क्या है चिकन 65, कैसे बनता है और कहां से मिला इसे यह नाम?

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History of Chicken 65: भारत में आपको खाने के लिए कई ऐसे डिश मिलते हैं, जिनको देखकर आपके मुंह से पानी निकल जाता है. उन्हीं में से एक है Chicken 65. मसालेदार, कुरकुरी और सुगंध से भरपूर बेहद स्वादिष्ट और यूनिक चिकन रेसिपी अब सिर्फ इंडिया तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे देश और विदेश में पसंद की जाती है. इसके बारे में लोगों की जानने की इच्छा होती है कि आखिर यह इतना यूनिक क्यों है और इसका नाम कैसे पड़ा. चलिए आपको इसकी कहानी बताते हैं कि आखिर इसका नाम कैसे पड़ा और इसको कैसे बनाया जाता है.

कैसे पड़ा उसका नाम?

अब आते हैं कि इसका नाम कैसे पड़ा. इसके पीछे भी एक कहानी है. दरअसल इस डिश की शुरुआत चेन्नई से हुई थी. 1965 में वहां के एक मशहूर होटल Buhari ने इसे पहली बार मेनू पर रखा था. तब से लेकर आज तक इस डिश का नाम ही नहीं बल्कि स्वाद भी चर्चा का विषय रहा है. इसलिए यह नाम पड़ा. दूसरी थ्योरी कहती है कि होटल के मेनू में यह डिश 65 नंबर पर थी, इसलिए इसे Chicken 65 कहा जाने लगा. कुछ लोग यह भी मानते हैं कि इसमें 65 तरह के मसाले या 65 मिर्चें डाली जाती थीं, हालांकि यह दावा सही नहीं माना जाता. समय के साथ इस डिश के कई वर्ज़न सामने आए. आज आप रेस्टोरेंट्स में बोनलेस Chicken 65, ग्रेवी वाला Chicken 65 और यहां तक कि पनीर 65 या गोभी 65 भी पाएंगे. यानी चिकन न खाने वालों के लिए भी इसका शाकाहारी विकल्प मौजूद है.

कैसे बनाया जाता है इसे?

इसको बनाने का तरीका भी काफी खास है. इसमें चिकन को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर दही और मसालों में मैरिनेट किया जाता है. इसमें अदरक-लहसुन पेस्ट, लाल मिर्च पाउडर, हल्दी, जीरा, काली मिर्च जैसे मसाले डाले जाते हैं. कुछ लोग इसमें कॉर्नफ्लोर या चावल का आटा भी मिलाते हैं ताकि चिकन फ्राई करने के बाद और ज्यादा कुरकुरा हो जाए. इसके बाद गरम तेल में इन टुकड़ों को डीप फ्राई किया जाता है. जब चिकन सुनहरे रंग का और बाहर से कुरकुरा हो जाए, तो इसमें करी पत्ते, हरी मिर्च और कभी-कभी नींबू का रस डालकर तड़का लगाया जाता है. यही तड़का Chicken 65 को और भी खास बना देता है. खाने वालों के लिए इसका सबसे बड़ा कारण है इसका स्वाद और टेक्सचर. बाहर से कुरकुरी और अंदर से नरम चिकन की बाइट, मसालों की तीखी खुशबू और ऊपर से नींबू की खटास सब मिलकर इसे किसी भी पार्टी या मौके का स्टार बना देते हैं.

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इन क्रिकेटरों ने राजनीति के मैदान पर खेली दमदार पारी, मोहम्मद अजहरुद्दीन ने जड़ा ‘पॉलिटिकल सिक्सर’

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भारत के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन 2009 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर मुरादाबाद से लोकसभा का चुनाव जीतकर सांसद बने थे. वहीं अजहरुद्दीन को 31 अक्टूबर 2025 को तेलंगाना कैबिनेट में मंत्री के रूप में शामिल किया जाएगा, जो उनके राजनीतिक करियर में एक खास उपलब्धि है.

