MP Medical University: 120 करोड़ रुपये के एफडी घोटाले में क्लीन चिट, आयुर्विज्ञान विवि में नहीं हुआ कोई गबन

MP Medical College: 120 करोड़ रुपये के एफडी घोटाले में क्लीन चिट, आयुर्विज्ञान विवि में नहीं हुआ कोई गबन

मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय में 120 करोड़ रुपये का एफडी घोटाले की जांच कर रही समिति ने अपनी रिपोर्ट राजभवन प्रेषित कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार संस्थान में कोई वित्तीय अनियमितता और गबन नहीं पाया गया है। यह मामला ठीक उस समय चर्चा में आया जब राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में एफडी घोटाला उजागर हुआ था।

By Neeraj Pandey

Publish Date: Sat, 22 Jun 2024 10:29:54 PM (IST)

Up to date Date: Sat, 22 Jun 2024 10:29:54 PM (IST)

समिति को जांच में कई शिकायती तथ्य त्रुटिपूर्ण मिले

HighLights

  1. एफडी घोटाले की जांच कर रही थी जस्टिस गुप्ता समिति
  2. राष्ट्रीयकृत बैंकों में अधिकत ब्याज पर एफडीआर कराई गई
  3. सीमा से बाहर जाकर लगाया गया आक्षेप

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर: मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय में 120 करोड़ रुपये के एफडी घोटाले की जांच कर रही जस्टिस गुप्ता समिति की रिपोर्ट में संस्थान में कोई वित्तीय अनियमितता और गबन नहीं पाया गया है। सरकारी राशि के निजी बैंकों में उपयोग का आरोप भी निराधार पाया गया है। निजी बैंक या निजी खातों में विश्वविद्यालय की धनराशि भी नहीं मिली है न ही विश्वविद्यालय के धन से किसी ने व्यक्तिगत लाभ लिया है। तीन सदस्यीय समिति ने अपनी जांच रिपोर्ट शुक्रवार को राजभवन प्रेषित कर दी है।

सूत्रों के अनुसार जांच समिति को प्रारंभिक छानबीन में विश्वविद्यालय की धनराशि को 2021 में चालू खातों में रखने में तत्कालीन वित्त नियंत्रक रविशंकर डेकाटे की लापरवाही मिली है। हालांकि यह प्रकरण वर्तमान कुलपति के पदभार ग्रहण के एक वर्ष पूर्व का होकर तब ही समाप्त हो चुका था, फिर भी अफवाहों ने इसे भी वर्तमान प्रशासक के साथ जोड़ दिया था।

विश्वविद्यालय ने देखा कि कई छोटी-छोटी एफडी कई बैंक में कई ब्याज दर पर है जिससे समय श्रम और ब्याज की हानि होती है। कुलपति डा. खंडेलवाल ने तत्परता दिखाई और विश्वविद्यालय की समस्त धनराशि को एकजाई कराया। निविदा जारी कर राष्ट्रीयकृत बैंकों में अधिक ब्याज पर एफडीआर कराई गई, जिसके कारण विश्वविद्यालय को अब अपेक्षाकृत एफडीआर पर अधिक ब्याज प्राप्त हो रहा है।

120 करोड़ 90 लाख रुपए के घोटाले का आरोप

विश्वविद्यालय में 120 करोड़ 90 लाख 65 हजार 800 रुपये को एफडी के स्थान पर चालू खाते में रखकर वित्तीय घोटाले की शिकायत हुई थी। वह गलत पाई गई। स्थानीय निधि संपरीक्षा की फरवरी 2023 की रिपोर्ट में विश्वविद्यालय की वित्त शाखा में लेखों के लेखांकन के लिए कैशबुक का संधारण नहीं करने और स्टाक पंजी के त्रुटिपूर्ण संधारण की बात कही गई थी।

आरजीपीवी एफडी घोटाले के समय चर्चा में आया

अनियमितता का यह मामला ठीक उस समय चर्चा में आया जब राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में एफडी घोटाला उजागर हुआ था जबकि पुराने प्रकरण की शिकायत पर आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय जांच के लिए अप्रैल 2023 में ही तीन सदस्यीय समिति गठित कर चुका था।

