आज इस आलेख में हम आपको इसी ईवीएम के बारे में कुछ बातें बताने जा रहे हैं जिसमें इसका इतिहास और विशेषता का उल्लेख होगा।
By Navodit Saktawat
Publish Date: Mon, 18 Mar 2024 12:37 PM (IST)
Up to date Date: Mon, 18 Mar 2024 01:00 PM (IST)
HighLights
- देश में सबसे पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल वर्ष 1982 में केरल राज्य से किया गया था। रखा था।
- इसका आविष्कार दो साल पहले 1980 में एमबी हनीफा ने किया था।
- उन्होंने इसका पंजीयन ‘इलेक्ट्रानिक संचालित मतगणना मशीन’ के नाम से 15 अक्टूबर 1980 को करवाया था।
डिजिटल डेस्क, इंदौर। चुनाव आयोग ने 18वीं लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी है। इसके साथ ही देश में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। ये चुनाव 7 चरणों में होंगे। पहले चरण की वोटिंग 19 अप्रैल एवं आखिरी चरण की वोटिंग 1 जून को होगी। मतगणना 4 जून को होगी। हर बार की तरह इस बार भी मतदान एवं मतगणना की यह पूरी प्रक्रिया ईवीएम यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से संपन्न की जाएगी। यह एक पूर्णत: स्वदेशी मशीन है, जिसे वजूद में आए चार दशक हो चुके हैं। बीते समय की कागजी मतपत्र प्रणाली की तुलना में ईवीएम वोटिंग और रिजल्ट की घोषणा करने में कम समय लगता है। आज इस आलेख में हम आपको इसी ईवीएम के बारे में कुछ बातें बताने जा रहे हैं जिसमें इसका इतिहास और विशेषता का उल्लेख होगा।
भारत में ईवीएम की शुरुआत
देश में सबसे पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल वर्ष 1982 में केरल राज्य से किया गया था। इसका आविष्कार दो साल पहले 1980 में एमबी हनीफा ने किया था। उन्होंने इसका पंजीयन ‘इलेक्ट्रानिक संचालित मतगणना मशीन’ के नाम से 15 अक्टूबर 1980 को करवाया था। हनीफा ने इस मशीन के मूल डिजाइन को तमिलनाडु के छह नगरों में लगने वाली प्रदशर्नियों में सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए भी रखा था।

ईवीएम (EVM) से वोटिंग के लाभ
- ईवीएम से मतदान की प्रक्रिया आसान होती है। मतदाता को अपना वोट देने के लिए महज एक बटन दबाने की दरकार होती है।
- इन ईवीएम को एक से दूसरे स्थान पर ले जाना भी आसान होता है जो कि बैलेट बॉक्स के मुकाबले सुगम होता है।
- बैलेट पेपर से जब वोटिंग होती थी जो कागजों पर बहुत धन खर्च होता था। कागजों की खपत भी बहुत बढ़ जाती थी। इसका असर पर्यावरण पर भी पड़ता था। ईवीएम के उपयोग से वोटिंग के दौरान होने वाले कागजों के अपव्यय पर भी अंकुश लगता है।
- आर्थिक तौर पर बात करें तो ईवीएम का प्रयोग किफायती भी होता है। बैलेट पेपर की तुलना में इसमें खर्च कम आता है। ये मशीनें बैटरी से चलती हैं इसलिए बिजली का भी खर्च कम आता है।
- मतगणना के समय वोटों की गिनती का काम इससे तेजी से होता है। मैन्युअली गणना में कई दिन लग जाते थे, उसकी तुलना में ईवीएम से कुछ ही घंटों में परिणाम सामने आ जाता है।
ईवीएम की तकनीकी सरंचना
ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) को मुख्य रूप से दो यूनिटों से तैयार किया जाता है। यह है कंट्रोल यूनिट और बैलट यूनिट। इन यूनिटों को आपस में केबल से एक दूसरे से जोड़ दिया जाता है। ईवीएम का पूरा कंट्रोल यूनिट पीठासीन अधिकारी या मतदान अधिकारी के पास होता है। दूसरी बैलेटिंग यूनिट को वोटिंग कंपार्टमेंट के अंदर रखा जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि रिटर्निंग ऑफिसर आपकी पहचान की पुष्टि कर पाए। ईवीएम के साथ मतदान अधिकारी बैलेट बटन को दबाता है जिससे वोटर अपना वोट डाल सकता है। मशीन पर अभ्यर्थी के नाम अथवा चिन्हों की एक सूची उपलब्ध होती है, जिसके बराबर में नीले बटन होते हैं। मतदाता जिस अभ्यर्थी को वोट देना चाहते हैं उनके नाम के बराबर में दिए बटन दबा सकते हैं।
देश में कहां बनती है ईवीएम
भारत में ईवीएम का निर्माण ‘भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बंगलौर’ और ‘इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद’ द्वारा किया जाता है। इसके संचालन के लिए एक साधारण बैटरी का उपयोग किया जाता है जो कि 6 वोल्ट की होती है। इसके चलते संपूर्ण देश में इसका उपयोग आसानी से किया जा सकता है।
विश्व भर में ईवीएम
इलेक्ट्रॅानिक वोटिंग मशीन का उपयोग विश्व के कई देशों में है लेकिन वहां इसके प्रति रुझान अलग-अलग हैं। यूरोप और उत्तरी अमेरिका में कुछ देश ऐसे हैं जो पूरी तरह से इस ईवीएम सिस्टम से अलग होते जा रहे हैं। दूसरी तरफ एशिया सहित दक्षिण अमेरिका के कुछ देश ईवीएम में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।






