Loksabha Election: मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में एक दौर वो था तब डकैत चुनावों की हवा तय करते थे, जिस प्रत्याशी की पीठ पर उनका हाथ होता था, उसे ही सर्वाधिक वोट मिलते थे।
By Bharat Mandhanya
Publish Date: Mon, 18 Mar 2024 10:18 AM (IST)
Up to date Date: Mon, 18 Mar 2024 10:18 AM (IST)
HighLights
- मप्र -उप्र के चुनावों में था डकैतों का प्रभाव
- डकैतों की ओर से जारी किया जाता था फरमान
- प्रत्याशी भी लेते थे डकैतों की मदद
Loksabha Election डिजिटल डेस्क, कानपुर। वैसे तो चुनाव लोगों को अपनी स्वेच्छा से अपना नेता चुनने की स्वतंत्रता देते है, लेकिन मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का एक दौर ऐसा भी था तब नेता जनता नहीं डकैत चुनते थे। डकैत ने जिस प्रत्याशी के सिर पर हाथ रख दिया वही प्रत्याशी चुनाव भी जीतता था। बकायदा डकैतों की ओर से समर्थित प्रत्याशी को वोट देने के लिए फरमान जारी किया जाता था। जिसमें स्पष्ट लिखा होता था ‘वोट पड़ेगा…..पर, नहीं तो लाश मिलेगी घाटी पर। हालांकि अब माहौल बदल चुका है और इन डकैतों का वजूद पूरी तरह से खत्म हो गया है। लिहाजा अब जनता भी खुलकर अपना नेता चुनती है। पढ़िए कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र की सियासत में डकैतों के दखल पर रिपोर्ट!
चित्रकूट में रहा डकैत ददुआ का प्रभाव
चित्रकूट में 1982 से 2007 तक हुए चुनावों में डकैत ददुआ का प्रभाव रहा। उसका यहां के 52 गांवों में दबदबा था। शुरुआत में उसका हाथ वामपंथियों के सिर पर था, लेकिन बाद में ददुआ ने अपने राजनीतिक गुरु के कहने पर बसपा को अपना समर्थन दे दिया। जिसके बाद ददुआ के दम पर बसपा ने चुनाव जीते।
हालांकि ददुआ का बसपा से मोहभंग हो गया और 2004 में वह समाजवादी पार्टी के समर्थन में आ गया। ददुआ के दम पर सपा की क्षेत्र में राजनीति चमक गई। इतना ही नहीं ददुआ के भाई बाल कुमार पटेल, बेटा वीर सिंह पटेल और भतीजे राम सिंह पटेल सपा के टिकट पर सांसद-विधायक तक बने।
साल 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार बनी और इसी के साथ ददुआ के बुरे दिन भी शुरू हो गए। 22 जुलाई, 2007 को एसटीएफ ने मुठभेड़ में ददुआ को मौत के घाट उतार दिया।
चित्रकूट में ददुआ के अलावा इनामी डकैत ठोकिया, रागिया, बलखड़िया, बबली कोल और गौरी यादव की भी तूती बोलती थी। इतना ही नहीं बांदा, फतेहपुर, सतना, रीवा, पन्ना और छतरपुर तक में इनका खासा प्रभाव रहता था।
फर्रुखाबाद, मैनपुरी और एटा के चुनावों में भी दखल
1970 से 1992 का ये वो दौर था जब छविराम यादव का फर्रुखाबाद, मैनपुरी और एटा जैसे क्षेत्रों में दबदबा था। उसका फरमान जारी हाेते ही राजनीतिक माहौल बदल जाता था। फर्रुखाबाद की मोहम्मदाबाद और एटा के अलीगंज क्षेत्र में यादव का खासा दखल रखता था। हालांकि छविराम यादव के मारे जाने के बाद पोथी यादव गैंग का मुखिया बन गया। कायमगंज विधानसभा क्षेत्र में गंगा की कटरी किंग के नाम से मशहूर डकैत कलुआ यादव का प्रभाव था।
चंबल भी नहीं रहा अछूता
उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश का चंबल भी डकैतों से अछूता नहीं रहा। यहां के बीहड़ों में निर्भय गुर्जर, जगजीवन परिहार, रामआसरे फक्कड़, रामवीर सिंह गुर्जर, अरविंद गुर्जर, चंदन यादव, मंगली केवट, रघुवीर ढीमर जैसे बड़े गिरोह की हुकूमत चलती थी।
यहां उम्मीदवार भी अपने पक्ष में माहौल तैयार करवाने के लिए डकैतों की मदद लेने से पीछे नहीं हटते थे। जिस प्रत्याशी के पक्ष में फरमान जारी हो गया, उसे ही सर्वाधिक वोट मिलते थे।
डकैतों का हुआ सफाया
बहरहाल, अब ये दोनों क्षेत्र डकैत विहीन हो चुके हैं। यहां कोई डकैतों का नाम लेने वाला नहीं है और जनता खुलकर मतदान में भाग लेती है।






