महापुरुषों की मूर्तियां कैद, प्रशासन की नीयत संदिग्ध

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Statues of great men imprisoned, administration intentions doubtful - Aurangabad News in Hindi




औरंगाबाद। बिहार की राजनीति में मूर्तियों की किस्मत भी नेताओं की तकदीर की तरह बदल रही है। कभी सम्मान के प्रतीक के रूप में स्थापित की गईं ये मूर्तियां अब धूल फांक रही हैं, या फिर ‘सरकारी कैद’ में बंद हैं। विरासत बचाओ संघर्ष परिषद के नेतृत्व में एक बार फिर संघर्ष की चिंगारी भड़की है, जहां महापुरुषों के सम्मान के मुद्दे को लेकर प्रशासन के खिलाफ सड़क से सदन तक लड़ाई की घोषणा कर दी गई है।




ओबरा विधायक ऋषि यादव ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि पूर्वजों का सम्मान किसी भी हालत में गिरने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर रामविलास पासवान की मूर्ति तोड़ने की घटना हो या फिर पूर्व मंत्री रामविलास सिंह यादव की प्रतिमा को हटाने का मामला—ऐसे कृत्यों को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है? क्या प्रशासन की नीयत वाकई साफ है, या फिर ‘विशेष महापुरुषों’ का ही सम्मान करना उसकी प्राथमिकता बन चुका है?

संघर्ष परिषद के अध्यक्ष सत्येंद्र यादव ने तल्ख लहजे में कहा कि महापुरुषों की मूर्तियां सिर्फ पत्थर नहीं होतीं, वे समाज के आत्मसम्मान और संघर्ष की प्रतीक होती हैं। लेकिन दुर्भाग्य देखिए, एक तरफ जहां इन महापुरुषों को किताबों में महान बताया जाता है, वहीं दूसरी तरफ उनकी मूर्तियां धूल फांक रही हैं या फिर ‘रातों-रात उठाकर’ थाने में कैद कर दी जा रही हैं।

मूर्तियां सम्मान की या राजनीति की बिसात?

शहर में सरदार वल्लभ भाई पटेल और शहीद जगपति की प्रतिमाओं की दुर्दशा देखकर सवाल उठता है—क्या सरकार और प्रशासन को सिर्फ चुनावी महापुरुषों की ही चिंता है? क्यों सिर्फ कुछ ही मूर्तियों की देखभाल होती है, और बाकी को उपेक्षित कर दिया जाता है?

सबसे विवादास्पद मामला पूर्व मंत्री रामविलास बाबू की आदमकद प्रतिमा का है, जिसे बस स्टैंड परिसर में स्थापित किया गया था, लेकिन 8 नवंबर 2024 की रात उप विकास आयुक्त (डीडीसी) अभियेंद्र मोहन सिंह के आदेश पर इसे बलपूर्वक उखाड़कर थाने में ‘कैद’ करवा दिया गया। परिषद ने इसे दलित-पिछड़ा वर्ग का अपमान करार देते हुए चेतावनी दी है कि अगर मूर्ति को तुरंत पुनर्स्थापित नहीं किया गया, तो संघर्ष और तेज़ होगा।

राजनीति के दलदल में फंसता सम्मान

अब सवाल यह है कि प्रशासन का यह कदम केवल ‘कानूनी प्रक्रिया’ का हिस्सा है, या फिर इसके पीछे किसी ‘खास एजेंडे’ की बू आ रही है? परिषद का आरोप है कि डीडीसी नहीं चाहते कि किसी दलित या पिछड़े वर्ग की मूर्ति शहर में स्थापित की जाए, इसलिए इसे रातों-रात हटा दिया गया।

यह पूरा मामला सिर्फ मूर्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बताता है कि किस तरह इतिहास, सम्मान और राजनीति आपस में गुथमगुत्था हो चुके हैं। महापुरुषों को सिर्फ प्रतीकों तक सीमित कर देना और फिर उन्हीं प्रतीकों को नष्ट करना एक ऐसा खेल बन गया है, जिसमें आम जनता की भावना दांव पर लगी रहती है। सवाल यही है—महापुरुषों की मूर्तियों का यह ‘अपमान’ कब तक चलेगा, और कब तक राजनीति इस ‘पत्थर की राजनीति’ पर अपनी रोटियां सेंकती रहेगी?

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