Soorma Bhopali | Sholay Soorma Bhopali (Jagdeep) Fascinating Info | अनाथालय में काम करके मां ने थी जगदीप की परवरिश: फिल्मों में आने से पहले टिन के कारखाने में काम किया, तो कभी साबुन-पतंग बेचे

Soorma Bhopali | Sholay Soorma Bhopali (Jagdeep) Fascinating Info | अनाथालय में काम करके मां ने थी जगदीप की परवरिश: फिल्मों में आने से पहले टिन के कारखाने में काम किया, तो कभी साबुन-पतंग बेचे

5 मिनट पहलेलेखक: अरुणिमा शुक्ला

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शोले में सूरमा भोपाली का किरदार अमर करने वाले जगदीप की आज 85वीं बर्थ एनिवर्सरी है। 7 दशक के एक्टिंग में उन्होंने करीब 400 फिल्मों से लोगों को हंसाने का काम किया, लेकिन असल में जिंदगी में संघर्ष से अछूते नहीं रहे।

भारत-पाक बंटवारे में हुए दंगों में उनके पिता मारे गए। फिर मां ने अनाथाश्रम में काम करके उन्हें पाला। मां की मदद करने के लिए 7-8 साल की उम्र से ही सड़कों पर गुब्बारे बेचे, टिन, पतंग और साबुन की फैक्ट्री में काम किया। इसी दौरान उनका रिश्ता फिल्मों से जुड़ा। फिर चाइल्ड आर्टिस्ट से शुरुआत कर उन्होंने फिल्मों में लीड किरदार निभाने तक का सफर तय किया।

फिल्मों के जैसे ही जगदीप की पर्सनल लाइफ भी फिल्मी रही। बेटे को देखने आई लड़की की बड़ी बहन को ही दिल दे बैठे और शादी भी की।

आज जगदीप की 85वीं बर्थ एनिवर्सरी पर पढ़िए उनकी जिंदगी के कुछ अनकहे किस्से…

भारत-पाकिस्तान विभाजन के दंगे में पिता की मौत हुई
जगदीप का जन्म मध्य प्रदेश के दतिया में 29 मार्च 1939 को एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनकी परवरिश बहुत ठाट-बाट से हुई, लेकिन ये खुशियां बस चंद दिनों की ही थीं।

दरअसल, ये दौर भारत-पाकिस्तान विभाजन का था। जगदीप के परिवार को भी विभाजन का दंश झेलना पड़ा। इसी दंगे ने उनके सिर से पिता का साया छीन लिया। इस घटना के बाद परिवार में तंगी का आलम शुरू हो गया। नतीजतन, मां को छोटे जगदीप के साथ काम की तलाश में मुंबई का रुख करना पड़ा।

पढ़ाई छोड़ टिन के कारखाने में काम किया
मुंबई पहुंचने के बाद कुछ दिनों तक जगदीप की मां को कोई काम नहीं मिला। खाने-रहने हर चीज की दिक्कत लगी रही। हालांकि जल्द ही उनका यह संघर्ष खत्म हो गया। जगदीप की मां को अनाथालय में खाना बनाने का काम मिल गया। इस वजह से सुबह से शाम तक उन्हें वहां काम करना पड़ता था।

मां की यह हालत जगदीप को बहुत परेशान करती थी। एक दिन उन्होंने हमउम्र बच्चों को गुब्बारे बेचते देखा। वहीं उन्होंने कुछ बच्चों को टिन के कारखानों में काम करते हुए देखा। यह देख उनके मन में भी काम करने की इच्छा जगी। उन्होंने ठान लिया कि वो भी इसी तरह कमाई करके अपनी मां की मदद करेंगे। इसके लिए उन्होंने पढ़ाई भी छोड़ने का मन बना लिया।

जब यह बात मां को पता चली तो वह बहुत गुस्सा हुईं। हालांकि बहुत मनाने के बाद मान भी गईं। इसके बाद जगदीप एक टिन की फैक्ट्री में काम करने लगे। बाद में साबुन बेचने से लेकर पतंग बनाने तक का काम किया।

इस दौरान एक होटल का मालिक उन्हें और उनके दोस्तों को सूखे पाव के साथ हरी मिर्च खाने के लिए दे दिया करता था। जगदीप अपने दोस्तों के साथ मिलकर उस मिर्च को पीस कर सूखे पाव के साथ चाव से खा लेते थे।