भारत के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन 2009 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर मुरादाबाद से लोकसभा का चुनाव जीतकर सांसद बने थे. वहीं अजहरुद्दीन को 31 अक्टूबर 2025 को तेलंगाना कैबिनेट में मंत्री के रूप में शामिल किया जाएगा, जो उनके राजनीतिक करियर में एक खास उपलब्धि है.

पूर्व क्रिकेटर और कमेंटेटर नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा के टिकट पर 2004 में अमृतसर से लोकसभा चुनाव जीते थे. बाद में सिद्धू कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और पंजाब सरकार में मंत्री भी रहे हैं. वह आम आदमी पार्टी में भी रहे हैं.

पूर्व क्रिकेटर और कमेंटेटर नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा के टिकट पर 2004 में अमृतसर से लोकसभा चुनाव जीते थे. बाद में सिद्धू कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और पंजाब सरकार में मंत्री भी रहे हैं. वह आम आदमी पार्टी में भी रहे हैं.

भारतीय टीम के हेड कोच गौतम गंभीर 2019 में भाजपा में शामिल हुए और पूर्वी दिल्ली से लोकसभा सांसद बने थे. लेकिन 2024 में उन्होंने क्रिकेट पर ज्यादा ध्यान देने के लिए राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी थी.

भारतीय टीम के हेड कोच गौतम गंभीर 2019 में भाजपा में शामिल हुए और पूर्वी दिल्ली से लोकसभा सांसद बने थे. लेकिन 2024 में उन्होंने क्रिकेट पर ज्यादा ध्यान देने के लिए राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी थी.

1983 विश्व कप विजेता टीम के सदस्य कीर्ति आजाद पहले भाजपा से सांसद थे. लेकिन बाद में आजाद तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और अभी कीर्ति पश्चिम बंगाल के वर्धमान-दुर्गापुर लोकसभा के सांसद हैं.

1983 विश्व कप विजेता टीम के सदस्य कीर्ति आजाद पहले भाजपा से सांसद थे. लेकिन बाद में आजाद तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और अभी कीर्ति पश्चिम बंगाल के वर्धमान-दुर्गापुर लोकसभा के सांसद हैं.

पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान 2024 लोकसभा चुनाव में टीएमसी के टिकट पर पश्चिम बंगाल की बरहामपुर सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा सांसद हैं.

पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान 2024 लोकसभा चुनाव में टीएमसी के टिकट पर पश्चिम बंगाल की बरहामपुर सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा सांसद हैं.

भारत के पूर्व ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह अभी पंजाब से राज्यसभा सदस्य हैं. हरभजन आम आदमी पार्टी से 2022 में राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुने गए थे.

भारत के पूर्व ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह अभी पंजाब से राज्यसभा सदस्य हैं. हरभजन आम आदमी पार्टी से 2022 में राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुने गए थे.

Published at : 30 Oct 2025 07:20 PM (IST)

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कनाडाकनाडा में भारतीय मूल के बिजनेसमैन की हत्या, कार पर पेशाब करने से रोका तो ले ली जान

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कनाडा के एडमॉन्टन शहर में एक भारतीय मूल के बिजनेसमैन की हत्या कर दी गई. आरवी सिंह सागू (55 साल) का नाम शख्स अपनी गर्लफ्रेंड के साथ डिनर करने गया था. जब वह लौटा तो एक अजनबी उसके कार पर पेशाब कर रहा था. भारतीय शख्स ने जब उसे रोका तो उसने हमला कर दिया. आरोपी की पहचान काइल पापिन के रूप में हुई है और उसे स्थानीय पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है.

कार पर पेशाब करने से रोका तो कर दी हत्या

आरवी सिंह सागू ने उस अजनबी की हरकत पर उसे टोकते हुए कहा, “अरे तुम क्या कर रहे हो?” जिस पर उस आदमी ने जवाब दिया, “मेरा जो मन वो करूंगा.” फिर वह सागू के पास गया और उसके सिर पर मुक्का मार दिया, जिससे वह जमीन पर गिर गया. ग्लोबल न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक सागू के भाई ने बताया कि इस हमले के बाद उसकी गर्लफ्रेंड ने पुलिस को फोन किया. बाद में फिर उसे अस्पताल लाया गया और लाइफ सपोर्ट पर रखा गया. हालांकि 5 दिन बाद उसकी मौत हो गई.

