लोगों का कहना है कि होली के दिन देवता को हरवा मिठाई का भोग लगाया जाता है। पूजा के बाद एक दूसरे को हरवा का माला पहनाते हैं।
By Atul Vasing
Publish Date: Sat, 23 Mar 2024 07:23 AM (IST)
Up to date Date: Sat, 23 Mar 2024 07:23 AM (IST)
HighLights
पहन कर बच्चों को मिलती है ख़ुशी
हरवा माला बनाती है होली को खास आपसी भाई-चारा का प्रतीक माना जाता है
बताशा के मीठे हरवा माला, है हमारी पुरानी परंपरा
नईदुनिया न्यूज, बिलासपुर । उत्साह, उमंग व रंगों का त्योहार है होली। हर उम्र के लोग इसे बड़े उत्साह से मनाते है। इसी वजह से क्षेत्र विशेष होली की अलग-अलग परंपरा रहती है। इसी तरह हमारे छत्तीसगढ़ में मीठे हरवा माला (बताशे की मीठाई) पहनने और इसे भाई-चारा के प्रतीक के रूप में एक दूसरे को हरवा माला पहनाना और उसमें गुथे बताशे को खिलाने की परंपरा है। खास बात यह है कि आज भी यह परंपरा जीवित है। इसी वजह से होली बाजार में हरवा मिठाई की दुकान भी सज गई है और हरवा मिठाई की माला एक दूसरे को पहनाकर और खिलाकर इस पर्व की शुरूआत करते हुए रंगों की होली मनाएंगे। होली में रंगों का जितना महत्व है। उतना ही महत्व छत्तीसगढ़ की पारंपरिक मीठाई हरवा का भी है।
बदलते दौर में भले ही प्रचलन कम हो गया हो लेकिन शक्कर की बनी इस बताशे वाली हरवा हार की मिठास अभी भी कम नहीं हुई है। यही वजह है कि अभी भी कई दुकानों में हरवा की मिठाई सज गई है। शहर के गोलबाजार, शनिचरी बाजार, देवकीनंदन चौक, मुंगेली नाका रोड के साथ शहर के अन्य प्रमुख स्थल में इसकी दुकान लग चुकी है। शनिचरी बाजार स्थित गौरीशंकर चना वाला वाले के संचालक राजकुमार साहु बताते है कि हमारी दुकान 1950 से चल रही है और लगातार 75 साल से हरवा माला बनाते आ रहे हैं।
वर्तमान में इस परंपरा को बनाकर रखे हुए है। हरवा माला इसलिए भी पहनते है कि जब होली के दिन लोग एक-दूसरे को होली की शुभकामनाएं देने के लिए एक-दूसरे के घर जाते है तो उस समय वे अपने गाला में इस माला का धारण करते है और इसे एक-दूसरे को भेंट करते है। जो होली को और भी खास बनाती है। बाक्स मुंह में घोलती है मिठास कहते है कि जिस तरह शक्कर से बनी हरवा मिठाई लोगों के मुंह में मिठास लाती है। उसी तरह लोगों को लड़ाई व मारपीट छोड़कर आपसी भाईचारे के साथ होली मनानी चाहिए। होली के दिन लोग एक दूसरे को हरवा का हार पहनना कर होली का त्योहार मनाते हैं। बड़ों से आशीर्वाद लेते है। यह परंपरा पुराने समय से चली आ रही है।
इसलिए हरवा माला है खास
लोगों का कहना है कि होली के दिन देवता को हरवा मिठाई का भोग लगाया जाता है। पूजा के बाद एक दूसरे को हरवा का माला पहनाते हैं। इसके बाद होली खेलने की शुरुआत होती है। लेकिन आधुनिकता के इस दौर में अब इसका चलन कम हो गया है। बुजुर्ग ही इस परंपरा की संजोकर रखे हुए हैं। वहीं जागरूक लोगों का मानना है कि विलुप्त हो रहे ऐसी परंपराओं को जीवित रखने के लिए शासन स्तर पर ठोस प्रयास करने की जरूरत है। इसके साथ ही इसे पाठ्यक्रम में शामिल भी किया जाना चाहिए। ताकि आने वाली पीढ़ी को भी इसकी जानकारी मिल सके।
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वर्ष 2010 में गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर से ग्रेजुएशन किया है। तत्पश्चात शिक्षा एवं कार्य को आगे बढ़ते हुए मैं दैनिक प्रजापति, इवनिंग टाइम्स एवं लोकस्वर में पत्रकारिता करियर की शुरुआत की 2012—13 मैंन …