सारी लड़ाई दो जून की रोटी पर आई…आज की तारीख क्यों है खास? सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे मीम

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सोशल मीडिया की दुनिया में हर तारीख कभी न कभी किसी मजाक की वजह बन ही जाती है. अब 2 जून आ गया है, तो नेटिजन्स को याद आ गई ‘दो जून की रोटी’और फिर क्या था, मीमबाजों ने अपना तंदूर गर्म कर लिया. इंस्टाग्राम से लेकर ट्विटर (X) और फेसबुक तक, हर जगह रोटियों की फोटो, पेट पकड़े मजदूर, और चाय के साथ ‘अच्छे दिन’ की तलाश करते आम आदमी की तस्वीरें तैरने लगीं. कोई कह रहा है, “भैया आज 2 जून है, अब तो दो वक्त की रोटी मिलनी ही चाहिए.” तो कोई पूछ रहा है  “बाकी के 364 दिन कौन खाएगा?”

दो जून को लेकर वायरल हो रहे मीम

2 जून को लेकर शुरू हुए इस ट्रेंड की शुरुआत कुछ मीम पेजों ने की, जब उन्होंने तंज कसा कि “आज का दिन खास है, क्योंकि आज ही है वो दिन जिसका जिक्र हर संघर्ष में होता है दो जून.” देखते ही देखते पोस्ट्स वायरल हो गए. एक यूजर ने लिखा . “आज तो रोटी खुद चलकर मेरे पास आनी चाहिए, क्योंकि 2 जून मेरा हक है.” दूसरे ने लिखा “आज के दिन बकाया रोटियों का हिसाब मांगो सरकार से.”

एक मीम में एक आदमी रोटी के साए में अपने बच्चों और पत्नी के साथ खड़ा है और कैप्शन है.. इतना डिजिटल होने के बाबजूद भी रोटी के लिये दर-2 भटकते हुये मजबूर इंसान को अब और देखा नहीं जाता है. पहले रोटी का इंतजाम, फिर देखो दूसरा कोई. कुछ यूजर्स ने इस मौके पर इमोशनल ट्वीट भी किए “आज 2 जून है, लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें आज भी दो वक्त की रोटी मयस्सर नहीं. उनके लिए दुआ करें.” यानी सोशल मीडिया पर हंसी और होशियारी के बीच थोड़ा सा जमीनी दर्द भी बिखरा दिखा.

काफी पुराना है ये हिंदी मुहावरा, जानिए असल मतलब

‘दो जून की रोटी’ एक मशहूर हिंदी मुहावरा है, जिसका अर्थ है दिन में दो बार पेट भरने लायक भोजन. ये मुहावरा भारत में आम आदमी के संघर्ष और बुनियादी जरूरतों की प्रतीक बन चुका है. इसमें “जून” का मतलब दिन के दो खाने (सुबह/दोपहर और शाम) से है और यह शब्द हिंदी-उर्दू में पुराने वक्त से प्रचलित है. यानी 2 जून का असल खाना भले कोई खास न हो, लेकिन ‘दो जून की रोटी’ आज के दिन मीम जगत में ही नहीं, लोगों के दिलों में भी खास जगह बना गई.