छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के इस फैसले से 20 साल बाद ही सही न्याय मिला। पिछले 20 वर्षों में पुलिस विभाग के अलास्ट डेज का चक्कर लग गया था। हर एक जगह से नमूने ही हाथ लग रही थी।
द्वारा योगेश्वर शर्मा
प्रकाशित तिथि: शनिवार, 23 नवंबर 2024 12:41:57 पूर्वाह्न (IST)
अद्यतन दिनांक: शनिवार, 23 नवंबर 2024 12:41:57 पूर्वाह्न (IST)
नईदुनिया न्यूज, बिलासपुर। ड्यूटी के दौरान मृत आरक्षक के पुत्रों ने अनुकंपा के लिए विभाग में आवेदन पेश किया था। विभाग के अलाअरिअथ के पास है उत्तराधिकार प्रमाण पत्र का ऐसा प्लांट फंसाया कि 20 साल की नौकरी से वह पुलिस के लिए नौकरी के लिए चक्कर काट रहा है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में जस्टिस की प्रोफाइल शीट की थी। अदालत ने निवेशकों को आदेश जारी करने की प्रक्रिया शुरू करने के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि, अनुकंपा इंस्टीट्यूट के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र मिया जाने की आवश्यकता नहीं है।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के इस फैसले से 20 साल बाद ही सही न्याय मिला। पिछले 20 वर्षों में पुलिस विभाग के अलास्ट डेज का चक्कर लग गया था। हर एक जगह से नमूने ही हाथ लग रही थी। अनुकंपा ऑफर से पहले विभाग को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की सलाह दी गई थी। इसी तरह एक लेग प्लांट के प्लांट को फ्रेमवर्क हाथ में ले रही थी। मामले की सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने पुलिस विभाग द्वारा उत्तराधिकार प्रमाण पत्र पेश करने के संबंध में जारी पत्र जारी कर दिया है। कोर्ट ने इंकलाब व बिलासपुर स्पाइस को निर्देशित किया है कि, बेचने की अनुकंपा एनजीओ के प्रकरण का उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के बिना बैनामा किया जाए।
क्या है मामला
छत्तीसगढ़ बिलासपुर के कपिल नगर सरकंडा निवासी अलेक्जेंडर खान ने अब्दुल वहाब खान के माध्यम से हाई कोर्ट में दाखिल याचिका की थी। दादाजी ने बताया था कि, उनके पिता स्व. शिवकुमार साहू पुलिस कप्तान कार्यालय बिलासपुर में रक्षक के पद पर तैनात थे। सेवाकाल के दौरान 26 मार्च 2004 को उनकी मृत्यु हो गयी। ग्रेटर होने ने अदालत को बताया कि उसकी मां रजिया माल्टा को मृतक की पत्नी के स्वामित्व वाली पारिवारिक पेंशन मिल रही है। मृतक के खाते में जमा विभिन्न पागलों की राशि के भुगतान के संबंध में उसने व मां राजिया राजपूत व अन्य उत्तराधिकारियों के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र भी प्राप्त किया था। इस बात की पूरी जानकारी कंपनी ने अपनी फाइल में दी है कि अनुकंपा मीटिंग के संबंध में रिश्तेदारों ने भी कोई दोस्ती दर्ज नहीं की है। सभी ने अपनी सहमति भी दे दी है। इसके बाद भी विभाग द्वारा उत्तराधिकार प्रमाण पत्र मांगा जा रहा है। प्रमाण पत्र पेश करने के कारण उसे अनुकंपा फ़ेक्चर से बढ़ावा दिया जा रहा है। केस की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पांडे के सिंगल बेंच में हुई। मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस पांडे ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अनुकंपा याचिका के संबंध में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की नींव नहीं है। इस प्रकार का प्रमाण पत्र माँगने की विधि के विपरीत है। पुलिस विभाग द्वारा सप्लाई को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र मिया जाने एसोसिएटेड ऑर्डर को रद्द करने के निर्देश दिए गए हैं।