यह सीन फिल्म अफसाना का है, जो जगदीप के करियर की पहली फिल्म थी। फिल्म में उन्होंने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम किया था।

यह सीन फिल्म अफसाना का है, जो जगदीप के करियर की पहली फिल्म थी। फिल्म में उन्होंने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम किया था।

सिर्फ 3 रुपए के लिए फिल्म में काम करने को राजी हुए
1950 के दशक में बी.आर.चोपड़ा फिल्म अफसाना बनाने की तैयारी कर रहे थे। फिल्म के लिए उन्हें कुछ चाइल्ड आर्टिस्ट की जरूरत थी। इसी खोज में कास्टिंग टीम कई दिनों से परेशान थी। एक दिन उनकी नजर जगदीप पर पड़ी। सीन के हिसाब से जगदीप बिल्कुल सही मालूम पड़े।

चोपड़ा की कास्टिंग टीम ने उनसे फिल्मों में काम करने के लिए पूछा। भोले जगदीप ने इससे पहले ना फिल्मों के बारे में सुना था और ना ही कोई फिल्म देखी थी। फिर उन्होंने पूछा कि अगर वो काम के लिए राजी हो जाते हैं, तो उन्हें कितना मेहनताना मिलेगा। जवाब मिला- 3 रुपए। इतना सुनते ही जगदीप ने फिल्म में काम करने के लिए हां कर दी।

हुनर की बदौलत पहली फिल्म में 3 नहीं बल्कि 6 रुपए मिले
पहले दिन जगदीप मां के साथ सेट पर गए। जिस सीन में उन्हें काम करना था, उसमें बच्चों के चल रहे नाटक में बच्चों के साथ ही बैठकर ताली बजाना था। उस नाटक में एक बच्चे को उर्दू की एक लंबी लाइन बोलनी थी, लेकिन वो लड़का बार-बार अटक जा रहा था।

यह काम जगदीप को बहुत आसान लगा। उन्होंने बगल में बैठे लड़के से पूछा- अगर यह मैं कर दूं, तो इस काम के लिए कितने पैसे मिलेंगे।

लड़के ने बताया कि बहुत पैसे मिलेंगे। पैसों की जरूरत की वजह से उन्होंने जाकर वो लाइन बोल दी। उर्दू अच्छी थी इसलिए उन्होंने एक टेक में पूरी लाइन बोल दी। फिर इस काम के लिए उन्हें 6 रुपए मिले। फिल्म अफसाना के रोल से जगदीप को पॉपुलैरिटी मिली जिसके बाद उन्होंने लैला मजनू, फुटपाथ जैसी फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम किया।

रोने की बदौलत बिमल रॉय की फिल्मों में काम मिला
फिल्म धोबी डॉक्टर में जगदीप ने किशोर कुमार के बचपन का रोल निभाया था। फिल्म के एक सीन में उन्होंने रोने का शॉट दिया था। इस सीन में जगदीप की परफॉर्मेंस इतनी कमाल की थी कि डायरेक्टर बिमल रॉय उनके काम के फैन हो गए।

फिर उन्होंने जगदीप से मुलाकात की। मुलाकात के दौरान जगदीप ने बातों से भी उन्हें लुभा लिया। फिर क्या था, बिमल रॉय ने उन्हें दो बीघा जमीन में काम करने का ऑफर दे दिया। इसके बाद दोनों ने साथ में कई फिल्मों में काम किया।

पं. जवाहरलाल नेहरू ने गिफ्ट में अपनी छड़ी दी थी
जगदीप ने मुन्ना, अब दिल्ली दूर नहीं है, हम पंछी एक डाल के जैसी फिल्म में बाल कलाकार के तौर पर काम किया था, जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया था। इन फिल्मों को तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने भी देखा और फिल्म में काम कर चुके सभी चाइल्ड आर्टिस्ट को नाश्ते पर बुलाया।

पं. नेहरू ने बच्चों को नाश्ते के साथ गुलदस्ता भी दिया, लेकिन जब जगदीप का नंबर आया तो गुलदस्ते खत्म हो गए। इस पर प्रधानमंत्री ने उनसे कहा- जगदीप फिल्मों में तुम्हारी एक्टिंग शानदार थी, मुझे बहुत पसंद आई। फिलहाल तो गुलदस्ते खत्म हो गए हैं, लेकिन मैं चाहता हूं कि तुम मेरी छड़ी इस सम्मान के तौर पर रख लो। प्रधानमंत्री नेहरू की दी हुई छड़ी को जगदीप ने ताउम्र संभाल कर रखा।