आरोपी को कोर्ट में किया जाएगा पेश

यह घटना 19 अक्टूबर 2025 की है. पुलिस ने स्पष्ट किया कि पीड़ित और आरोपी के बीच पहले से एक-दूसरे को नहीं जानते थे. आरोपी को 4 नवंबर को कोर्ट में पेश किया जाएगा. इस घटना से कनाडा में भारतीय समुदाय में गुस्सा है, जहां नस्लभेद से प्रेरित हमलों की बढ़ती संख्या को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं.

कनाडा में बढ़ रहे दक्षिण एशियाई मूल के लोगों पर हमले

कनाडा में भारतीय और दक्षिण एशियाई मूल के लोगों के प्रति बढ़ती नफरत चिंता का विषय बना हुआ है. चरमपंथ को लेकर स्टडी करने वाले ब्रिटेन स्थित स्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक डायलॉग (आईएसडी) की एक नई रिपोर्ट में पाया गया है कि कनाडा में दक्षिण एशियाई समुदायों के खिलाफ अपराधों में 2019 और 2023 के बीच 227 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. आईएसडी ने कहा कि ये घटनाएं ऑनलाइन भी हो रही है.

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देश में घट गई सोने की मांग, पिछले 3 महीने में 16% की आई जबरदस्त कमी, जानें क्या है वजह

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Gold In India: देश में इस साल जुलाई-सितंबर तिमाही के दौरान सोने की मांग में जबरदस्त गिरावट देखी गई. विश्व स्वर्ण परिषद (WGC) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, मात्रा के हिसाब से सोने की कुल मांग 16 प्रतिशत घटकर 209.4 टन रह गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 248.3 टन थी. यह कमी मुख्य रूप से सोने की ऊंची कीमतों के कारण उपभोक्ताओं की खरीदारी घटने से आई.

हालांकि, मूल्य के हिसाब से मांग 1,65,380 करोड़ रुपये से बढ़कर 2,03,240 करोड़ रुपये हो गई, यानी 23 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इसका सीधा अर्थ यह है कि भले ही लोगों ने कम मात्रा में सोना खरीदा, लेकिन ऊंची कीमतों के कारण कुल खर्च बढ़ गया.

क्यों घटी सोने की मांग?

सोने के आभूषणों की मांग में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई. यह पिछले साल की 171.6 टन से घटकर इस तिमाही में केवल 117.7 टन रह गई, यानी करीब 31 प्रतिशत की गिरावट. हालांकि, आभूषणों की खरीद का कुल मूल्य लगभग 1,14,270 करोड़ रुपये पर स्थिर रहा, क्योंकि खरीदारों ने बढ़ी हुई कीमतों के अनुसार अपने बजट को समायोजित किया.

दूसरी ओर, निवेश के रूप में सोने की मांग में जबरदस्त उछाल देखा गया. मात्रा के लिहाज से यह 20 प्रतिशत बढ़कर 91.6 टन हो गई, जबकि मूल्य के हिसाब से इसमें 74 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 51,080 करोड़ रुपये से बढ़कर 88,970 करोड़ रुपये पर पहुंच गई. WGC के भारत क्षेत्रीय सीईओ सचिन जैन के अनुसार, यह आंकड़े भारतीय उपभोक्ताओं के बीच सोने को दीर्घकालिक संपत्ति और सुरक्षित निवेश के रूप में अपनाने की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाते हैं.

लगातार बढ़ रही चमक

इस तिमाही में भारत में सोने की औसत कीमत 46 प्रतिशत बढ़कर 97,074.9 रुपये प्रति 10 ग्राम रही, जबकि एक साल पहले यह 66,614.1 रुपये प्रति 10 ग्राम थी (जिसमें आयात शुल्क और जीएसटी शामिल नहीं है). अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सोने की कीमतें बढ़ीं और यह औसतन 3,456.5 डॉलर प्रति औंस रही, जो पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक है.

