AI का बढ़ता असर! क्या लाखों लोगों को करनी पड़ेगी गिग जॉब? विशेषज्ञों ने जताई बड़ी चिंता

AI का बढ़ता असर! क्या लाखों लोगों को करनी पड़ेगी गिग जॉब? विशेषज्ञों ने जताई बड़ी चिंता


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  • बदलते रोज़गार बाजार के लिए अभी से तैयारी आवश्यक है।

AI: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब केवल एक नई तकनीक नहीं रह गई है बल्कि यह लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी है. दफ्तरों में होने वाले कई सामान्य और दोहराव वाले काम अब AI की मदद से तेजी से पूरे किए जा रहे हैं. हालांकि इससे कामकाज की गति और उत्पादकता बढ़ी है लेकिन साथ ही यह भी चिंता बढ़ रही है कि आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में व्हाइट-कॉलर नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं.

इसी विषय पर चर्चा करने के लिए तकनीक, अर्थशास्त्र और सार्वजनिक नीति से जुड़े करीब 40 विशेषज्ञ हाल ही में वॉशिंगटन स्थित पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स में एकत्र हुए. बैठक में इस बात पर विचार किया गया कि वर्ष 2030 तक AI समाज और रोजगार बाजार को किस तरह बदल सकता है.

AI से तेज होगी आर्थिक वृद्धि

विशेषज्ञों ने एक काल्पनिक भविष्य परिदृश्य पेपर प्रॉस्पेरिटी का अध्ययन किया जिसमें AI के कारण अर्थव्यवस्था में तेज विकास देखने को मिलता है. इस मॉडल के अनुसार AI की वजह से कंपनियों की उत्पादकता बढ़ सकती है आर्थिक उत्पादन में उछाल आ सकता है और शेयर बाजार भी मजबूत प्रदर्शन कर सकता है.

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस विकास का फायदा समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंचेगा. रिपोर्ट के मुताबिक बेरोजगारी में बहुत बड़ी बढ़ोतरी नहीं होगी लेकिन अंडरएम्प्लॉयमेंट यानी योग्यता के अनुरूप नौकरी न मिलने की समस्या गंभीर रूप ले सकती है. विशेष रूप से कॉलेज शिक्षित युवाओं को अपनी पढ़ाई और कौशल के मुताबिक रोजगार पाने में कठिनाई हो सकती है.

गिग जॉब और पार्ट-टाइम काम की ओर बढ़ सकते हैं लोग

चर्चा के दौरान यह संभावना जताई गई कि AI के कारण कार्यस्थलों में होने वाले बदलाव कई लोगों को मजबूरी में गिग वर्क, फ्रीलांसिंग या कम वेतन वाली नौकरियों की ओर धकेल सकते हैं. ऐसे कर्मचारी, जो पहले स्थायी और बेहतर वेतन वाली नौकरियों में थे, उन्हें अस्थायी या अनुबंध आधारित काम अपनाना पड़ सकता है.

विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव केवल रोजगार के स्वरूप को नहीं बदलेगा बल्कि लोगों की आर्थिक सुरक्षा पर भी असर डाल सकता है.

सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं

बैठक में शामिल विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि बड़े पैमाने पर नौकरियों में बदलाव होता है तो इसका असर केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा. इससे सामाजिक असंतोष और राजनीतिक तनाव भी बढ़ सकते हैं. कई विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं के बीच भविष्य को लेकर निराशा बढ़ सकती है जिसका प्रभाव परिवार नियोजन और जन्म दर जैसे सामाजिक पहलुओं पर भी पड़ सकता है.

इसके अलावा लंबे समय से चली आ रही यह धारणा भी कमजोर पड़ सकती है कि अच्छी शिक्षा सीधे स्थिर नौकरी और आर्थिक सुरक्षा की गारंटी देती है. यदि AI बड़ी संख्या में व्हाइट-कॉलर भूमिकाओं को संभालने लगे तो शिक्षा और रोजगार के पारंपरिक संबंध में बदलाव आ सकता है.

कुछ क्षेत्रों में बढ़ेगी मांग

विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि शुरुआती दौर में प्लंबिंग, नर्सिंग, वेल्डिंग और अन्य तकनीकी कौशल वाले पेशों की मांग बढ़ सकती है. AI इन कार्यों को तुरंत पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर पाएगा इसलिए इन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ने की संभावना है.

लेकिन यदि अन्य क्षेत्रों से बड़ी संख्या में कर्मचारी इन पेशों की ओर रुख करते हैं तो समय के साथ प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है और वेतन पर दबाव बन सकता है.

अभी से तैयारी की जरूरत

चर्चा का निष्कर्ष यह रहा कि AI एक तरफ आर्थिक विकास और उत्पादकता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है वहीं दूसरी ओर यह रोजगार और सामाजिक ढांचे के सामने बड़ी चुनौतियां भी खड़ी कर सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारों, कंपनियों और नीति निर्माताओं को अभी से ऐसे कदम उठाने चाहिए, जो कर्मचारियों को बदलते जॉब मार्केट के लिए तैयार कर सकें.

उनका कहना है कि यदि समय रहते सही नीतियां नहीं बनाई गईं तो AI से होने वाले लाभ कुछ लोगों तक सीमित रह सकते हैं जबकि बड़ी आबादी को रोजगार और आय से जुड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है.

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