- अधिकांश रिमोट, कीबोर्ड की बैटरी रिचार्जेबल नहीं होतीं, ये कचरा बन जाती हैं।
- नॉन-रिचार्जेबल AA/AAA बैटरी में अपरिवर्तनीय रासायनिक प्रतिक्रिया होती है।
- लिथियम-आयन, निकल-मेटल हाइड्राइड जैसी बैटरी रिवर्स रिएक्शन से रिचार्ज होती हैं।
- प्राइमरी सेल के कंपोनेंट्स इस्तेमाल होने पर बदल जाते हैं, इसलिए चार्ज नहीं होते।
Battery Recharge Problem: फोन में Low Battery का पॉप-अप आते ही हमारा ध्यान चार्जर की तरफ जाता है. कुछ देर तक फोन को चार्जिंग पर लगाए रखने पर बैटरी 100 प्रतिशत चार्ज हो जाती है. इससे न तो बैटरी बदलने का झंझट रहता है और न ही यह टेंशन कि डिस्चार्ज होने पर नई बैटरी लेनी पड़ेगी. फोन में जब ऐसा हो सकता है तो रिमोट की बैटरी के साथ ऐसा क्यों नहीं होता. रिमोट, कीबोर्ड और माउस आदि की बैटरी डिस्चार्ज होने पर रिचार्ज क्यों नहीं की जा सकती और क्यों ये हर बार कचरे का हिस्सा बन जाती है. आज हम इसी सवाल का जवाब जानने की कोशिश करेंगे कि सारी बैटरियां रिचार्जेबल क्यों नहीं होतीं.
सारी बैटरियां रिचार्जेबल क्यों नहीं होतीं?
इस सवाल का जवाब साइंस में छिपा है. दरअसल, कोई बैटरी रिचार्जेबल होगी या नहीं, इसका राज इसमें छिपा है कि वह किससे बनी हुई है और पावर कैसे डिलीवर करती है. अगर नॉन-रिचार्जेबल वाली कॉमन AA और AAA बैटरी (सामान्य रिमोट और घड़ी वाली) की बात करें तो ये एल्कलाइन होती है. इनमें जिंक मेटल और मैंग्नीज डायऑक्साइड इलेक्ट्रोड्स होते हैं. जब एल्कलाइन बैटरी डिस्चार्ज होती है तो इर्रिवर्सेबल केमिकल रिएक्शन होती है, जो जिंक मेटल को जिंक ऑक्साइज में बदल देती है. इसके बाद बैटरी में चाहे जितने मर्जी इलेक्ट्रॉन्स भर दिए जाएं, ये जिंक ऑक्साइड को दोबारा मेटल फॉर्म में नहीं बदल सकते. इसी तरह मैंग्नीज डायऑक्साइड बदल जाती है.
रिचार्जेबल बैटरियां कैसे बनी होती हैं?
कॉमन बैटरी के उलट लिथियम आयन और निकल-मेटल हाइड्राइड जैसी रिचार्जेबल बैटरियां रिवर्स इंटरकेलेशन रिएक्शन करती हैं. ये दोनों ही बैटरियां आयन को डैमेज किए बिना उसे शफल करती है, जिससे इन्हें बार-बार यूज किया जा सकता है. इस तरह की बैटरी को सेकेंडरी सेल भी कहा जाता है. इनमें हीट और सील भी लगी होती हैं, जो इन्हें हीट या चार्जिंग के समय जनरेट होने वाली गैस से डैमेज होने से बचाती है.
आसान भाषा में समझें कारण
अगर AA और AAA जैसे प्राइमरी सेल की बात करें तो इनमें ऐसे कंपोनेंट लगे होते हैं, जो बैटरी के डिस्चार्ज होने पर पूरी तरह बदल या यूज हो जाते हैं. इस कारण इन्हें फिर से रिचार्ज नहीं किया जा सकता. दूसरी तरफ सेकेंडरी सेल में ऐसी स्ट्रक्चर होती है, जो बैटरी के यूज होने पर चेंज नहीं होती. इस कारण इन्हें बार-बार आसानी से चार्ज किया जा सकता है.
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