ये भी पढ़ें…
जाति प्रमाण पत्र विवाद: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने जाति प्रमाण पत्र के आदेश को रद्द कर दिया
जाति प्रमाण पत्र के समर्थक और जाति प्रमाण पत्र समिति के कार्य और अधिकार को लेकर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। उच्च स्तरीय जाति सामुहिक समिति के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी किया गया। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि जाति जांच समिति एक अर्ध-न्यायिक अधिकार के रूप में कार्य करती है, जिसके लिए केवल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना आवश्यक नहीं है, बल्कि इसके द्वारा प्रत्येक सामग्री को उस व्यक्ति के साथ जोड़ा जाता है। अंतःस्थापित प्रकट होना भी आवश्यक है, जिसके विरुद्ध जांच की जा रही है।
9 जनवरी 2015 को ग्रेटर लक्ष्मी नारायण महोथ ने उच्चाधिकार प्राप्त जाति सार्जेंट समिति (इसकी बाद की समिति) द्वारा 9 जनवरी 2015 को जारी जाति प्रमाण पत्र जारी किया। राड कर दिया गया है कि जनजाति ने गड़रिया जाति, जो अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से संबंधित है, उसका संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत जाति जनजाति (एसटी) का उक्त जाति प्रमाण पत्र प्राप्त किया गया था और प्राप्त किया गया था।
क्या है मामला
दादा लक्ष्मी नारायण अपने महंत वर्ष 1983 में डाक विभाग में डाक सहायक के पद पर नियुक्त हुए और उसके बाद पर्यवेक्षक के पद पर नियुक्त हुए। जनजाति के अनुसार वह धनगढ़ जाति का है, जो स्वीकृत जनजाति के रूप में अधिसूचित है। उस्के पक्ष में 6 फरवरी 1982 को जाति प्रमाण पत्र जारी किया गया था। सेवा अवधि के दौरान, विभाग द्वारा उसे प्रमाणित प्रमाणित जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था। उक्त निर्देशों के पालन में उन्हें एक अगस्त 1992 को महासमुंद से जाति प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ। इस बीच उनकी जाति के संबंध में कुछ लोगों ने तलाक ले लिया। इसी आधार पर विभाग ने रजिस्ट्रार से प्रतिवेदन मांगा। विस्तृत जांच के बाद, बिक्री की जाति, जो एसटी की श्रेणी में दिखाई देती है, आदिम जाति कल्याण) रायपुर द्वारा 11 मार्च 1999 को प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। यहां तक कि पुलिस अधीक्षक के समन पर कार्रवाई की गई, यहां तक कि रिजवेट ने जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने में कोई अपराध नहीं किया, मामला खारिज कर दिया गया। इस बीच डाक विभाग के मुख्य अधीक्षक ने बिक्री के लिए आवेदन के संबंध में रजिस्ट्रार कार्यालय को प्रतिवेदन भेजा था। अतिरिक्त किसानों ने कहा कि बिक्री का जाति प्रमाण पत्र असली है। समृद्धि ने बताया कि छत्तीसगढ़ राज्य में धनकर/धनगढ़ जाति को एसटी वर्ग के अंतर्गत स्वीकृत अधिसूचित किया गया है और इसमें धनगढ़/गढ़रिया को भी शामिल किया गया है, जिस पर छत्तीसगढ़ राज्य में जनजाति आयोग ने स्वीकृत विचार किया है। इसमें सरकार द्वारा अधिसूचित ‘धनगढ़’ शब्द शामिल है।
उच्च न्यायालय का आदेश
केस की सुनवाई जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच में हुई। जनसंख्या के जाति प्रमाण पत्र को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मान्यता और अधिनियम, 2013 और नियम, 2013 के लिए अनुमोदित किया गया। इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से छह महीने की अवधि के अनुसार दर्ज करें।



.jpg)