ये फिल्म ब्रह्मचारी (1968) का पोस्टर है। इसमें जगदीप ने पहली बार कॉमेडी रोल किया था, जिसके बाद से उन्हें कॉमेडी फिल्में ऑफर होने लगी थीं।

ये फिल्म ब्रह्मचारी (1968) का पोस्टर है। इसमें जगदीप ने पहली बार कॉमेडी रोल किया था, जिसके बाद से उन्हें कॉमेडी फिल्में ऑफर होने लगी थीं।

सहारा बने के. आसिफ, खुद के पास नहीं थे पैसे, फिर भी मदद की
फिल्म इंडस्ट्री में डायरेक्टर के. आसिफ की दरियादिली के किस्से बहुत फेमस थे। उन्होंने एक बार जगदीप को फिल्म ऑफर की। लोगों ने जगदीप से उनकी दरियादिली का हवाला देते हुए कहा कि वो डायरेक्टर से अधिक फीस की ही डिमांड करें।

जगदीप ने उनसे मुलाकात की।

के. आसिफ ने उनसे पूछा- फिल्म में काम करने के लिए कितनी फीस लेंगे?

जवाब में जगदीप ने कहा- 2500 रुपए।

इस पर आसिफ बोले- तुम्हें अपनी सही कीमत नहीं पता है। इस रोल के लिए तुम्हें मैं 3500 रुपए दूंगा।

इसके बाद के. आसिफ ने उन्हें 500 रुपए देकर भेज दिया और कहा- जब बाकी पैसों की जरूरत हो, तो आकर मांग लेना।

आसिफ की इस हरकत से जगदीप को बहुत खुशी मिली। फिर शूटिंग शुरू हुई। इस दौरान जब भी उन्हें पैसे की जरूरत होती थी, वो के. आसिफ से जाकर मांग लेते थे। उनकी इस हरकत से आसिफ का नौकर बहुत गुस्सा होता था। एक दिन उसने जगदीप को रोक कर कहा- तुम बार-बार क्यों चले आते हो पैसे मांगने। क्या तुम्हें पता नहीं कि फिल्म की बाकी शूटिंग अब कभी नहीं होगी। किसी वजह से उसे रोक दिया गया है।

के. आसिफ एकमात्र ऐसे डायरेक्टर थे, जिन्होंने अपने करियर में 2 फिल्में डायरेक्ट की थीं। हिंदी सिनेमा की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक मुगल-ए-आजम भी इन्हीं की देन है।

के. आसिफ एकमात्र ऐसे डायरेक्टर थे, जिन्होंने अपने करियर में 2 फिल्में डायरेक्ट की थीं। हिंदी सिनेमा की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक मुगल-ए-आजम भी इन्हीं की देन है।

ये सुनकर जगदीप को बहुत बुरा लगा कि फिल्म बंद हो जाने के बावजूद के. आसिफ उनकी मदद करते रहे। इसके बाद उन्होंने फैसला किया कि वो दोबारा कभी भी पैसे मांगने नहीं आएंगे। हालांकि एक दिन उन्हें कुछ पैसों की सख्त जरूरत थी। आखिरकार उन्हें मजबूरी में के. आसिफ के पास जाना पड़ा क्योंकि उन्हें पता था कि इस मुसीबत के समय में वहीं उनकी मदद करेंगे।

वो गए और के. आसिफ ने उन्हें 50 रुपए दे दिए। फिर उनके नौकर ने जगदीप को टोका और कहा- तुम फिर आ गए। के. आसिफ और उनकी पत्नी के पास यही 50 रुपए थे, जो उन्होंने तुम्हें दे दिए। इस बात का पछतावा जगदीप को ताउम्र रहा। इस घटना को याद करते हुए वो अक्सर कहते थे कि के. आसिफ जैसा महान और दिलदार डायरेक्टर ही मुगल-ए-आजम जैसी फिल्म बना सकता था।

