भैरव अष्टमी 2024: भैरव अष्टमी पर आज देश के प्रमुख चॉकलेट सिक्कों में जपं के बाजनमठ में अनु मंदिर, शंकराचार्य सहित पढ़ें पूरी रोचक जानकारी

भैरव अष्टमी 2024: भैरव अष्टमी पर आज देश के प्रमुख चॉकलेट सिक्कों में जपं के बाजनमठ में अनु मंदिर, शंकराचार्य सहित पढ़ें पूरी रोचक जानकारी

अवध प्रदेश के जबलपुर में स्थित श्री काल भैरव मंदिर विख्यत बाजानामठ मंदिर के बारे में बहुत से सिद्धांत हैं। सिद्धांत के अनुसार, राहु केतु एवं शनि ग्रह दोष, गृह क्लेश, आर्थिक, मानसिक परेशानी या रूढ़िवादिता में लाभ होता है। सिद्ध मठ देश में केवल तीन हैं, जिनमें एक बाजामठ और दूसरा काशी और तीसरा महोबा में है। बाजनमठ तांत्रिक मंदिर के हर समूह शुभ नक्षत्रों में मंत्रों द्वारा सिद्ध करके जमा किया जाता है।

द्वारा सुरेंद्र दुबे

प्रकाशित तिथि: शनिवार, 23 नवंबर 2024 12:05:57 अपराह्न (IST)

अद्यतन दिनांक: शनिवार, 23 नवंबर 2024 12:18:53 अपराह्न (IST)

जबलपुर का बाजानामठ एक ऐसा जादुई मंदिर है, जिसके हर समूह में शुभ नक्षत्रों के मंत्रों को सिद्ध किया गया है:नईदुनिया।

पर प्रकाश डाला गया

  1. गौरीघाट मुक्तिधाम मंदिर में होगा विविध आयोजन।
  2. श्री काल भैरव का अभिषेक,101 गंज खेड का भोग।
  3. तिलवाराघाट के काल भैरव मंदिर में तीन दिनी अनुष्ठान।

नईदुनिया, जबलपुर (भैरव अष्टमी 2024)। जाबांज के अन्य शिव व भैरव मंदिर में भी ब्रह्माण्ड की भीड़,नर्मदा किनारे भी पिछे पड़ेंगे अशनैदुनिया प्रतिनिधि, जाबांज: काल भैरव की आराधना का महापर्व भैरव अष्टमी शनिवार को है। सिद्ध मठ देश में केवल तीन हैं, जिनमें एक बाजनमठ और दूसरा काशी और तीसरा महोबा में है। चॉकलेटों के मत अन्य गुटों का बाजानामठ एक ऐसा धार्मिक मंदिर है, जिसके हर समूह में शुभ नक्षत्रों के मंत्रों द्वारा सिद्ध करके जमा किया जाता है।

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शनि-राहू से मिलती है राहत

भैरव मंदिर के भक्त मंडल से जुड़े सदस्य हैं कि बाजनामठ में पूजा-अर्चना किए जाने से लोगों को चमत्कारिक लाभ होता है। यहां तेल व पुष्प चढ़ाने से शनि व राहु की पीड़ा से मिलती है राहत। इसी उम्मीद से हजारों की संख्या में भक्त आते हैं और उनकी मांग भी पूरी होती है। प्राचीन मंदिरों में आज भी शामिल हैं आसपास के आभूषणों से बड़ी संख्या में लोग शनिवार को तेल चढ़ाने के लिए आते हैं। इनमें भी शामिल हैं।

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कार्तिक कृष्ण पक्ष अष्टमी को हुई थी उत्पत्ति

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान शंकर के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। ऐसा वर्णित शिव महापुराण में है। इस तिथि को भैरव अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक आख्यानों के अंधकासुर नाम के दैत्य ने अपने कृतियों से अनीति और अत्याचारियों की अंतिम यात्रा पार की थी, यहां तक ​​कि एक बार घमंड में चूर होकर वह भगवान शिव तक के ऊपर आक्रमण करने का दुस्साहस कर चुका था। तब उनके संहार के लिए शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई।

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शिव चित्रों में भी शिवजी व भैरवनाथ की विशेष पूजा

  • शहर के भैरव व बजरंग बली के पूजन में पूजन के लिए उमड़ेगी भीड़।
  • शास्त्री नगर के बाजना मठ मंदिर में भैरव पूजन के लिए तताँता लगा हुआ।
  • कालभैरव जयंती के अवसर पर मंदिर में विशेष अनुष्ठान भी होगा।
  • अन्य भैरव व शिव मंदिरों में भी शिवजी व भैरोनाथ की विशेष पूजा।
  • ज्योतिषाचार्यो के अनुसार शनिवार को शुभफलाद इंद्र व रवि योग।
  • नर्मदा के स्नानघर पर स्नान, दान, पूजन करने के लिए वैष्णवों का तांता लगा हुआ है।
  • गौरीघाट, तिलवारा घाट सहित नर्मदा के अन्य घाटों में भी भीड़ रहती है।
  • सभी भैरव मन्दिरों एवं शक्तिपीठों में भी अत्याधिक भीड़ निवास की शोभा बढ़ाती है।
  • मंदिरों में सुबह से ही पूजा व भोग लगाने वालों की कतारें लगेंगी।

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निशिता महोत्सव से आज

ज्योतिषाचार्य सौरव के अनुसार, शनिवार को कालाष्टमी मनाई जाएगी। अष्टमी तिथि प्रारंभ 22 नवंबर को रात्रि नौ बजे दो मिनट हो गई है। अष्टमी तिथि 23 नवंबर शनिवार को रात 10 बजे 5 मिनट पर होगी। कालभैरव अष्टमी के दिन बाबा काल भैरव की पूजा की रात को निशिता भगवान की पूजा की जाती है। इसलिए इस बार भैरव अष्टमी शनिवार को मनाई जाएगी।

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रवि व इंद्र योग में पूजनीय शुभ

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर काल भैरव जयंती का विशेष महत्व है। इस बार भैरव अष्टमी के दिन पद्म योग, ब्रह्म योग और इंद्र योग के साथ ही रवि योग बन रहा है। माना जाता है कि इन योगों में भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव देव की पूजा करने से साधक को सभी प्रकार की शारीरिक और मानसिक कष्टों से मुक्ति मिल जाती है।

ऐसे हुई भैरव की उत्पत्ति

शिवपुराण के अनुसार कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को मध्याह्न में भगवान शंकर के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। अत: इस तिथि को भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक आख्यानों के अंधकासुर नाम के दैत्य ने अपने कृतियों से अनीति और अत्याचारियों की अंतिम यात्रा पार की थी, यहां तक ​​कि एक बार घमंड में चूर होकर वह भगवान शिव तक के ऊपर आक्रमण करने का दुस्साहस कर चुका था। तब उनके संहार के लिए शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई।

आदि पूर्वजों ने भी की थी पूजा

गुप्तेश्वर पुर्णाधीश्वर स्वामी द. मुकुंददास महाराज ने बताया कि चौसठ योगिनी और 81 भूत, प्रेत, पिशाचों को जागृत करने का यह विशेष स्थान है। जहाँ तंत्र साधना की शिक्षा दी गयी थी। उस समय तंत्र साधना को जाग्रत करने के लिए भैरव मंदिर को विशेष स्थान बनाया गया था। शिव के गण के रूप में भैरव को जाग्रत किया जाता है। यहां आदि पुरनियों की भी पूजा की जाती थी।

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