सचिन जैन ने यह भी कहा कि मात्रा में गिरावट के बावजूद मूल्य में 23 प्रतिशत की ऐतिहासिक वृद्धि भारतीय उपभोक्ताओं की बदलती आर्थिक स्थिति और बढ़ती प्रति व्यक्ति आय को दर्शाती है. उन्होंने बताया कि हाल के महीनों में बढ़ती कीमतों के कारण कई उपभोक्ताओं ने शादी से जुड़ी खरीदारी पहले ही कर ली, जिससे आने वाली चौथी तिमाही में मजबूत बिक्री की उम्मीद है.

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ट्रेन में चोरी हो गया पर्स तो गुस्से में महिला ने तोड़ दिया एसी कोच का सीसा, वीडियो वायरल

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तलाक के बाद बीवी नहीं बल्कि बिल्ली का खर्च उठाएगा ये शख्स, हर महीने इतना देना होगा भरन पोषण

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पालतू जानवरों के प्रति इंसानों का लगाव अक्सर परिवार के सदस्य जितना गहरा होता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि तलाक के बाद इंसान अपने पालतू जानवरों के भरण-पोषण का खर्च भी देगा? तुर्की में ऐसा ही एक मामला सामने आया है जिसने न केवल स्थानीय अदालतों को बल्कि पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है. इस्तांबुल के एक दंपती ने आपसी सहमति से तलाक तो ले लिया, लेकिन साथ ही एक ऐसा ‘समझौता’ किया जो अब पालतू प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बन गया है. इस समझौते के तहत पति ने अपनी पूर्व पत्नी को न केवल अपनी दो प्यारी बिल्लियों की कस्टडी दी, बल्कि उनके खर्च का वित्तीय बोझ भी खुद उठाने का वादा किया है.

इस्तांबुल के दंपत्ति ने लिया अनोखा तलाक

इस्तांबुल में रहने वाले बुग्रा बी. और उनकी पत्नी एजगी बी. ने “गंभीर असंगति और शादी की नींव के टूटने” का हवाला देते हुए तलाक की अर्जी दाखिल की थी. दोनों ने आपसी सहमति से यह फैसला किया कि अब वे साथ नहीं रह सकते, और इस कारण उन्होंने किसी भी तरह का मुआवजा या पारंपरिक गुजारा भत्ता नहीं मांगा. लेकिन दोनों ने जो तलाक प्रोटोकॉल तैयार किया, उसने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया.

बिल्लियों के भरण पोषण की भी जोड़ी गई शर्त

दरअसल, तलाक के दस्तावेज में एक अनोखी शर्त जोड़ी गई. पति बुग्रा बी. ने अपनी दो बिल्लियों की कस्टडी अपनी पत्नी एजगी बी. को सौंपी और यह तय किया कि वे इन बिल्लियों के भरण-पोषण का खर्च भी वहन करेंगे. समझौते में साफ लिखा गया है कि बुग्रा बी. हर तीन महीने में 10,000 तुर्की लीरा (करीब 240 डॉलर) एजगी बी. को देंगे, ताकि बिल्लियों की देखभाल सही तरीके से हो सके.

10 साल तक जारी रहेगा भुगतान

इतना ही नहीं, समझौते में यह भी प्रावधान रखा गया है कि यह भुगतान कम से कम 10 साल तक जारी रहेगा. अगर किसी भी कारण से बिल्लियां एजगी बी. के पास रहती हैं, तो बुग्रा बी. को यह भुगतान जारी रखना होगा. साथ ही यह राशि हर साल तुर्की सांख्यिकी संस्थान (TUIK) से निर्धारित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI)-EFE अनुपात के हिसाब से बढ़ाई जाएगी.

