Mathura Lok Sabha Seat 2024: कान्हा की नगरी में बस एक ही बात, अयोध्या सजा दी, काशी भी सजा दी, अब मथुरा भी सजाएंगे
Mathura Lok Sabha 2024 अब इस बार फिर भाजपा और रालोद साथ में चुनाव लड़ रहे हैं और भाजपा ने एक बार फिर से हेमा मालिनी पर ही दांव लगाया है।
By Sandeep Chourey
Publish Date: Tue, 19 Mar 2024 09:16 AM (IST)
Up to date Date: Tue, 19 Mar 2024 09:16 AM (IST)

HighLights
- मथुरा सीट को साल वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर से छीन लिया।
- वर्ष 2009 में रालोद से जयंत चौधरी मैदान में उतरे, तब भाजपा ने उनका समर्थन किया था।
- 2014 में रालोद और भाजपा ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था तो जयंत चौधरी को हेमा मालिनी के सामने हार का सामना करना पड़ा।
विनीत मिश्र, मथुरा। कान्हा की नगरी मथुरा में इन दिनों एक अलग ही सियासी बयार बह रही है। हर तरह यह चर्चा बुलंद है कि अयोध्या भी सजा दी गई है , काशी भी सजा दी है और अब मथुरा भी सजा देंगे। बाबा विश्वनाथ का भव्य धाम बनने और अयोध्या में भव्य, दिव्य राम मंदिर में रामलला के विराजमान होने के बाद अब सभी की नजरें मथुरा पर टिकी है।
बृजवासी के दिल में कान्हा
मथुरा में जाटों का प्रभाव ज्यादा देखने को मिलता है। सबसे खास बात ये हैं कि इस इलाके में जातिवाद का असर भी दिखाई नहीं दे रहा है। मथुरा की राजनीतिक हवा इस बार काफी ज्यादा बदली हुई है। बीते 5 साल की बात की जाए तो यहां काफी कुछ बदलाव आया है। ब्रजवासी जितने मृदुभाषी हैं, उतने ही कान्हा के अनन्य भक्ति में डूबे हुए भी हैं। अयोध्या का वैभव लौटने के बाद ब्रजवासियों का मन भी यमुना की तरह हिलोरें ले रहा है।
इस बारे में चर्चा करते हुए वृंदावन के अटल्ला चुंगी निवासी राधेश्याम शर्मा का कहना है कि यहां की सियासत में जातिवाद कहीं नहीं दिखता है, क्योंकि यहां सबसे ऊपर तो कान्हा ही है। उनका कहना है कि काशी, अयोध्या के बाद मथुरा की चर्चा चल रही है क्योंकि भाजपा नेताओं की कार्यशैली और उनके भाषण कृष्ण जन्मभूमि के अपने एजेंडे में होने का संकेत दे रहे हैं।
राधेश्याम शर्मा के विचारों पर सहमति जताते हुए एक अन्य बुजुर्ग रविशंकर का भी कहना है कि बीते साल नवंबर में नरेंद्र मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने जन्मभूमि में दर्शन किए। योगी आदित्यनाथ भी अपने कार्यकाल के दौरान यहां कई बार दर्शन के लिए आ चुके हैं। ये साफ संकेत मिलते हैं कि कृष्ण जन्मभूमि भाजपा के एजेंडे में है।
मथुरा में विकास बड़ा मुद्दा
वृंदावन के रुक्मिणी विहार में रहने वाले सेवानिवृत्त शिक्षक विनोद गौतम का कहना है कि मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि के साथ-साथ विकास भी बड़ा मुद्दा है। बीते 5 साल में इस तीर्थ क्षेत्रों में बहुत अधिक विकास हुआ है। जाट समाज से सीधा जुड़ाव न रखने वाली हेमा मालिनी मथुरा से दो बार लोकसभा चुनाव जीत चुकी है।
मथुरा में ही डीग गेट चौराहा पर अपनी दुकान लगाने वाले फल व्यापारी सेवकराम की राजनीति में बहुत रुचि नहीं है, लेकिन बात निकली तो वे भी कहते हैं कि राम और कृष्ण तो हमारे दिल में हैं। उनका कहना है कि साल 1991 में राम मंदिर आंदोलन जब चरम पर था, तब बाहर से आए प्रत्याशी डॉ. स्वामी सच्चिदानंद हरि साक्षी यहां से सांसद चुने गए। इसके बाद मथुरा सीट पर 1991 के बाद फिर 1996, 1998 और 1999 में भी भाजपा के चौधरी तेजवीर सिंह चुनाव जीते।
2009 में जयंती चौधरी की जीत
मथुरा सीट को साल वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर से छीन लिया। वर्ष 2009 में रालोद से जयंत चौधरी मैदान में उतरे, तब भाजपा ने उनका समर्थन किया था। तब जयंत पौने 2 लाख वोटों से चुनाव जीते। 2014 में रालोद और भाजपा ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था तो जयंत चौधरी को हेमा मालिनी के सामने हार का सामना करना पड़ा।
जयंत चौधरी को करीब सवा 3 लाख वोटों से करारी शिकस्त मिली। इसके बाद साल 2019 में फिर भाजपा ने हेमा मालिनी को मैदान में उतारा और रालोद के कुंवर नरेंद्र सिंह को करीब 3 लाख वोटों से हराया। अब इस बार फिर भाजपा और रालोद साथ में चुनाव लड़ रहे हैं और भाजपा ने एक बार फिर से हेमा मालिनी पर ही दांव लगाया है।