किस्सा सूरमा भोपाली बनने का
फिल्म शोले में जगदीप सूरमा भोपाली के रोल में दिखे थे। ये रोल इतना पसंद किया गया कि जगदीप को लोग सूरमा भोपाली के नाम से जानने लगे। वहीं उनको ये रोल मिलने का किस्सा भी बड़ा मजेदार है। दरअसल, ‘सूरमा भोपाली’ का किरदार भोपाल के फॉरेस्ट ऑफिसर नाहर सिंह पर आधारित था।

भोपाल में अरसे तक रहे जावेद अख्तर ने नाहर सिंह के किस्से सुन रखे थे, इसलिए जब उन्होंने सलीम के साथ फिल्म ‘शोले’ लिखना शुरू किया, तो कॉमेडी के लिए नाहर सिंह से मिलता-जुलता किरदार ‘सूरमा भोपाली’ तैयार कर दिया।

फिल्म शोले में जगदीप सूरमा भोपाली के रोल में दिखे थे। उन्होंने अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र के साथ स्क्रीन शेयर किया था।

फिल्म शोले में जगदीप सूरमा भोपाली के रोल में दिखे थे। उन्होंने अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र के साथ स्क्रीन शेयर किया था।

एक दिन जावेद अख्तर ने उन्हें फिल्म शोले की कहानी सुनाई। जगदीप को लगा कि दोस्ती की वजह से उन्हें काम मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

फिल्म की लगभग पूरी शूटिंग हो गई, तब एक दिन अचानक उन्हें डायरेक्टर रमेश सिप्पी का फोन आया। उन्होंने जगदीप को फिल्म में सूरमा भोपाली का रोल ऑफर किया। इस पर जगदीप ने कहा कि फिल्म की शूटिंग तो पूरी हो गई। तब सिप्पी ने कहा कि अभी कुछ सीन्स की शूटिंग बाकी है। इसके बाद उन्होंने सूरमा भोपाली का रोल निभाया, जो आज भी अमर है।

शोले और सूरमा भोपाली का रोल, दोनों ही हिट रहे। इस सक्सेस के बाद जगदीप ने इसी किरदार पर फिल्म सूरमा भोपाली बनाने के बारे में सोचा। उन्होंने ये फिल्म बनाई भी, जो 1988 में रिलीज हुई थी। ये भारत के बहुत से राज्य में फ्लॉप रही, लेकिन मध्य प्रदेश में इस फिल्म के प्रशंसक बड़ी तादाद में रहे।

3 शादियां कीं, 6 बच्चों के पिता बने
जगदीप की पर्सनल लाइफ भी कम फिल्मी नहीं है। उन्होंने 3 शादियां की थीं, जिससे उन्हें 6 बच्चे हुए थे। पहली पत्नी नसीम बेगम, दूसरी सुघ्र बेगम और तीसरी नजीमा थीं। तीसरी पत्नी से शादी करने का किस्सा भी अलग ही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जगदीप के बेटे को लड़की वाले देखने आए थे, लेकिन बेटे नावेद को शादी नहीं करनी थी।

जिस लड़की का रिश्ता आया, उसकी बड़ी बहन जगदीप को पहली नजर में ही पसंद आ गई। उन्होंने उस लड़की को प्रपोज भी किया, जिसके बाद दोनों की शादी हो गई। इस शादी से उन्हें बेटी मुस्कान जाफरी है।

जगदीप के ज्यादा शराब पीने से परेशान रहते थे बेटे जावेद जाफरी
जगदीप के दूसरे बेटे जावेद जाफरी भी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स का दावा था कि जाफरी और जगदीप के बीच रिश्ते अच्छे नहीं थे। वजह ये थी कि एक समय ऐसा था कि जगदीप बहुत ज्यादा शराब पीने लगे थे और उन्हें जुए की भी लत लग गई थी। उनकी ये आदत जाफरी को बिल्कुल भी पसंद नहीं थी, जिस वजह से आए दिन उनके बीच बहस होती रहती थी। उन्होंने जगदीप को बहुत बार मना भी किया था। हालांकि कुछ समय बाद दोनों के रिश्ते पहले से बेहतर हो गए।

81 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा
81 साल की उम्र में जगदीप बीमारियों से जूझ रहे थे। कोरोना लॉकडाउन के दौरान वो काफी कमजोर हो गए थे। आखिरकार 8 जुलाई 2020 को वो अपने पीछे 6 बच्चों और नाती-पोतों से भरा परिवार छोड़कर दुनिया को अलविदा कह गए।

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