Chaitra Navratri 2024 : मैहर की मां शारदा के दर्शन की लालसा से आए दूर दूर से आ रहे भक्‍त

Chaitra Navratri 2024 : कोई बिहार से, तो कोई उत्तर प्रदेश से और कोई मध्य प्रदेश के अंतिम छोर से दर्शन की लालसा से आया।

By Shyam Mishra

Publish Date: Mon, 15 Apr 2024 08:49 AM (IST)

Up to date Date: Mon, 15 Apr 2024 09:05 AM (IST)

Chaitra Navratri 2024 : मैहर की मां शारदा के दर्शन की लालसा से आए दूर दूर से आ रहे भक्‍त

HighLights

  1. नवरात्रि के अस्सी हजार दर्शनार्थियों ने किए दर्शन।
  2. टोलियों में माता के जयकारे लगाते आगे बढ़ते रहे।
  3. दाहिने हाथ की वरमुद्रा से सभी को वर प्रदान करती हैं।

Chaitra Navratri 2024 : नईदुनिया प्रतिनिधि, मैहर। सुबह से ही रेल्वे स्टेशन, बस स्टैंड, बाजार, मन्दिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिली। सतना रोड,कटनी रोड, रीवा रोड की तरफ से मैहर मन्दिर की ओर बढ़ते हुए बरबस ही ऐसे श्रद्धालु आपका ध्यान खींच लेंगे, जो बैग टांगे पैदल बढ़ते चले जा रहे हैं। दो-दो की संख्या में, तीन-तीन लोग, टोलियों में माता के जयकारे लगाते आगे बढ़ते रहे। कोई बिहार से, तो कोई उत्तर प्रदेश से और कोई मध्य प्रदेश के अंतिम छोर से दर्शन की लालसा से आया। पैदल चलते श्रद्धालुओं में बस माता के जयकारे की धुन है। मां दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है। भयानक स्वरूप वाली अवश्य हैं परंतु दुःख, भय को हरने वाली बहुत सरल हृदया हैं।

naidunia_image

त्रिनेत्रधारिणी माँ कालरात्रि की उपासना आज

मां दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है। उनका शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं जो ब्रम्हाण्ड के सद्श गोल है। इनसे विद्युत के समान चमकीली किरणें निःसृत होती रहती हैं। इनकी नासिका के श्वास प्रश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालाएं निकलती रहती हैं। इनका वाहन गर्दभ (गधा) है। ऊपर उते हुए दाहिने हाथ की वरमुद्रा से सभी को वर प्रदान करती हैं। दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। बायें तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग (कटार) है।

मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक

पं. मोहनलाल द्विवेदी ने बताया कि मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है। लेकिन यह सदैव शुभ फल ही देने वाली है। इसी कारण इनका नाम शुभंकरी भी है। अतः इनके भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है। दुर्गा पूजा के सातवें दिन मां कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन सहस्त्रार चक्र में स्थित रहता है। उसके लिए ब्रम्हाण्ड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगते हैं। इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है। इनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का यह भागी हो जाता है। उसके समस्त पापों विघ्नों का नाश हो जाता है। उसे अक्षय, पुण्य लोकों की प्राप्ति होती है।

माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाष करने वाली है

दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह बाधाओं को भी दूर करने वाली है। इनके उपासक को अग्नि-भय जल-भय, शत्रु – भय, रात्रि भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय मुक्त हो जाता है। माँ कालरात्रि के स्वरूप विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करके मनुष्य को एक निष्ठ भाव से उनकी उपासना करनी चाहिए। यम, नियम, संयम, का उसे पूर्ण पालन करना चाहिए। मन्‌वचन, एवं काया की पवित्रता रखनी चाहिए। यह शुभकरी देवी है। इनकी उपासना से होने वाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती। हमें निरंतर इनका स्मरण ध्यान और पूजा करना चाहिए।

पूजन विधान

पं. द्विवेदी ने बताया कि सर्वप्रथम मां कालरात्रि की प्रतिमा/चित्र, स्थापित कर चौकी पर लाल वस्त्र बिछा कर कालरात्रि यंत्र रखे। अखण्ड दीप अवश्य जलता रहे। हांथ में पुष्प लेकर माता का ध्यान करें- कराल रूपा कांलाब्जा समानाकृति विग्रहा।

कालरात्रि शुभं दधाद देवी चण्डाट्टहासिनी ।।

हांथ में लिये पुष्प मां कालरात्रि के चरणों में अर्पित कर माता एवं यंत्र का पंचोपचार पूजन कर नैवेद्य अर्पित करें। लीं क्रीं हुं मंत्र की सात माला जप करे। अपनी मनोकामना हेतु माँ से विनय कर माँ की पूर्ण श्रृद्धा भाव से आरती करें। माँ कालरात्रि भयानक स्वरूप वाली अवश्य हैं परंतु दुःख, भय को हरने वाली बहुत सरल हृदया हैं।