प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के समर्थन में सीपीएम भी सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्थलों को लेकर समझौता हो रहा है

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जमीयत उलेमा ए हिंद, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कांग्रेस प्रवक्ता आलोक शर्मा के बाद अब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम भी 1991 के प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट को बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। सीपीएम ने देश भर में मस्जिदों और मस्जिदों के हिंदू मंदिरों पर होने का दावा करते हुए साझीदारी का विरोध किया है। पार्टी ने इसे खतरा बताया है। इस कानून को चुनौती देते हुए कई सर्वोच्च अदालतों में याचिकाएं दाखिल की गईं। इन आवेदन पत्रों में कहा गया है कि यह कानून हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध समुदाय को अपना अधिकार फाउंडेशन से जोड़ता है। किसी भी मुद्दे को कोर्ट तक लेकर आना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ नागरिकों को यह अधिकार से शुरू होता है। यह सिर्फ न्याय पाने के मूल अधिकार का हनन है, बल्कि धार्मिक आधार पर भी भेदभाव है। >सुप्रीम कोर्ट में वकील अश्विनी उपाध्याय के अलावा बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी, विश्व भद्र पुरोहित पुजारी चर्च जैसे कई दिग्गजों ने कानून को चुनौती दी है, लेकिन 2020 से लेकर अब तक केंद्र सरकार ने इन पदों पर कोई जवाब नहीं दिया है। 12 दिसंबर को चीफ जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस पीवी संजय कुमार और के वी विश्वनाथन की विशेष बेंच इस मामले को सुनेगी।

सी पीएम ने आरामदायक भर्ती की मांग की

सीपीएम के पोलित ब्यूरो के सदस्य प्रकाश कैरेट के माध्यम से प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट को चुनौती देने वाली याचिका को सर्वोच्च न्यायालय में खारिज कर दिया गया। पार्टी ने कहा है कि यह कानून भारत के वकीलों का कहना है। संविधान से हर नागरिक को समानता, सम्मान से जीवन जीने और धार्मिक स्वतंत्रता का मूल अधिकार मिला हुआ है। यह कानून अधिकारों की रक्षा करता है। सामाजिक समरसता में बदलाव से क्षति पहुंचेगी।

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