कनाडा को हम हमेशा एक शांत और मिलनसार देश के रूप में जानते हैं. लेकिन पिछले कुछ समय से इस देश के एक सबसे अमीर राज्य में बगावत की चिंगारी भड़की हुई है, जिसका नाम है अल्बर्टा. यहां के करीब 3 लाख लोगों ने एक ऐसी अर्जी पर दस्तखत कर दिए हैं जिसमें कनाडा से आजादी की मांग की गई है. आखिर ये लोग आजाद देश क्यों बनाना चाहते हैं? क्या सचमुच अल्बर्टा एक नया मुल्क बन पाएगा?
सवाल 1: क्या अल्बर्टा कनाडा छोड़कर अलग देश बनने जा रहा है?
जवाब: कनाडा के पश्चिमी प्रांत अल्बर्टा में दशकों से चले आ रहे राजनीतिक और आर्थिक बहस ने सबसे बड़ा विस्फोट किया है. अलगाववादी समूह ‘स्टे फ्री अल्बर्टा’ ने औपचारिक रूप से अल्बर्टा के चुनाव आयोग को आजादी पर जनमत संग्रह कराने की मांग वाली एक याचिका सौंपी है. इस याचिका पर 3 लाख से ज्यादा लोगों के हस्ताक्षर हो चुके हैं. हस्ताक्षरों का सत्यापन बाकी है और रास्ते में कई कानूनी और राजनीतिक बाधाएं हैं. लेकिन इतने बड़े पैमाने पर समर्थन जुटाना इस बात की ओर इशारा है कि प्रांत के एक बड़े हिस्से में कनाडा के लिए गहरी नाराजगी है.
सवाल 2: अल्बर्टा के लोग कनाडा से अलग क्यों होना चाहते हैं?
जवाब: अल्बर्टा के अलगाववादी आंदोलन के पीछे तीन बड़ी वजहें हैं:
- इक्वलाइजेशन पेमेंट का मुद्दा: अल्बर्टा कनाडा का सबसे अमीर प्रांत है और देश के तेल और गैस उत्पादन का केंद्र है. अल्बर्टावासियों का मानना है कि वे संघीय सरकार को जितना पैसा देते हैं, उसका उचित हिस्सा उन्हें वापस नहीं मिलता. 2023-24 में कनाडा का इक्वलाइजेशन प्रोग्राम 23 बिलियन डॉलर से ज्यादा का था, जिसमें से अल्बर्टा को एक पैसा भी नहीं मिला. अनुमान है कि 2023 में अल्बर्टा ने इस कार्यक्रम में लगभग 3.3 बिलियन डॉलर का योगदान दिया. 1981 से 2023 के बीच अल्बर्टा के श्रमिकों ने रोजगार बीमा (EI) प्रोग्राम में जितना योगदान दिया, उससे 23.9 बिलियन डॉलर ज्यादा राशि अन्य प्रांतों को चली गई. कुल मिलाकर, अल्बर्टा ने संघीय खजाने में लगभग 244 बिलियन डॉलर से ज्यादा जमा कराए हैं, जो किसी भी प्रांत का किया गया सबसे बड़ा योगदान है.
- राजनीतिक उपेक्षा और वैचारिक टकराव: अल्बर्टा का अधिकांश हिस्सा रूढ़िवादी विचारधारा वाला है, जबकि कनाडा की संघीय सरकार पिछले एक दशक से उदारवादी पार्टी के नेतृत्व में है. अलगाववादी नेताओं का कहना है कि लिबरल सरकार जानबूझकर ऐसी नीतियां बना रही है जो अल्बर्टा के तेल उद्योग को नुकसान पहुंचाती हैं. ‘स्टे फ्री अल्बर्टा’ के प्रमुख मिच सिल्वेस्ट्रे का कहना है, ‘हम बाकी कनाडा की तरह नहीं हैं. हम 100 प्रतिशत रूढ़िवादी हैं. हम पर ऐसे लिबरल शासन कर रहे हैं जो हमारी तरह नहीं सोचते और हमारे उद्योग को बंद करने की कोशिश कर रहे हैं.’
- संसाधनों पर कंट्रोल और पर्यावरण नीतियों पर टकराव: ओटावा (संघीय सरकार) और अल्बर्टा के बीच जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण नियमों को लेकर लगातार तनातनी रहती है. अल्बर्टा का मानना है कि संघीय सरकार उसके ऊर्जा क्षेत्र पर अनावश्यक प्रतिबंध लगा रही है, जिससे प्रांत की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है. इसी परेशानी को दूर करने के लिए प्रांत की प्रीमियर डेनिएल स्मिथ अपनी सरकार के ‘अल्बर्टा विदिन ए यूनाइटेड कनाडा एक्ट’ के तहत संघीय कानूनों को चुनौती दे चुकी हैं.
सवाल 3: क्या जनता का बहुमत अलग देश बनाने के पक्ष में है?
जवाब: फिलहाल जनमत सर्वेक्षणों में अलगाव के समर्थक अल्पमत में हैं. हालांकि, यह अल्पमत लगातार बढ़ रहा है और ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गया है. अभी लगभग 25% से 30% अल्बर्टावासी ही कनाडा से आजादी के पक्ष में हैं. CBC न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, अलगाव के लिए समर्थन स्थिर बना हुआ है और बहुत कम लोगों ने अपना पक्ष बदला है.