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सोशल मीडिया पर शुरू हो गई चर्चाएं

सोशल मीडिया पर यह मामला तेजी से वायरल हो गया है. कई लोगों ने इसे “मानवता से भरपूर कदम” बताया है, तो कुछ ने मजाक में कहा कि “अब पालतू भी तलाक का हिस्सा बनेंगे.” वहीं कई यूजर्स का मानना है कि यह समझौता उन पालतू प्रेमियों के लिए राहतभरी मिसाल है जो तलाक के बाद अपने जानवरों की जिम्मेदारी को लेकर परेशान रहते हैं.

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मेगापिक्सल क्या होता है और अच्छी फोटो के लिए क्या यही एक जरूरी चीज है? डिटेल में यहां जानें

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अगर आपने कभी भी स्मार्टफोन या कैमरा यूज किया है तो फोटो लेते समय मेगापिक्सल नाम जरूर सुना होगा. फोटोग्राफी के लिए मेगापिक्सल एक जरूरी नंबर होता है, लेकिन यह होता क्या है और क्या ज्यादा मेगापिक्सल का मतलब बेहतर फोटो होता है? आज हम इन सब जरूरी सवालों का जवाब लेकर आए हैं ताकि अगली बार जब कभी मेगापिक्सल का जिक्र आए तो आप इसके बारे में बेहतर तरीके से बात कर सकें. 

क्या होता है मेगापिक्सल?

एक मेगापिक्सल का मतलब है 10 लाख पिक्सल. अब पिक्सल की बात करें तो ये बहुत छोटे-छोटे रंगीन स्क्वेयर होते हैं, जिनसे मिलकर एक डिजिटल फोटो बनी होती है. यानी जब भी आप फोटो लेते हैं तो कैमरा कई लाख पिक्सल को कैप्चर कर उन्हें एक ग्रिड में अरेंज करता है, जिससे एक पूरी फोटो बनती है. इसलिए जब भी आप किसी इमेज को बहुत जूम करते हैं तो इसमें छोटे-छोटे स्क्वेयर नजर आने लगते हैं. 

क्या ज्यादा मेगापिक्सल से अच्छी इमेज आती है?

ज्यादातर लोग मानते हैं कि अच्छी क्वालिटी और शार्प इमेज के लिए ज्यादा मेगापिक्सल वाला कैमरा होना चाहिए, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है. ज्यादा मेगापिक्सल वाला सेंसर ज्यादा डिटेल कैप्चर करता है, जिससे बड़े प्रिंट या क्रॉपिंग के समय दिक्कत नहीं होती, लेकिन इमेज क्वालिटी के लिए सिर्फ यह जिम्मेदार नहीं होता है. लेंस क्वालिटी, सेंसर का साइज, लाइटिंग और कैमरा सॉफ्टवेयर आदि सारी चीजों से मिलकर इमेज क्वालिटी डिसाइड होती है. एक बेहतर क्वालिटी लेकिन कम पिक्सल वाला सेंसर भी शानदार इमेज कैप्चर कर सकता है.

ज्यादा मेगापिक्सल की जरूरत कब पड़ती है?

अगर आप किसी इमेज का बड़ा प्रिंट ले रहे हैं या किसी इमेज को क्रॉप कर उसका केवल छोटा हिस्सा यूज करना चाहते हैं तो ज्यादा मेगापिक्सल की जरूरत पड़ती है. इसीलीए फैशन और प्रोडक्ट फोटोग्राफर हाई-रेजॉल्यूशन यानी ज्यादा मेगापिक्सल वाले कैमरों को यूज करते हैं. 

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एमपी हाईकोर्ट में निकली डेटा प्रोसेसिंग असिस्टेंट की वैकेंसी, जानें कौन कर सकते हैं अप्लाई

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एमपी हाईकोर्ट की ओर से आवेदन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. उम्मीदवार 19 नवंबर 2025 तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं. आवेदन फॉर्म में सुधार करने के लिए 24 नवंबर से 26 नवंबर 2025 तक का समय मिलेगा. उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट mphc.gov.in पर जाकर फॉर्म भर सकते हैं.

