Lok Sabha Election 2024: रियासतकालीन बस्तर के इतिहास की चर्चा बहुमुखी प्रतिभा के धनी स्वर्गीय महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव के बिना अधूरी है। बस्तर के आदिवासियों के दिलों में आज भी वह जिंदा है।
By Ashish Kumar Gupta
Publish Date: Sat, 23 Mar 2024 03:52 PM (IST)
Up to date Date: Sat, 23 Mar 2024 03:52 PM (IST)
HighLights
- – प्रवीरचंद के समर्थन से 1952 में मुचाकी और 1962 में लखमू बने थे निर्दलीय सांसद
- – प्रवीरचंद ने जिसकी अंगुली थामी, वही बस्तर से संसद की सीढ़ी चढ़ जाता
विनोद सिंह/जगदलपुरl Lok Sabha Election 2024: रियासतकालीन बस्तर के इतिहास की चर्चा बहुमुखी प्रतिभा के धनी स्वर्गीय महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव के बिना अधूरी है। बस्तर के आदिवासियों के दिलों में आज भी वह जिंदा है। बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के सेवक (माटी पुजारी) प्रवीरचंद भंजदेव की राजनीति में भी मजबूत पकड़ थी। जब तक वे जीवित रहे बस्तर में चुनावी राजनीति उनके ही इर्द-गिर्द घूमती रही थी। उनके बारे में प्रचलित हो गया था कि जिसकी उन्होंने अंगुली थामी, वही बस्तर से संसद की सीढ़ी चढ़ जाता था। आगामी 25 मार्च को उनकी पुण्यतिथि है।
देश की आजादी के बाद 1952 में हुए पहले आम चुनाव से ही कांग्रेस ने देश के अधिकांश क्षेत्रों में अपना दबदबा कायम कर लिया था, लेकिन उस समय बस्तर सहित कुछ ही ऐसे क्षेत्र बच गए थे, जहां कांग्रेस की दाल नहीं गली। कांग्रेस के बड़े नेताओं और बस्तर के तत्कालीन महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव के बीच कई विषयों पर गंभीर वैचारिक मतभेद थे। इसका परिणाम कांग्रेस को चुनावों में भुगतना पड़ा था।
प्रवीरचंद भंजदेव के समर्थन से चुने गए थे दो निर्दलीय सांसद
प्रवीरचंद भंजदेव राजमहल गोलीकांड में 1966 में मारे गए थे। उस समय वे 37 वर्ष के थे। इसके पहले 1952 से लेकर 1962 के बीच हुए तीन लोकसभा चुनावों में बस्तर से दो बाद निर्दलीय और एक बार कांग्रेस का सांसद चुना गया था। 1952 में मुचाकी कोसा और 1962 में लखमू भवानी प्रवीरचंद भंजदेव के समर्थन से निर्दलीय सांसद चुने गए थे।
1957 में प्रवीर को कांग्रेस ने अपने पाले में मिला लिया, तभी कांग्रेस के सुरती क्रिस्टैया सांसद चुनाव जीत सके थे। भंजदेव के निधन के बाद भी चुनावी वैतरणी पार करने एक दो चुनावों तक निर्दलीय प्रत्याशी उनके नाम का सहारा लेने की कोशिश करते दिखे थे। 1967 के लोकसभा चुनाव में बस्तर राजपरिवार का समर्थन बताकर निर्दलीय प्रत्याशी झाडू सुंदरलाल सांसद निर्वाचित हुए थे। इसी से उनके प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है।
लगातार तीन बार निर्दलीय सांसद चुने गए
बस्तर सीट से 1952 से 1971 के बीच हुए पांच लोकसभा चुनावों में चार बार निर्दलीय को सांसद बनने का अवसर मिला। एक बार ही कांग्रेस के खाते में यह सीट आई थी। अविभाजित मध्य प्रदेश में बस्तर इकलौती सीट थी जहां 1962 से 1971 तक लगातार तीन बार निर्दलीय सांसद बने थे।
नेहरू को आना पड़ा था बस्तर
1952 के पहले आम चुनाव में बस्तर सीट से कांग्रेस की करारी हार के बाद कांग्रेस को समझ में आ गया था कि प्रवीरचंद भंजदेव के समर्थन के बिना उसकी दाल बस्तर में नहीं गलने वाली है। 1955 में तृतीय राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन के लिए बस्तर को चुना गया। जिसका उद्घाटन करने 13 मार्च को देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जगदलपुर आए थे।






