकार करेंगे कि उनकी राजनीतिक रणनीति विफल हो रही है और वह चांसलर के रूप में आगे सेवा करने की स्थिति में नहीं हैं. चांसलर ने हालांकि पद छोड़ने की किसी संभावना के संकेत नहीं दिए.

उन्होंने कहा कि वह इस बात पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं कि देश को फिर से साझा राजनीतिक सफलता के रास्ते पर कैसे लाया जाए. मर्ज ने कहा, ‘हार मानना कोई विकल्प नहीं है.’ उन्होंने कहा कि वह ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो हर दिन अपनी भावनाएं सार्वजनिक रूप से जाहिर करते रहें, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में सरकार को आत्ममंथन करना होगा. उन्होंने माना कि जनता का भरोसा दोबारा हासिल करने के लिए सरकार को अपने फैसलों और उनके पीछे की वजहों को बेहतर ढंग से समझाना होगा. उन्होंने कहा कि जर्मनी को प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने, नौकरशाही कम करने और आर्थिक विकास में बाधा डालने वाली अड़चनों को दूर करने के लिए और अधिक काम करने की जरूरत है.

यूरोप के अन्य देशों में बदलता राजनीतिक समीकरण

फ्रांस- मरीन ले पेन और जॉर्डन बार्डेला की ‘नेशनल रैली’ (RN) पार्टी तेजी से मुख्यधारा में उभर रही है. फ्रांस एक परमाणु संपन्न देश और NATO का अहम हिस्सा है. यदि वहां दक्षिणपंथी सरकार आती है, तो रक्षा नीति और यूक्रेन को दी जाने वाली सहायता पर बड़ा असर पड़ेगा.

इटली- इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की दक्षिणपंथी सरकार लंबे समय से सत्ता में है. हालांकि, मेलोनी सख्त इमिग्रेशन पॉलिसी के साथ-साथ NATO और यूक्रेन का खुलकर समर्थन करती हैं. यह इस बात का प्रमाण है कि दक्षिणपंथी होने का मतलब हर बार ‘रूस समर्थक’ होना नहीं होता.

स्पेन- स्पेन में कंजर्वेटिव पीपुल्स पार्टी (PP) बढ़त में है. हालांकि सरकार बनाने के लिए उन्हें दक्षिणपंथी पार्टी ‘वॉक्स’ का सहारा लेना पड़ सकता है.

पोलैंड- यहां भी दक्षिणपंथी ताकतें मजबूत हैं, लेकिन वे रूस को अपने अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानती हैं. यही कारण हैकि वहां का दक्षिणपंथ पूरी तरह रूस-विरोधी और यूक्रेन-समर्थक है.

रूस और पुतिन पर इसका प्रभाव

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए सबसे अच्छी स्थिति यूरोप में रूस-समर्थक सरकारों का होना नहीं, बल्कि यूरोप का आपस में बंट जाना होगा. अगर जर्मनी, फ्रांस, इटली और पोलैंड जैसे बड़े देश यूक्रेन, रूस पर प्रतिबंधों और रक्षा मामलों पर अलग-अलग राय रखने लगेंगे तो यूरोपीय यूनियन (EU) की एकजुटता कमजोर होगी. दूसरी तरफ अगर यूरोप का यह नया दक्षिणपंथ अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सैन्य खर्च बढ़ाता है तो यूरोप सैन्य रूप से रूस का मुकाबला करने में और अधिक सक्षम भी हो सकता है.

अमेरिका और ट्रंप के लिए क्या मायने?

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी आंदोलन के लिए जर्मनी का यह चुनावी रिजल्ट बहुत फायदेमंद है. यह ट्रंप के इस दावे को सही साबित करता है कि जनता अब पुरानी वैश्विक नीतियों से ऊब चुकी है और राष्ट्रीय संप्रभुता और सख्त सीमा नियंत्रण चाहती है. हालांकि, इसका एक नकारात्मक पहलू ये भी है कि अगर यूरोपीय देशों में राष्ट्रवाद के कारण आपस में मतभेद बढ़ते हैं तो अमेरिका के लिए एक एकजुट NATO के रूप में काम करना मुश्किल हो सकता है.

यूरोप में दक्षिणपंथी पार्टी का चुनाव जीतना ये दिखाता है कि राजनीति का पूरा केंद्र ही दाएं खिसक रहा है. आने वाले दिनों में यूरोप की मुख्यधारा की पार्टियां भी इमिग्रेशन और नेशनल सिक्योरिटी पर नीतियां अपनाएंगी. अब यूरोप की भावी राजनीति ‘वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ’ की न होकर इस बात पर निर्भर करेगी कि किस तरह का दक्षिणपंथ जीतता है.