एमपी हाईकोर्ट की ओर से आवेदन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. उम्मीदवार 19 नवंबर 2025 तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं. आवेदन फॉर्म में सुधार करने के लिए 24 नवंबर से 26 नवंबर 2025 तक का समय मिलेगा. उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट mphc.gov.in पर जाकर फॉर्म भर सकते हैं.

इस भर्ती अभियान के तहत कुल 41 पद निकाले गए हैं. ये पद डेटा प्रोसेसिंग असिस्टेंट के लिए हैं, जो न्यायिक कार्यों से जुड़ी तकनीकी और डिजिटल प्रक्रियाओं को संभालेंगे.

इस भर्ती अभियान के तहत कुल 41 पद निकाले गए हैं. ये पद डेटा प्रोसेसिंग असिस्टेंट के लिए हैं, जो न्यायिक कार्यों से जुड़ी तकनीकी और डिजिटल प्रक्रियाओं को संभालेंगे.

इन पदों के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों के पास मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से बी.एससी (कंप्यूटर साइंस), बीसीए (बैचलर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशन), बी.एससी (आईटी) या इसके समकक्ष डिग्री होनी चाहिए. साथ ही उम्मीदवारों के ग्रेजुएशन में कम से कम 60 प्रतिशत अंक या समकक्ष ग्रेड होना जरूरी है.

इन पदों के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों के पास मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से बी.एससी (कंप्यूटर साइंस), बीसीए (बैचलर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशन), बी.एससी (आईटी) या इसके समकक्ष डिग्री होनी चाहिए. साथ ही उम्मीदवारों के ग्रेजुएशन में कम से कम 60 प्रतिशत अंक या समकक्ष ग्रेड होना जरूरी है.

उम्मीदवार की उम्र 1 जनवरी 2025 तक 18 वर्ष से 35 वर्ष के बीच होनी चाहिए. आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नियमों के अनुसार आयु में छूट प्रदान की जाएगी.

उम्मीदवार की उम्र 1 जनवरी 2025 तक 18 वर्ष से 35 वर्ष के बीच होनी चाहिए. आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नियमों के अनुसार आयु में छूट प्रदान की जाएगी.

सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आवेदन शुल्क 943.40 रुपये है. वहीं, आरक्षित वर्ग और दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए 743.40 रुपये का शुल्क निर्धारित किया गया है.

सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आवेदन शुल्क 943.40 रुपये है. वहीं, आरक्षित वर्ग और दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए 743.40 रुपये का शुल्क निर्धारित किया गया है.

आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों को सबसे पहले एमपी हाईकोर्ट की वेबसाइट mphc.gov.in पर जाना होगा. होमपेज पर ‘Recruitment’ टैब पर क्लिक करें और ‘Online Application Forms’ विकल्प चुनें. इसके बाद डेटा प्रोसेसिंग असिस्टेंट भर्ती लिंक पर क्लिक करें. फॉर्म सबमिट कर दें.

आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों को सबसे पहले एमपी हाईकोर्ट की वेबसाइट mphc.gov.in पर जाना होगा. होमपेज पर ‘Recruitment’ टैब पर क्लिक करें और ‘Online Application Forms’ विकल्प चुनें. इसके बाद डेटा प्रोसेसिंग असिस्टेंट भर्ती लिंक पर क्लिक करें. फॉर्म सबमिट कर दें.

Published at : 30 Oct 2025 06:50 PM (IST)

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मिनटों में पूरी दुनिया खाक कर सकता है रूस का ‘पोसाइडन’, जानें भारत-अमेरिका के परमाणु बम से है क

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रूस ने हाल ही में दुनिया के सबसे शक्तिशाली न्यूक्लियर पावर्ड अंडरवाटर टॉरपीडो पोसाइडन का सफल परीक्षण किया. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने दावा किया कि मॉस्को ने 28 अक्तूबर 2025 को आर्कटिक महासागर में अंडरवाटर ड्रोन ‘पोसाइडन’ का टेस्ट किया. पतिन ने इसे बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि यह हथियार न्यूक्लियर यूनिट से लैस है.

