Lok Sabha Elections 2024: भविष्य को गढ़ने में स्कूली शिक्षा अहम, फिर भी राजनीतिक चिंतन से दूर
Lok Sabha Elections 2024: चुनावी मुद्दे के रूप में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, विद्यार्थियों की सुविधाओं, शिक्षकों की प्रोफेशनल ट्रेनिंग को लेकर कभी नहीं होती है बात।
By Sameer Deshpande
Publish Date: Tue, 19 Mar 2024 09:49 AM (IST)
Up to date Date: Tue, 19 Mar 2024 09:49 AM (IST)

HighLights
- लोकसभा चुनाव को लेकर आचार संहिता लगते ही चुनावी बिगुल फूंका जा चुका है।
- देश का भविष्य गढ़ने वाले स्कूली शिक्षा की बेहतरी को लेकर लोकसभा चुनाव में आज तक किसी दल ने मुद्दा नहीं उठाया।
- दिल्ली और पंजाब जैसे राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में स्कूली शिक्षा को ही मुख्य मुद्दा बनाया गया था।
Lok Sabha Elections 2024: संजय रजक, इंदौर। लोकसभा चुनाव को लेकर आचार संहिता लगते ही चुनावी बिगुल फूंका जा चुका है। अब चुनावी दल लोकसभा क्षेत्र के मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरने लगेंगे, लेकिन देश का भविष्य गढ़ने वाले स्कूली शिक्षा की बेहतरी को लेकर लोकसभा चुनाव में आज तक किसी दल ने मुद्दा नहीं उठाया। न ही अपने घोषणा पत्र में इसका जिक्र किया। दिल्ली और पंजाब जैसे राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में स्कूली शिक्षा को ही मुख्य मुद्दा बनाया गया था।
मप्र शिक्षा के मामले में अन्य प्रदेशों की स्थिति में काफी पीछे चल रहा है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, विद्यार्थियों की सुविधाओं, शिक्षकों की प्रोफेशनल ट्रेनिंग आदि को लेकर कभी बात नहीं होती है। दिल्ली और पंजाब में राजनीतिक दलों ने शिक्षा को ही चुनावी मुद्दों का बनाया और वर्तमान में शिक्षा प्रणाली और स्कूलों को बेहतर किया। बावजूद मप्र में लोकसभा चुनाव में स्कूली शिक्षा कभी मुद्दा नहीं रहा है।
जमीन स्तर पर ध्यान दे जनप्रतिनिधि
यह है स्कूल शिक्षा विभाग से जुड़े मुद्दे
- भवन अभाव में जिले सहित मप्र में कई उमावि और हाई स्कूल, प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के स्कूलों में संचालित हो रहे हैं।
- उत्कृष्ट, माडल स्कूल और अब सीएम राइज स्कूल बनाए गए हैं, लेकिन इन स्कूलों में शैक्षणिक शिक्षकों के कई पद खाली पड़े हुए हैं। इसके कारण स्कूलों की ओर पालकों का ध्यान नहीं जाता है। यहां बड़ा बजट भी खर्च किया जाता है।
- शिक्षकों की नियुक्ति के बाद इन शिक्षकों को अपग्रेड करने के लिए किसी तरह की विशेष ट्रेनिंग नहीं होती है। यही कारण है कि शिक्षक पुराने ढर्रे से ही चल रहे हैं।
- इंदौर सहित प्रदेश में ऐसे कई स्कूल हैं, जहां एक भी नियमित शिक्षक नहीं है। अतिथि शिक्षक के भरोसे ही स्कूल चल रहा है। इसका असर ग्रामीण अंचलों में सबसे ज्यादा है।
- प्राचार्य और व्याख्याताओं के कई जगहों पर पद रिक्त हैं। यहां पर प्रभारियों के भरोसे स्कूल चल रहे हैं।
- अधिकांश स्कूलों में चतुर्थ श्रेणी, लिपिक आदि के पद भी खाली पड़े हैं।
चुनाव में शामिल हो स्कूली शिक्षा का मुद्दा
सेवानिवृत्त प्राचार्य पुष्पेंद्र कानूनगो ने बताया कि स्कूली शिक्षा से ही बेहतर समाज को तैयार किया जा सकता है, लेकिन मौजूदा दौर में इंदौर सहित प्रदेश के कई स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक ही नहीं हैं। कई स्कूल तो अतिथि शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं, जिनकी किसी तरह की जिम्मेदारी तय नहीं होती है। संकुल स्तर पर लिपिक के कई पद खाली पड़े हुए हैं। उच्चतर माध्यमिक विद्यालय स्तर के स्कूलों में विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी है।
स्कूलों का संचालन विद्यार्थियों से जुड़ी सभी सुविधाओं और पूरी क्षमता शुरू किया जाना चाहिए। अगर स्कूली शिक्षा के मुद्दों को राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों में शामिल किया जाए और जीत के बाद उन पर ईमानदारी से काम किया जाए तो समाज को हम बेहतर भविष्य दे पाएंगे।
निजी स्कूलों से बेहतर सुविधाएं
इंदौर सांसद शंकर लालवानी ने बताया कि स्कूली शिक्षा को लेकर बेहतर काम किया जा रहा है। सीएम राइस जैसे अत्याधुनिक स्कूल शुरू किए गए है, जहां पर निजी स्कूलों से बेहतर सुविधाएं मिल रही है। शिक्षकों की भर्ती भी की गई है, लेकिन इसके बावजूद भी स्कूली शिक्षा को लेकर बेहतर कार्य करने की जरूरत है। हम एक ऐसे सिस्टम पर काम करने जा रहे हैं, जिसमें पालक निजी स्कूल छोड़ अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिला दिलाएं। चुनाव बाद इस पर काम भी किया जाएगा।