पूर्व जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता और वेटरनरी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. गोविंद्र प्रसाद मिश्रा, नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कालेज के नेत्ररोग विभाग के तत्कालीन प्रमुख डा. परवेज अहमद सिद्दिकी की सदस्यता वाली समिति ने समस्त अभिलेखों, बैंक खातों की जांच और जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों के कथन लिए। जांच रिपोर्ट राजभवन को प्रेषित की है।

समिति ने जांच में पाया

  • समिति को जांच में कई शिकायती तथ्य त्रुटिपूर्ण मिले हैं। सूत्रों के अनुसार जांच में पाया गया कि एफडी की जो राशि 1209065800 रुपये बताई गई थी, वह वास्तव में 111 करोड़ 90 लाख 54 हजार 778 रुपये थी। संबंधित राशि पर आटो रिन्यू के साथ ब्याज प्राप्त हो रहा था।
  • विश्वविद्यालय की धनराशि मात्र राष्ट्रीयकृत बैंकों में ही जमा पाई गई है। निजी बैंक या निजी व्यक्ति को राशि नहीं दी गई है। ना ही विश्वविद्यालय के प्रशासकों ने इस राशि का कोई दुरुपयोग किया है।
  • विश्वविद्यालय में अलग-अलग राशि की 68 एफडी पृथक-पृथक राष्ट्रीयकृत बैंकों में थी। इनमें विश्वविद्यालय को 4.9 से 5.2 प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त हो रहा था। टुकड़े-टुकड़े में एफडी का संधारण जटिल कार्य था।
  • कुलपति डा. अशोक खंडेलवाल के निर्देश पर समस्त राशि एकत्रित कर एक एफडी राष्ट्रीयकृत बैंक में बनाई गई है। जो कि एक बेहतर वित्तीय प्रबंधन था, जिस पर अब 7.9 प्रतिशत की दर से ब्याज प्राप्त हो रहा है। जो कि पूर्व से लगभग डेढ़ गुना अधिक है।

कुलपति के नाम से बना ली फर्जी नोटशीट

जस्टिस गुप्ता की समिति ने जांच में तत्कालीन वित्त नियंत्रक रविशंकर डेकाटे की जालसाजी को भी उजागर किया है। सूत्रों के अनुसार जांच में पता चला है कि डेकाटे ने बिना कुलपति के अनुमोदन के राशि एमओडी में जमा कर दी और बैंक को पत्र लिखा कि कुलपति द्वारा आदेशित किया गया है। इस बात को लंबे समय तक दबाए रखा और कुलपति डा. खंडेलवाल को भ्रामक जानकारी देते रहे। बाद में मामले की पड़ताल हुई तो पता चला कि डेकाते ने अनुमोदन लिया ही नहीं था। इस बात को डेकाते ने स्वीकार करते हुए लिखित क्षमा मांगी। लिहाजा यह फर्जीवाड़ा करते हुए वित्त नियंत्रक ने कुलपति के अधिकारों पर अतिक्रमण कर लिया।

सीमा से बाहर जाकर लगाया आक्षेप

समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि ज्येष्ठ संपरीक्षक जेएल वर्मे ने वरिष्ठों के बिना आदेश के अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर अंकेक्षण कर अपनी रिपोर्ट दी है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में अभिलेखों का अवलोकन किए बगैर आक्षेप लगाए हैं। उन्हें वर्ष 2022-23 का अंकेक्षण करने का दायित्व और अधिकार नहीं दिया गया था, तो आंकड़े कहां से प्राप्त किए यह आश्चर्य का विषय है। वर्मे से स्पष्टीकरण मांगा गया परंतु जवाब संतोषजनक नहीं रहा।

इधर, यह चर्चा है कि एफडीआर घोटाले का झूठा आरोप लगाकर चिकित्सा विश्वविद्यालय, कुलपति आदि की क्षवि धूमिल करने का प्रयास किया गया। कमेटी की रिपोर्ट से इन आरोपों पर पानी फिर गया है। वित्त विभाग द्वारा की गई जांच में भी कोई घपले की बात नहीं पाई गई।