व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि दुनिया में इस तरह का कोई और हथियार नहीं है, जिसका पावर रूस के सबसे बड़े ICBM सारमत से भी काफी ज्यादा है. ऐसे में बड़ा सवाल ये भी है कि आखिर रूस का ये हथियार भारत और अमेरिका के परमाणु हथियारों से कितना अलग है?

कितना पावरफुल है रूस का पोसाइडन? 

पोसाइडन एक अत्याधुनिक हथियार है, जो परमाणु ऊर्जा से लैस है. इसे पानी के अंदर पनडुब्बी से लॉन्च किया जा सकता है. इसका सबके बड़ी खासियत ये है कि इसमें बार-बार ईंधन डालने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि इसमें न्यूक्लियर फ्यूल यूनिट लगाया गया है. रूस की सरकारी न्यूज एजेंसी TASS की रिपोर्ट के अनुसार यह 1 किलोमीटर से गहरे पानी में चल सकता है.

पोसाइडन की स्पीड, रेंज और ताकत

पोसाइडन का वजन 100 टन, लंबाई 20 मीटर और स्पीड 100 नॉट्स है. यह इतनी तेज है कि कोई सामान्य नौसेना इसे पकड़ नहीं पाएगी. इसके पास देखते ही देखते पानी के भीतर अदृश्य होने की क्षमता है. इसमें दो मेगाटन तक का परमाणु वारहेड लगाया जा सकता है. रूसी सेना ने दावा किया है कि पोसाइडन लंदन जैसे 6 बड़े शहर को कुछ मिनटों में तबाह कर सकता है. इसकी रेंज की बात करें तो यह यह 14,000 किलोमीटर से ज्यादा दूर तक दुश्मनों को ढेर कर सकता है.

यह हिरोशिमा बम से 100 गुना ताकतवर 2 मेगाटन वॉरहेड ले जाता है. यह आर्कटिक सागर से लॉन्च होकर प्रशांत महासागर तक पहुंच सकता है. दुनिया के 80 फीसदी तटीय शहर इसकी रेंज में आते हैं. इसके विस्फोट से समुद्र में इतनी तेज रेडियोएक्टिव लहरें उठेंगी कि तटीय शहर में सुनामी में डूब जाएगा.

भारत और अमेरिका के हथियारों से कितना खतरनाक

भारत के पास फिलहाल इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) अग्नि-5 है, जिसकी रेंज करीब 6000 किलोमीटर तक है. वहीं अमेरिका के पास सबसे अधिक 13,000 किलोमीटर की रेंज वाला मिसाइल है. इन दोनों देशों के ये मिसाइल किसी भी दूसरे महाद्वीप तक हमला करने में सक्षम है. 

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एस. डी. बर्मन के गाने ही नहीं, 1 रुपये वाला झगड़ा भी किया जाता है याद, जानें क्या था वो

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संगीत की दुनिया में सचिन देव बर्मन का जादू आज भी लोगों के सिर चढ़कर बोलता है. फैंस उन्हें एस. डी. बर्मन के नाम से जानते हैं. उनका संगीत इतना खास और अनोखा था कि लोग उनके गीतों को सुनकर आज भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं.

एस. डी. बर्मन ने हिंदी फिल्मों में संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. उनकी संगीत यात्रा में कई तरह की कहानियां जुड़ी हुई हैं, जिनमें से कुछ बहुत मजेदार और दिलचस्प भी हैं. इनमें से एक कहानी उनके और प्रसिद्ध गीतकार साहिर लुधियानवी के बीच हुई छोटी-सी अनबन की है, जो आज भी फिल्मी दुनिया में याद की जाती है.