एंगस रीड इंस्टीट्यूट के सर्वे में पाया गया कि 65% अल्बर्टावासी कनाडा में बने रहने के पक्ष में मतदान करेंगे. हालांकि, अलगाववादियों का मानना है कि एक बार आधिकारिक चुनाव प्रचार शुरू होने पर यह समर्थन बढ़ सकता है.
सवाल 4: आगे की कानूनी और राजनीतिक प्रक्रिया क्या है?
जवाब: यह मामला अब एक जटिल कानूनी और राजनीतिक मुद्दा बन चुका है, जिसमें 3 बड़ी बाधाएं हैं:
- हस्ताक्षरों का सत्यापन और अदालती रोक: याचिका मिलने के बाद अल्बर्टा चुनाव आयोग सभी 3 लाख हस्ताक्षरों का सत्यापन करेगा. लेकिन फिलहाल, यह सत्यापन प्रक्रिया एक अदालती आदेश की वजह से रुकी हुई है. अथाबास्का चिपेवियन फर्स्ट नेशन और ब्लैकफुट कॉन्फेडेरसी सहित कई आदिवासी समूहों ने याचिका के खिलाफ कानूनी चुनौती दी है. उनका तर्क है कि अलगाव उन संधिगत अधिकारों का उल्लंघन करेगा जो कनाडा के संविधान के तहत संरक्षित हैं.
- रेफरेंडम कराने की अनुमति: अगर कानूनी अड़चनें दूर होती हैं और हस्ताक्षर सत्यापित हो जाते हैं, तब भी यह तय नहीं है कि रेफरेंडम होगा या नहीं. प्रांत की प्रीमियर डेनिएल स्मिथ ने कहा है कि वे जनमत संग्रह कराने पर विचार कर सकती हैं, लेकिन उनकी सरकार स्वयं इसे मतपत्र पर नहीं रखेगी. अगर सब कुछ ठीक रहा, तो 19 अक्टूबर 2026 को होने वाले प्रांत-व्यापी जनमत संग्रह के साथ ही अलगाव पर भी मतदान कराया जा सकता है, क्योंकि इसी दिन पहले से ही आव्रजन और संवैधानिक मुद्दों पर मतदान की योजना है.
- संघीय कानून (क्लैरिटी एक्ट): भले ही अल्बर्टा में रेफरेंडम पास हो जाए, अलगाव स्वचालित नहीं होगा. कनाडा के संघीय ‘क्लैरिटी एक्ट’ के मुताबिक, किसी प्रांत को अलग होने के लिए सिर्फ साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं है. सवाल साफ होना चाहिए और बहुमत ‘पर्याप्त रूप से मजबूत’ होना चाहिए. यह तय करने का अंतिम अधिकार संघीय संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) के पास है. प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी इस बात को दोहराया है कि अलगाव की कोई भी प्रक्रिया संघीय कानून के अनुसार ही होगी.
सवाल 5: अगर सब कुछ पार हो गया, तो एक नया देश कैसे बनता और बसता है?
जवाब: यह एक बेहद जटिल और अभूतपूर्व प्रक्रिया होगी, जो किसी स्विच को दबाने जितनी आसान नहीं है. एक नए देश के गठन के लिए 4 कदम उठाने होंगे:
1. आधिकारिक बातचीत की शुरुआत: एक सफल रेफरेंडम के बाद, अल्बर्टा सरकार और कनाडा की संघीय सरकार के बीच अलगाव की शर्तों पर औपचारिक बातचीत शुरू होगी. यह एक संवैधानिक संशोधन के समान होगा, जिसके लिए सभी प्रांतों की सहमति की जरूरत पड़ सकती है.
2. संपत्तियों और देनदारियों का बंटवारा: यह सबसे पेचीदा हिस्सा होगा. इसमें:
- राष्ट्रीय ऋण में हिस्सा- कनाडा के कुल राष्ट्रीय ऋण का एक बड़ा हिस्सा अल्बर्टा को अपने ऊपर लेना होगा.
- सरकारी संपत्तियां- संघीय सरकार की जमीनें, इमारतें, वाहन और उपकरण.
- सीमाएं- अल्बर्टा की वर्तमान प्रांतीय सीमाएं ही नए देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं बनेंगी, लेकिन विवादित क्षेत्रों पर बातचीत हो सकती है.
- प्राकृतिक संसाधन- तेल, गैस और खनिज भंडारों का स्वामित्व, जो अभी तक संघीय क्षेत्राधिकार में हैं. अल्बर्टा को ट्रांसफर करना होगा.
3. एक नए राष्ट्र का निर्माण: अलगाव के बाद, अल्बर्टा को एक नया संविधान लिखना होगा, अपनी नागरिकता नीति तय करनी होगी, एक केंद्रीय बैंक स्थापित करना होगा और अपनी मुद्रा जारी करनी होगी. उसे अपनी सेना खड़ी करनी होगी और अंतरराष्ट्रीय संधियों में सदस्यता के लिए आवेदन करना होगा.
4. व्यापार और संबंधों का पुनर्गठन: नए देश को कनाडा, अमेरिका और बाकी दुनिया के साथ नए व्यापार समझौते करने होंगे. यह एक लंबी और उलझी हुई प्रक्रिया होगी, क्योंकि मौजूदा सभी समझौतों पर फिर से बातचीत करनी होगी. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया को पूरा होने में एक दशक से भी ज्यादा समय लग सकता है.