त्रिपुरा के राजघराने से ताल्लुक रखते थे एस. डी. बर्मन

सचिन देव बर्मन का जन्म 1 अक्टूबर 1906 को बंगाल प्रेसीडेंसी में हुआ था. वह त्रिपुरा के राजघराने से ताल्लुक रखते थे. उनकी मां राजकुमारी निर्मला देवी मणिपुर की राजकुमारी थीं और उनके पिता एमआरएन देव बर्मन त्रिपुरा के महाराज के बेटे थे. एस.डी. बर्मन कुल नौ भाई-बहनों में सबसे छोटे थे. बचपन से ही उनमें संगीत के प्रति गहरी रुचि थी.

एस. डी. बर्मन ने अपनी पढ़ाई कोलकाता विश्वविद्यालय से पूरी की और वहां से बीए की डिग्री प्राप्त की. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने संगीत की दुनिया में कदम रखा और 1932 में कोलकाता रेडियो स्टेशन पर गायक के तौर पर जुड़ गए. यहां से उनका करियर धीरे-धीरे आगे बढ़ा. शुरुआत में उन्होंने बांग्ला फिल्मों में संगीत दिया और फिर मुंबई का रुख किया, जहां उन्होंने हिंदी फिल्मों में अपनी पहचान बनानी शुरू की.

मुंबई आकर शुरू की असली पारी

मुंबई आने के बाद उन्हें पहली बार फिल्म ‘शिकारी’ और ‘आठ दिन’ में संगीत देने का मौका मिला. इसके बाद उनकी ख्याति तेजी से बढ़ी और उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए कई यादगार गीत दिए. उनकी खासियत यह थी कि वह शास्त्रीय और लोक संगीत का सुंदर मिश्रण बनाकर गीतों को अनोखा बनाते थे. ‘गाइड’, ‘प्यासा’, ‘बंदिनी’, ‘सुजाता’, ‘अभिमान’ जैसी फिल्में उनकी संगीत प्रतिभा का शानदार उदाहरण हैं.

Death Anniversary: एस. डी. बर्मन के गाने ही नहीं, 1 रुपये वाला झगड़ा भी किया जाता है याद, जानें क्या था वो

क्या है एक रुपये वाला किस्सा

एस. डी. बर्मन की जिंदगी में संगीत के साथ-साथ कुछ मजेदार किस्से भी जुड़े थे. ऐसा ही एक किस्सा फिल्म ‘प्यासा’ के दौरान उनके और साहिर लुधियानवी के बीच हुआ. इस फिल्म के गानों को लेकर दोनों में यह विवाद हो गया कि गाने में ज्यादा क्रिएटिविटी किसकी है.

साहिर ने एस. डी. बर्मन से यह मांग की कि उन्हें एक रुपए ज्यादा मेहनताना दिया जाए, क्योंकि उनका मानना था कि गाने की लोकप्रियता में उनका योगदान बराबर का है. एस. डी. बर्मन ने साहिर की मांग को स्वीकार नहीं किया और इस कारण दोनों ने इसके बाद कभी साथ काम नहीं किया. यह छोटा-सा झगड़ा इंडस्ट्री में आज भी एक दिलचस्प किस्से के रूप में याद किया जाता है.

एस. डी. बर्मन की व्यक्तिगत जिंदगी भी उतनी ही दिलचस्प थी जितनी उनकी संगीत यात्रा. वह फुटबॉल के बहुत बड़े शौकीन थे और खाने-पीने के भी. इसके साथ ही वह अपने खर्चों को लेकर काफी सतर्क रहते थे और इंडस्ट्री में लोग उन्हें कंजूस कहकर हंसते थे. उनके और लता मंगेशकर के बीच भी कभी-कभी छोटी-मोटी अनबन होती रहती थी, लेकिन उनके बेटे आर. डी. बर्मन ने बाद में दोनों के बीच मेल-मिलाप करवा दिया.

31 अक्टूबर 1975 को एस. डी. बर्मन का निधन हो गया, लेकिन उनका संगीत आज भी जीवित है. उनकी याद में त्रिपुरा सरकार हर साल सचिन देव बर्मन मेमोरियल अवॉर्ड देती है और साल 2007 में उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया गया.

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